त्योहार से पहले धार्मिक उन्माद
शारदीय नवरात्रि कुछ ही समय में आने वाली है, और धर्मोन्मादियों ने अभी से आस्था, भक्ति, उमंग और उत्साह के इन दिनों पर तनाव की काली छाया डाल दी है।

शारदीय नवरात्रि कुछ ही समय में आने वाली है, और धर्मोन्मादियों ने अभी से आस्था, भक्ति, उमंग और उत्साह के इन दिनों पर तनाव की काली छाया डाल दी है। मां दुर्गा के नौ रूपों और उनकी शक्ति का यह पर्व देश के पूर्वी हिस्से में अलग तरीके से मनाया जाता है और पश्चिमी हिस्से में अलग तरीके से। प.बंगाल के दुर्गा पंडालों से लेकर गुजरात में शक्ति की आराधना के लिए किए जाने वाले गरबा नृत्य हर किसी की अलग खासियत है। भारत की विविधिताओं में एकता वाले फलसफे में एक फलसफा यह भी है कि एक ही धार्मिक पर्व को कितने अलग-अलग तरीकों से, अलग-अलग राज्यों में मनाया जाता है। अब तो महानगरों में जहां नौकरी, कारोबार आदि के सिलसिले में सारे देश से आए लोग रहते हैं, वहां एक जगह पर बंगाल के तरीके की दुर्गापूजा मनाई जाती है और दूसरी जगह पर गुजरात का गरबा होता है। हिंदुस्तान की ऐसी ही खूबसूरती दुनिया में प्रसिद्ध है। मगर भाजपा की मोदी सरकार आने के बाद इस खूबसूरती पर कालिमा छा रही है।
अभी रविवार को बागेश्वर धाम के प्रमुख धीरेंद्र शास्त्री ने कोलकाता में आयोजित एक कार्यक्रम में हिंदुओं से दुर्गा पूजा के दौरान मांसाहार से बचने की अपील की और कहा कि उन्हें यह अच्छा नहीं लगता कि दुर्गा पूजा और उससे जुड़े आयोजनों के दौरान मांसाहारी भोजन किया जाए। उन्होंने कहा कि कोलकाता के हिंदुओं को इस मुद्दे पर जागरूक होना चाहिए और ऐसे लोगों का बहिष्कार करना चाहिए जो पूजा के दौरान मांसाहार करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि दुर्गा पूजा के समय देवी प्रतिमा के आसपास मांस की बिक्री नहीं होनी चाहिए।
गनीमत यह रही कि धीरेन्द्र शास्त्री के ऐसे बेतुके बयान पर न केवल विपक्षी तृणमूल कांग्रेस बल्कि खुद सत्ता में बैठी भाजपा के नेताओं ने आपत्ति जताई है। टीएमसी प्रवक्ता रिजु दत्ता ने कहा कि दुर्गा पूजा बंगालियों के लिए केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि उनकी संस्कृति, पहचान और भावनाओं का हिस्सा है। दत्ता ने कहा कि बंगाली समाज अपनी 'मां दुर्गा' का उत्सव किस तरह मनाएगा, यह कोई बाहरी व्यक्ति तय नहीं कर सकता। रिजु दत्ता ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति, संगठन या राजनीतिक दल बंगालियों को यह बताने की कोशिश करेगा कि उन्हें अपनी परंपराओं के अनुसार कैसे पूजा करनी चाहिए, तो वह 'आग से खेल रहा होगा।' रिजु दत्ता ने आरोप लगाए कि भाजपा बंगालियों की थाली से मछली और मांस हटाना चाहती है। इसके लिए पूजा से पहले कई रेस्तरां पर कार्रवाई की जा रही है। अगर ये आरोप सही साबित होते हैं तो फिर तय है कि प.बंगाल में भाजपा टिक नहीं पाएगी। क्योंकि इसमें सीधे बंगाली अस्मिता पर चोट की जा रही है।
