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सतलुज पर प्रतिबंध से उठते सवाल

आजादी के बाद भारत ने जिस उदार लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनाया, उसके कारण विश्व मानचित्र में भारत का विशेष स्थान बना।

सतलुज पर प्रतिबंध से उठते सवाल
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आजादी के बाद भारत ने जिस उदार लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनाया, उसके कारण विश्व मानचित्र में भारत का विशेष स्थान बना। इस व्यवस्था में आम जनता को अपनी सरकार चुनने के साथ-साथ अभिव्यक्ति की आजादी भी हासिल हुई, जो लोकतंत्र के लिए अनिवार्य है। लेकिन उस आजादी पर बार-बार पहरा लगाना स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी नहीं है। इसका ताजा उदाहरण ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म ज़ी-5 पर प्रदर्शित फिल्म पर प्रतिबंध के तौर पर सामने आया है। गायक-अभिनेता दिलजीत दोसांझ अभिनीत फिल्म सतलुज तीन जुलाई को ज़ी-5 पर रिलीज़ हुई थी, लेकिन पांच जुलाई को इसे प्लेटफ़ॉर्म से हटा दिया गया था। यह फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित है, जिन्होंने खालिस्तान आंदोलन के दौरान बड़ी संख्या में लापता हुए लोगों और लावारिस लाशों का मुद्दा समाज के सामने लाया था और इसमें तत्कालीन पंजाब पुलिस पर बड़े सवाल उठे थे। इस गंभीर मुद्दे को उठाने की कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। लेकिन अब उनके इस जीवन संघर्ष और इंसाफ की लड़ाई को सरकार जनता के सामने नहीं आने देना चाहती है।

गौरतलब है कि पहले यह फ़िल्म 'पंजाब '95' नाम से बनी, जिसे बाद में 'सतलुज' नाम से प्रदर्शित होने की अनुमति मिली, और इसमें कई सारे दृश्यों पर सेंसर की कैंची चली। हालांकि उसके बावजूद फिल्म को दो दिन में ही हटाने का आदेश भी हो गया, जो सोशल मीडिया के इस जमाने में हास्यास्पद लगता है। जब एक बार कोई चीज लोगों के मोबाइल, लैपटॉप पर आ जाती है तो उसे डाउनलोड करना कठिन नहीं है। फिर जिस चीज को जितना लोगों से दूर करने की कोशिश की जाती है, उतना लोग उसे देखना चाहते हैं, यह सहज मानवीय प्रवृत्ति है। तो अगर सरकारें ऐसा सोचती हैं कि कोई फिल्म दो दिन के प्रदर्शन के बाद प्रतिबंधित करने से वह लोगों से दूर हो जाएगी, तो यह उसकी खुशफहमी है। प्रधानमंत्री मोदी पर बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री भी ऐसे ही प्रतिबंधित की गई, लेकिन फिर भी दुनिया भर में लोगों ने उसे देखा।

अब सवाल यह है कि आखिर एक असल कहानी को पर्दे पर दिखाने से सरकार को ऐतराज क्यों हुआ। क्यों सरकार एक मानवाधिकार कार्यकर्ता पर हुए पुलिसिया अत्याचार को दिखाने पर रोक लगा रही है। जो कुछ अतीत में हुआ वह आज के प्रतिबंध लगाने से लोगों की स्मृति से मिटने वाला नहीं है। बल्कि उसे कई और तरीकों से सामने लाने की कोशिश होती ही रहेगी।

बता दें कि मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा 1980-90 के दशक में पंजाब में चरमपंथ के दौर में लापता लोगों की तलाश करते हुए एक दिन खुद ही लापता हो गए और बाद में सीबीआई की रिपोर्ट में बताया गया कि पुलिस अधिकारियों ने 6 सितंबर 1995 को उन्हें उनके आवास से ही अगवा कर लिया था। दरअसल 1980 और 90 के दशक में पंजाब में आतंकवादी घटनाओं के साथ पुलिस प्रताड़ना, हिरासत में मौतें और फर्जी पुलिस मुठभेड़ के भी कई प्रकरण चर्चा में रहे। जसवंत सिंह खालड़ा ने भी जब अमृतसर, मजीठा और तरनतारन के तीन श्मशान घाटों में जून 1984 से दिसंबर 1994 तक जलाई गई लावारिस लाशों के बारे में पड़ताल की तो उन्होंने इसके पीछे पुलिस की गैरकानूनी कार्रवाईयों का आरोप लगाया। सीबीआई के मुताबिक जसवंत सिंह खालड़ा ने इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई। लेकिन स्थानीय पुलिस को यह बात खटकी तो उन्हें उनके घर से ही उठा लिया गया और फिर गैरकानूनी हिरासत में रखने के बाद उनकी हत्या कर दी गई।

