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संसद तक जनता का पहुंचना

20 जुलाई 2026 का दिन हालिया राजनीतिक इतिहास में महत्वपूर्ण पन्ने की तरह दर्ज हो चुका है। 3 मई को हुए नीट पेपर लीक के बाद छात्रों की हताशा बढ़ती जा रही थी

संसद तक जनता का पहुंचना
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20 जुलाई 2026 का दिन हालिया राजनीतिक इतिहास में महत्वपूर्ण पन्ने की तरह दर्ज हो चुका है। 3 मई को हुए नीट पेपर लीक के बाद छात्रों की हताशा बढ़ती जा रही थी, इसके कुछ दिन बाद 15 मई को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की तरफ से बेरोजगार युवाओं के लिए कॉकरोच संज्ञा का इस्तेमाल किया गया तो इस हताशा में लाचार नाराजगी का मिश्रण हुआ। सत्ता का अहंकार, ऊंचे पदों पर बैठे लोगों का जिम्मेदारी लेने से इंकार करना और फैसले लेने के अधिकार का घमंड दिखाना, आम जनता की हैसियत को कीड़े-मकोड़ों के समान समझना ये सारी पीड़ाएं एक साथ अलग-अलग मंचों से व्यक्त होने लगीं। इनमें कुछ राजनैतिक रहीं, कुछ गैर राजनैतिक। लेकिन किंतु-परंतु लगाते हुए सब इस बात पर तो एकमत थे ही मोदी सरकार आखिर युवाओं से बात करने क्यों नहीं आ रही। क्यों धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा नहीं हो रहा है। एनटीए में ऐसे कौन से लोग बैठे हैं, या ये लोग किन के इशारों पर काम कर रहे हैं, जिन्हें एक के बाद एक लीक होते पेपर्स पर कोई फिक्र नहीं हो रही, कोई जिम्मेदारी का बोध नहीं दिख रहा, छात्रों के लिए शून्य संवेदनशीलता के साथ ये लोग कैसे उनका ही भविष्य तय करने का काम करते हैं। 20 जुलाई को ऐसे कई अनुत्तरित सवालों की पीड़ा की समेकित अभिव्यक्ति जंतर-मंतर से हुई।

कई बरसों के बाद ऐसा हुआ कि एक साथ कम से कम 50 हजार लोग जंतर-मंतर पर जुटे। इनमें से ज्यादा संख्या युवाओं और छात्रों की थी। ऐसा नहीं है कि सब के सब पेपर लीक का शिकार हुए हैं, या सारे बेरोजगार हैं। लेकिन वहां मौजूद हरेक शख्स और जो वहां नहीं पहुंच पाए, लेकिन जिनकी सद्भावनाएं प्रदर्शनकारियों के साथ रहीं कि उनका आंदोलन सफल हो, वे सारे लोग मौजूदा सरकार के गैरजिम्मेदाराना और पूरी तरह संवेदनहीन रवैये से नाराज हैं।