वैसे धीरेंद्र शास्त्री की अपील पर पश्चिम बंगाल भाजपा अध्यक्ष सामिक भट्टाचार्य ने भी दो टूक जवाब दिया है कि किसी धार्मिक व्यक्ति या राजनीतिक दल को यह अधिकार नहीं है कि वह बंगाल के लोगों को बताए कि उन्हें क्या खाना या पहनना चाहिए। भट्टाचार्य ने कहा, 'बंगालियों को अपने तरीके से जीने दें। बंगाली वही खाएंगे जो वे खाते आए हैं।Ó उन्होंने सवाल किया कि क्या बंगाली मछली और मांस नहीं खा सकते? इस संदर्भ में उन्होंने स्वामी विवेकानंद का भी उल्लेख किया और कहा कि उनके विचारों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि किसी संत को शाकाहार का प्रचार करने का अधिकार है और ऐसा करना अपराध या पाप नहीं है। लेकिन 'पाखंडÓ स्वीकार नहीं किया जा सकता। भट्टाचार्य के मुताबिक, धार्मिक व्यक्ति की निजी राय को बंगाली समाज के लिए नियम नहीं बनाया जा सकता। इसी तरह मोदी सरकार के करीबी अर्थशास्त्री संजीव सान्याल ने भी धीरेंद्र शास्त्री का नाम लिए बिना सोशल मीडिया पर लिखा कि शाक्त हिंदू धर्म में मांस का महत्वपूर्ण स्थान है और प्राचीन धार्मिक अनुष्ठानों में इसे मां दुर्गा और मां काली को अर्पित किया जाता रहा है। उन्होंने कहा कि दुर्गा पूजा की नवमी/दशमी पर श्रद्धालुओं द्वारा ग्रहण किया जाने वाला प्रसाद कई परंपराओं में मांस होता है और इस धार्मिक परंपरा में किसी तरह का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।
भाजपा के वरिष्ठ नेता और मेघालय के पूर्व राज्यपाल तथागत रॉय ने तो यहां तक कहा कि वह स्वयं नवरात्रि के दौरान मांसाहारी भोजन करते हैं और फिर भी '100 प्रतिशत हिंदूÓ हैं। तथागत रॉय ने कहा कि हिंदुत्व में किसी एक तरह की जीवनशैली सब पर थोपने की परंपरा नहीं है। धीरेन्द्र शास्त्री का विरोध करते हुए उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म की सबसे बड़ी विशेषता उसकी विविधता है और कोई भी व्यक्ति उनके जीवन को आदेश देकर नियंत्रित नहीं कर सकता।
ये प्रतिक्रियाएं बता रही हैं कि भाजपा के लोगों की धार्मिक भावनाएं धीरेन्द्र शास्त्री के बयान से आहत हुई हैं। चूंकि मामला एक ही परिवार का है, इसलिए भाजपा इसे किसी तरह संभाल लेगी। लेकिन अब कम से कम लोगों को सोचना चाहिए कि जब इसी तरह मुसलमानों या ईसाइयों के धार्मिक पर्वों में दखलंदाजी की जाती है, जिससे उन्हें खुशियां भी डर-डर कर मनानी पड़ती हैं, तब उन्हें कैसा लगता होगा।
प.बंगाल में दुर्गापूजा में मांसाहार पर विवाद खड़ा किया गया तो महाराष्ट्र में विश्व हिंदू परिषद ने गरबा आयोजनों में मुस्लिमों को शामिल नहीं होने देने की बात कही है। उनके समर्थन में महाराष्ट्र सरकार में मंत्री नितेश राणे भी आ गए। राणे ने कहा है कि गरबा और डांडिया जैसे आयोजनों में प्रवेश से पहले लोगों की पहचान सत्यापित की जानी चाहिए, साथ ही सुझाव दिया कि कार्यक्रम में प्रवेश चाहने वालों से हनुमान चालीसा का पाठ कराया जा सकता है। इसके बाद राणे ने आरोप लगाया कि ऐसे त्योहारों के दौरान 'लव जिहादÓ के मामले बढ़ जाते हैं। हालांकि इस बात का केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता राज्य मंत्री रामदास आठवले ने विरोध किया है। आठवले ने कहा कि ऐसा रुख सही नहीं है, क्योंकि अलग-अलग धर्मों के लोगों को एक-दूसरे के त्योहारों में शामिल होने का अधिकार है। आठवले भाजपा नेता नहीं हैं, लेकिन एनडीए का हिस्सा हैं। इसलिए उनके विरोध का महत्व है। अब देखना ये है कि मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस इस बारे में कोई राय देते हैं या नहीं, क्योंकि उनकी पत्नी अमृता फड़नवीस का तो कहना है कि नितेश राणे ने कुछ सोचकर ऐसा कहा होगा। लेकिन कोई गरबा आयोजन में बिना खलल डाले शामिल होता है, तो फिर उन्हें आने देना चाहिए। यानी मुसलमानों को गरबा से दूर करने की बात उन्हें भी रास नहीं आई। नजर आ रहा है कि धार्मिक उन्माद से इस बार भाजपा को ही तकलीफ हो रही है।


