मोदी की इजरायल यात्रा पर सवाल
पूरी दुनिया की निगाहें इस समय ईरान के हालात पर टिकी हैं, जहां अमेरिका ने अपने युद्धपोत तैनात किए हुए हैं और कई दिनों से लगातार धमकियां दे रहा है कि वो जंग की शुरुआत कर देगा

पूरी दुनिया की निगाहें इस समय ईरान के हालात पर टिकी हैं, जहां अमेरिका ने अपने युद्धपोत तैनात किए हुए हैं और कई दिनों से लगातार धमकियां दे रहा है कि वो जंग की शुरुआत कर देगा। खुद भारत ने सोमवार 23 फरवरी को ईरान में अपने नागरिकों से कहा है कि वे फौरन ईरान छोड़ दें। यानी ईरान पर किसी भी समय अमेरिकी हमला हो सकता है। लेकिन 23 फरवरी को ही इजरायली कैबिनेट को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने घोषणा की कि भारत क्षेत्रीय सुरक्षा मुद्दों पर सहयोग के लिए एक 'हेक्सागोनल गठबंधन' में शामिल होगा। इसके बाद तय हो गया कि प्रधानमंत्री मोदी 25 फरवरी को दो दिन के इजरायल दौरे पर जा रहे हैं यानी जब पूरा मध्यपूर्व बड़े संकट से गुजर रहा है, उस समय इजरायल एक अलग वैश्विक गठजोड़ तैयार कर रहा है और भारत उसका हिस्सा बनने जा रहा है। इज़रायल के राजदूत रेयुवेन अज़ार ने एक वीडियो पोस्ट में कहा कि दोनों देश रक्षा और सुरक्षा समझौतों को 'अपडेट' करेंगे।
गौरतलब है कि हेक्सागोनल एलायंस (हेक्सागोन ऑफ एलायंसेज़) इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू द्वारा 22 फरवरी को कैबिनेट बैठक में घोषित एक प्रस्तावित रणनीतिक भू-राजनीतिक ढांचा है। इसका उद्देश्य मध्य पूर्व और उसके आसपास के क्षेत्र में आर्थिक, कूटनीतिक और सुरक्षा सहयोग को मजबूत करना है, खासकर 'रेडिकल शिया एक्सिस' (ईरान और उसके सहयोगी) और 'उभरते रेडिकल सुन्नी एक्सिस' के खिलाफ एकजुट होकर खड़ा होना। नेतन्याहू ने इसे 'हेक्सागोन' (छह भुजाओं वाला) कहा, जो एक नेटवर्क्ड गठबंधन का प्रतीक है।
इस नेटवर्क को खड़ा करने में बड़ी चालाकी से शब्दों का खिलवाड़ किया गया है वर्ना रेडिकल यानी कट्टरपंथी शिया और सुन्नियों के खिलाफ छह भुजाओं वाला गठबंधन खड़ा करना, धर्म के आधार पर विरोध को बढ़ावा देना ही है। इजरायल संप्रभु देश है और उसकी जो मर्जी वह करे। लेकिन इस हेक्सागोन नेटवर्क में इजरायल केंद्रीय भूमिका निभाएगा, जबकि भारत को प्रमुख वैश्विक शक्ति के रूप में विशेष महत्व दिया गया है। अन्य सदस्यों में ग्रीस और साइप्रस (भूमध्यसागरीय भागीदार) शामिल हैं साथ ही कई और अरब, अफ्रीकी और एशियाई देशों को शामिल करने की भी योजना है, हालांकि उनके नाम अभी साफ नहीं किए गए हैं। यह अब्राहम समझौते पर आधारित है लेकिन गैर-अरब शक्तियों जैसे भारत को शामिल करके विस्तारित किया जा रहा है। बता दें कि 2020 में इज़रायल ने अमेरिका की मध्यस्थता में संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, सूडान और मोरक्को जैसे अरब देशों के साथ संबंधों को सामान्य करने के लिए अब्राहम समझौता नाम से राजनयिक समझौता किया था। जिसके तहत इस समझौते का उद्देश्य मध्यपूर्व में शांति, स्थिरता और व्यापार को बढ़ावा देना है। अब इसी का विस्तार करते हुए इसमें भारत को भी शामिल किया जा रहा है।