20 जुलाई को कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी संसद तक कूच करेगी, ये ऐलान पहले से हो चुका था। जब सोनम वांगचुक को उठाकर जबरन अस्पताल ले जाया गया, तब अभिजित दिपके ने अपने अनशन की घोषणा करते हुए कहा था कि मार्च हो कर रहेगा। इस बीच कई विपक्षी दलों के नेता वहां पहुंचे। सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि ने कहा कि अगर सरकार की तरफ से कोई बात करने आता है तो वे अपना अनशन खत्म कर देंगे। इधर ढाई दिन बाद दिपके का अनशन तो खत्म हुआ ही, 28 जून से अनशन कर रहे छात्रों का अनशन भी खत्म करवाया गया। लेकिन इस दरम्यान युवाओं में इस सरकार के लिए जो नाराजगी भर चुकी थी, उसे खत्म करने का कोई रास्ता नहीं तलाशा जा सका। मानसून सत्र की शुरुआत हुई तो उससे पहले मीडिया को संबोधित करते हुए नरेन्द्र मोदी ने लफ्फाजी की, कुछ युवाओं की हालिया उपलब्धियों को बताते हुए मोदी ने राहुल गांधी पर भी तंज कसा कि 56 साल के युवा की बात नहीं कर रहा हूं। पता नहीं राहुल गांधी का कितना खौफ नरेन्द्र मोदी के मन में भरा हुआ है कि जहां जरूरत नहीं, वहां भी उनका जिक्र करते हुए हमला कर देते हैं। लेकिन अब नरेन्द्र मोदी और समूची एनडीए सरकार को जनता के उस तेवर से डरना चाहिए, जो सोमवार को जंतर-मंतर से लेकर संसद के रास्ते तक दिखाई दिए। जिसे बार-बार भीड़ कहकर संबोधित किया जा रहा है, दरअसल वही देश है। ये वही लोग हैं जिन्हें वाकई रोजमर्रा की दाल-रोटी का भाव पता है। नोटबंदी के समय कतारों में लगने से लेकर लॉकडाउन में मोदी के कहने पर ताली-थाली बजाने तक सारे काम इन लोगों ने किए, इसी इंतजार में कि कभी तो उनके मन की बात भी सुनी जाएगी। लेकिन जंतर-मंतर समेत देश के तमाम हिस्सों में पेपर लीक के खिलाफ उठती आवाजों को नरेन्द्र मोदी ने बड़ी आसानी से अनसुना कर दिया। माइक उनका, मीडिया उनका और संसद पर भी केवल अपना हक समझने वाले नरेन्द्र मोदी ने संसद भवन के सामने खड़े होकर बहुत कुछ कहा, लेकिन एक बार भी नौजवानों को आश्वासन नहीं दिया कि आप लोग धरने से उठ जाइए, मैं आपका प्रधानमंत्री हूं तो मैं आपके बारे में संसद में बात करूंगा। दरअसल इतना कहने के लिए वाकई बहुत हिम्मत चाहिए, जो नरेन्द्र मोदी में है ही नहीं।

हिम्मत क्या होती है ये संसद की तरफ कूच करते लोगों ने दिखाई। जिन्हें कई सांसदों-विधायकों, अधिकारियों की तरह ईडी-सीबीआई का डर नहीं है। जिन्होंने जी हुजूरी को संवैधानिक जिम्मेदारी से बड़ा नहीं बनाया है। जिन्होंने किसी सार्वजनिक पद पर बैठने के लिए संविधान की शपथ नहीं ली, फिर भी इस देश का नागरिक होने के नाते संविधान और लोकतंत्र की रक्षा की जिम्मेदारी निभाने के लिए आगे आए।

सोनम वांगचुक हो सकता है एलजी विनय सक्सेना के कहने पर अभिजित दिपके के साथ आए। अभिजित दिपके हो सकता है आम आदमी पार्टी के समर्थन से नया आंदोलन छेड़ने के लिए खड़े हुए। अभी कहा नहीं जा सकता कि इन लोगों का अगला कदम क्या होगा। लेकिन इस वजह से जंतर-मंतर पर आंदोलन के लिए उतरे लोगों की नाराजगी को न नकारा जा सकता है, न अनदेखा किया जा सकता है। मूड ऑफ द नेशन यानी देशवासियों का मिजाज़ असल में क्या है, वो जंतर-मंतर पर देखा गया। इक_ा हुए लोगों की राजनैतिक प्रतिबद्धताएं भी अलग-अलग हो सकती हैं। लेकिन यह तो साफ नजर आया कि मोदी सरकार के लिए अब नाराजगी इतनी बढ़ चुकी है, जिसे दूर करने की कोशिश समय रहते नहीं की गई तो सत्ता पर टिके रहना कठिन हो जाएगा। हमेशा की तरह इस बार भी मुद्दे को भटकाने की कोशिशें जारी हैं। जंतर-मंतर पर लाठी चार्ज और आंसू गैस के गोले छोड़े गए, और हालात कुछ समय के लिए बेकाबू हुए तो फौरन इसका इल्जाम प्रदर्शनकारियों पर डाला गया। लेकिन इस बीच दो तस्वीरें आईं, एक संसद के प्रवेशद्वार पर बंदूकों को तानकर सुरक्षाबल खड़ा है, मानो प्रदर्शनकारी आतंकी हों, यह चीन के तियेनमान चौक जैसी किसी घटना की आशंका उपजाती है। दूसरी एक प्रदर्शनकारी को पुलिस वाले मारते हैं और वह पलट कर कहता है और मारो सर। कुछ देर बाद उसे एक महिला पुलिसकर्मी ले जाती है। मार खाने के बाद उस युवक का बेखौफ चेहरा बता रहा है कि अब मामला मोदी सरकार के हाथ से निकल चुका है। अपने मंच यानी संसद तक जनता पहुंच चुकी है।?


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