उनकी लाश एक नहर में फेंकी गई, जो कभी बरामद नहीं हुई। यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया, जहां शीर्ष अदालत ने कहा कि मानवाधिकार कार्यकर्ता होने के नाते, जसवंत सिंह खालड़ा ने अमृतसर और तरनतारन जिलों में पुलिस के कथित गलत कामों का पर्दाफ़ाश करने का काम किया था। पुलिस ने आतंकवादियों के नाम पर बेकसूर लोगों को मारकर बिना किसी पहचान के उनका अंतिम संस्कार किया। पुलिस अधिकारियों को खालड़ा की ऐसी गतिविधियां पसंद नहीं आईं और उन्होंने यह काम बंद करने को कहा। खालड़ा ने जब बात नहीं मानी तो बड़ी बेदर्दी से उन्हें मारा गया।

जिस घटना पर सुप्रीम कोर्ट तक टिप्पणी कर चुका है, उसे दिखाने पर रोक लगाना समझ से परे है। हालांकि ऐसा कोई कदम सरकार की तरफ से उठाया जाएगा, इसका अंदेशा अभिनेता दिलजीत दोसांझ को पहले से था। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा है कि 'मुझे पहले से ही लग रहा था कि ऐसा होगा। जिसकी (जसवंत सिंह खालड़ा) आवाज़ को 1995 में भी दबाया गया और आज 2026 है। कमाल की बात है। हद हो गई है। हम 2026 में जी रहे हैं और कहां खड़े हैं। आज भी आप बात नहीं करने दे रहे हो। कोर्ट ने जो फ़ैसले दिए हैं हम उसी पर बात कर रहे हैं। कोई नयी बात नहीं कर रहे हैं। ये बात मेरी समझ से पूरी तरह बाहर है।' उन्होंने कहा कि, 'मुझे इस बात की ख़ुशी है कि ये फ़िल्म कुछ लोगों तक पहुंच गई है। ये लोगों की फ़िल्म है। ये रुक नहीं सकती।'

इसी तरह कुणाल कामरा ने लिखा कि सीबीएफ़सी का ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म या अंतरराष्ट्रीय रिलीज़ पर कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है। पंजाब 95 जसवंत सिंह खालड़ा की कहानी है। उन्होंने मानवाधिकार उल्लंघनों के दस्तावेज़ी सबूत सामने रखे और इसकी क़ीमत अपनी जान देकर चुकाई। अगर दस्तावेज़ी तथ्यों पर आधारित एक फ़िल्म भी भारतीय दर्शक नहीं देख सकते, तो जनता यह जानने की हक़दार है कि इसकी वजह क्या है।' कामरा ने यह भी लिखा कि 'कश्मीर फ़ाइल्स, बंगाल फ़ाइल्स और द केरल स्टोरी के लिए रेड कार्पेट। धुरंधर 1 और धुरंधर 2 के लिए फूल- एक काल्पनिक डॉक्यूमेंट्री या एक्सप्लेनर के लिए। किसी निर्देशक के करियर के चार साल निगल जाने का एहसास कैसा होता है? जसवंत सिंह खालड़ा का एक बार फिर अपहरण कर लिया गया है।'

राजनैतिक हलके में भी इस आदेश पर सवाल उठाए जा रहे हैं। शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने कहा कि पंजाब के दर्दनाक इतिहास को साहस के साथ सामने लाने वाली और सरदार जसवंत सिंह जी खालड़ा के सर्वोच्च बलिदान को श्रद्धांजलि देने वाली इस सशक्त फ़िल्म को इस तरह ख़ामोश नहीं किया जा सकता। यह महज़ सेंसरशिप नहीं है। यह हमारी सामूहिक स्मृति, सच और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला है।'

कुल मिलाकर अब गेंद मोदी सरकार के पाले में है कि वह अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार को कितना मजबूत कर पाती है या कितना और कुचलती है।


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