यानी अमेरिका के बाद अब इजरायल भी तय करने लगा है और बताने लगा है कि भारत क्या करने जा रहा है। इजरायल और अमेरिका पूरी दुनिया में किस तरह अपनी खुफिया एजेंसियों और हथियारों के बल पर कमजोर देशों की आंतरिक और बाहरी नीतियों को निर्धारित करते हैं, यह तो विश्व राजनीति की खुली किताब में दर्ज है। लेकिन भारत किस तरह अपने आप को इतना कमजोर कर रहा है, यह चिंता की बात है। प्रधानमंत्री मोदी की इजरायल यात्रा का मकसद और वक्त दोनों पर सवाल उठ रहे हैं।
जिस इजरायल ने गज़ा में आम लोगों का कत्लेआम किया और उसके बाद ईरान के साथ जंग पर उतर आया, अभी अमेरिका भी ईरान पर हमले के लिए तैयार बैठा है, ऐसे वक्त में प्रधानमंत्री मोदी इजरायल जा रहे हैं। कई मुस्लिम देशों ने क्षेत्र में सैन्य तनाव से बचने की अपील की है। ऐसे समय में भारत के प्रधानमंत्री का तेल अवीव जाना स्वाभाविक रूप से प्रतीकात्मक अर्थ पैदा करता है- चाहे नई दिल्ली की आधिकारिक मंशा कुछ भी क्यों न हो। गौरतलब है कि भारत लंबे समय से 'रणनीतिक संतुलन' की नीति पर चलता रहा है- उसने इजरायल के साथ मजबूत रक्षा सहयोग के संबंध बनाए, तो दूसरी ओर खाड़ी देशों और ईरान के साथ गहरे आर्थिक और ऊर्जा संबंध भी बनाए रखे। लेकिन मोदी सरकार ने इस संतुलन को बिगाड़ दिया है। यदि भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी ताकत उसकी कूटनीति रही है, तो उसे प्रतीकों की राजनीति से भी उतनी ही सावधानी बरतनी चाहिए। नरेन्द्र मोदी की इजरायल यात्रा प्रतीकों की राजनीति का ही हिस्सा है।
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और अमेरिकी सैन्य जमावड़े के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजरायल यात्रा के समय पर संसद विदेश मामले की स्थायी समिति ने भी गंभीर सवाल उठाए हैं। समिति की बैठक सोमवार 23 फरवरी को हुई, जिसमें विदेश मंत्रालय के बजटीय आवंटन पर चर्चा के दौरान शशि थरूर ने इस यात्रा की औचित्य पर सवाल किया, खासकर जब भारत ने ईरान में रहने वाले अपने नागरिकों को वहां से निकलने की सलाह जारी की है और अमेरिकी हमले की आशंका जताई गई है।
गौरतलब है कि नरेन्द्र मोदी नौ साल बाद फिर से इजरायल जा रहे हैं। इससे पहले वे 2017 में इजरायल गए थे। और तब का जिक्र एपस्टीन फाइल्स में जिस तरीके से है, उस पर सवाल उठ रहे हैं। जानकारी के लिए बता दें कि इस बार की दो दिवसीय यात्रा में मोदी येरूशलम में इजरायली संसद को संबोधित करेंगे, प्रौद्योगिकी सहयोग पर एक इनोवेशन इवेंट में भाग लेंगे और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ होलोकॉस्ट स्मारक याद वाशेम का दौरा करेंगे। लेकिन इन प्रत्यक्ष कार्यक्रमों के अलावा जो प्रच्छन्न उद्देश्य इस यात्रा में छिपे हैं, उनका सामने आना भी जरूरी है।


