टाटा पर राहुल का बड़ा बयान
देश के सबसे पुराने और अग्रणी औद्योगिक घरानों में एक टाटा समूह में चेयरमैन की दोबारा नियुक्ति को लेकर विवाद चल रहा है।

देश के सबसे पुराने और अग्रणी औद्योगिक घरानों में एक टाटा समूह में चेयरमैन की दोबारा नियुक्ति को लेकर विवाद चल रहा है। जो अब राजनीतिक मुद्दा भी बन गया है। कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने बुधवार को इस मामले को लेकर केंद्र सरकार पर गंभीर सवाल उठाए हैं। राहुल गांधी ने एक्स पर लिखा कि टाटा को आपराधिक तरीके से बर्बाद किया जा रहा है, लेकिन किसी भी कारोबारी नेता में इस मुद्दे पर बोलने की हिम्मत नहीं है। उन्होंने कारोबारियों को संबोधित करते हुए कहा है, 'आप कब तक चुप रहेंगे? क्या तब तक जब तक वे आप पर पूरी तरह कब्जा न कर लें? भारतीय उद्योग मोदी और शाह का खिलौना नहीं है। आप में हिम्मत नहीं है। हममें है। हम इन अपराधों के लिए न्याय दिलाएंगे।'
राहुल गांधी के इस पोस्ट के जवाब में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का भी पोस्ट आया है। उन्होंने लिखा है कि राहुल गांधी मेरी सलाह है कि विपक्ष के नेता के तौर पर आप हर मुद्दे का राजनीतिकरण करने से बचें। साथ ही, व्यावसायिक और कानूनी मामलों को बिना सोचे-समझे 'आपराधिक' करार देना बिल्कुल स्वीकार्य नहीं है। आपने बार-बार भारतीय उद्योग जगत और हमारे उद्यमियों की सफलताओं की आलोचना की है। क्या अब आप हमारे व्यापारिक नेताओं को भी अपने साथ मिलाकर अविश्वास और नफरत फैलाने के लिए उकसाने की कोशिश कर रहे हैं? दशकों तक, आपकी पार्टी ने 'लाइसेंस-कोटा राज'' के जरिए भारतीय उद्यमियों की भावना को दबाए रखा और करोड़ों भारतीयों को गरीबी में धकेल दिया।
दूसरी ओर, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली हमारी सरकार भारतीय उद्योग जगत को 'रोजगार पैदा करने वाले' और 'आर्थिक विकास को गति देने वालेÓ के रूप में महत्व देती है। राजनीतिक दलों, नेताओं, सरकारों और संस्थानों की यह समान जिम्मेदारी है कि वे हमारे उद्योगों का समर्थन करें, किसानों को मजबूत बनाएं और युवाओं के भविष्य को सुरक्षित करें। इसलिए, अपने संकीर्ण राजनीतिक उद्देश्यों को साधने के लिए बेबुनियाद आरोप लगाने के बजाय, रचनात्मक तरीके से जुड़ना ज्यादा जरूरी है।
भारत का संविधान अपने सभी नागरिकों को न्याय की गारंटी देता है और हमारे माननीय न्यायालय इसे बनाए रखने के लिए जिम्मेदार हैं। इसलिए राहुल जी, हर जगह भूत-प्रेत देखने से बचें।
जिस तरह का चिढ़ भरा जवाब वित्त मंत्री ने दिया है, वह प्याज के महंगे होने पर मैं प्याज नहीं खाती, वाले स्तर का ही है। राहुल की चिंता का मूल यही है कि मोदी सरकार में केवल दो उद्योगपतियों को आगे बढ़ने का मौका दिया गया। व्यापार-कारोबार में एकाधिकार की प्रवृत्ति देश के लिए घातक होती है, यह बात राहुल गांधी कई सालों से लगातार उठा रहे हैं। लेकिन उनकी चिंता का तार्किक समाधान प्रस्तुत करने की जगह उन्हें व्यापार विरोधी साबित किया जाता है। अभी रामलीला मैदान में रैली के पहले जिस तरह एक अनजाने से व्यापारी संगठन से राहुल को चि_ी लिखवाई गई कि व्यापार का नुकसान होगा, इसलिए रैली टाल दो, वह भी यही दिखाने की कोशिश है कि राहुल को कारोबारियों से बैर है। जबकि राहुल गांधी ने हमेशा लघु और मध्यम कारोबारियों के लिए आवाज उठाई। नोटबंदी और जीसएटी लागू होने पर उनकी परेशानियों की बात कही। और अब राहुल को व्यापार में एकाधिकार की प्रवृत्ति बढ़ने के कारण टाटा जैसे बड़े औद्योगिक घराने के हक में भी बोलने के लिए सामने आना पड़ा है।
बता दें कि टाटा घराने में विवाद टाटा संस के कार्यकारी चेयरमैन एन चंद्रशेखरन को दोबारा नियुक्त करने के फै़सले को लेकर है। टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन और टाटा परिवार से ही आने वाले नोएल टाटा ने इस फैसले की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए दावा किया है कि बोर्ड की बैठक में जरूरी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया। उन्होंने फैसले को अमान्य बताते हुए कंपनी से सात दिन के भीतर कई दस्तावेज और स्पष्टीकरण मांगे हैं। उनका आरोप है कि बोर्ड की बैठक के लिए निदेशकों को जो एजेंडा भेजा गया था, उसमें चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति का साफ़ उल्लेख नहीं था। नोएल टाटा का कहना है कि इसके बावजूद बैठक में यह प्रस्ताव मतदान के लिए रखा गया और कंपनी ने बाद में इसे मंजूर प्रस्ताव के रूप में पेश किया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया है कि बैठक के ऑडियो-वीडियो रिकॉर्ड, अंतिम मिनट्स और प्रस्ताव की प्रमाणित प्रति मांगने के बावजूद उन्हें ये दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए।
गौरतलब है कि टाटा समूह की संरचना में टाटा ट्रस्ट्स की अहम भूमिका है। टाटा ट्रस्ट्स से जुड़े ट्रस्ट समूह की प्रमुख कंपनियों में हिस्सेदारी रखते हैं और सामाजिक कार्यों के लिए भी बड़े पैमाने पर संसाधन उपलब्ध कराते हैं। नोएल टाटा टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन हैं। वहीं टाटा संस समूह की प्रमुख होल्डिंग कंपनी है। इसलिए टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बीच किसी बड़े फैसले पर मतभेद सामने आने से समूह के भीतर प्रशासन और नियंत्रण से जुड़े सवाल उठ सकते हैं। टाटा समूह में छिड़ी अधिकारों की इस लड़ाई में अंतत: जीत किसकी होगी, यह तो वक्त बताएगा। लेकिन भारत के विकास की गाथा में टाटा के योगदान को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। परमाणु उर्जा से लेकर नागरिक उड्डयन, खेलकूद, शिक्षा, ग्रामीण विकास, चिकित्सा जैसे तमाम क्षेत्रों में टाटा समूह ने सामाजिक जिम्मेदारी निभाते हुए अपना अहम योगदान दिया है। आज जो भारत के धनकुबेर बने बैठे हैं, उन उद्योगपतियों ने देश की प्राकृतिक संपदा का मनमाना दोहन कर केवल अपनी जेबें भरी हैं। बदले में समाज को कुछ नहीं दिया।
ऐसे ही एक एकाधिकार पर हॉट मेल बनाने वाले सबीर भाटिया ने डॉक्यूमेंट्री बनाई। इसमें अडानी और मोदी की दोस्ती की मिसाल देते हुए गुजरात दंगों के बाद से दोनों की अनवरत साझेदारी का पूरा ब्यौरा है। जिसमें पता चलता है कि किस तरह जो जमीनें बाकियों के लिए महंगी दरों पर मौजूद थी, वो अडानी को महज एक रूपए की लीज़ पर दी गईं। मोदी प्रधानमंत्री बने तो गुजरात से दिल्ली अडानी के निजी जहाज में ही आए। अडानी ने जीवीके और एनडीटीवी किस तरह खरीदा, इसका भी पूरा विवरण इस डॉक्यूमेंट्री में है। लेकिन इसे सरकार सोशल मीडिया से हटवा रही है और उधर अडानी समूह ने मानहानि का बड़ा दावा सबीर भाटिया पर ठोंक दिया है। इस मामले का नतीजा क्या निकलता है, यह तो अदालत से तय होगा।
फिलहाल राहुल गांधी ने अपनी पोस्ट से देश की भावी आर्थिक तस्वीर को लेकर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। और यह तथ्य भी अपनी जगह है कि राहुल गांधी ने जब भी कोई चिंता जाहिर की है, कुछ वक्त में वह सच बनकर सामने आ जाती है।


