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विरोध करना अपराध नहीं है

एआई इम्पैक्ट समिट में युवा कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के शर्ट उतार कर प्रदर्शन करने से भाजपा ने देश में ऐसा सियासी बवाल खड़ा किया मानो लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शन करना कोई बड़ा गुनाह है।

विरोध करना अपराध नहीं है
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नयी दिल्ली के भारत मंडपम में एआई इम्पैक्ट समिट में युवा कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के शर्ट उतार कर प्रदर्शन करने से भाजपा ने देश में ऐसा सियासी बवाल खड़ा किया मानो लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शन करना कोई बड़ा गुनाह है। अब इस बात को देखकर हैरानी भी नहीं होती कि भाजपा के साथ-साथ कई स्वयंभू बड़े पत्रकारों ने भी इस प्रदर्शन पर कांग्रेस को नसीहतें देना शुरु कर दिया कि विरोध का ये कोई तरीका नहीं होता। इन पत्रकारों ने शायद अब आईने में अपना चेहरा देखना ही बंद कर दिया है, क्योंकि देखेंगे तो असलियत दिखाई पड़ेगी कि मोदी सरकार के 12 बरसों में एक से बढ़कर एक गलत फैसले पूरी तरह सोच-समझ कर लिए गए, जिनसे आम जनता की जान पर बन आई, लेकिन तब इनके मुंह से ये नहीं निकला कि सत्ता चलाने का ये कोई तरीका नहीं है। नोटबंदी, लॉकडाउन, सांसदों का निलंबन ऐसे बड़े मामले तो छोड़ ही दीजिए, जनता के टैक्स पर प्रधानमंत्री के मन की बात को तमाम भाजपाई मुख्यमंत्री, मंत्री, विधायक बड़ी स्क्रीन लगाकर सुनते हैं, या प्रधानमंत्री ट्रेनों को हरी झंडी दिखाने के लिए जितना तामझाम करते हैं, उस पर क्या पत्रकारों ने लगातार सवाल उठाए। अगर पत्रकार ईमानदारी से रोजाना सरकार को गलत बात पर टोकते रहे, उससे जुड़े कार्यक्रम करते रहें, तो मजाल है कि कोई सरकार इतनी मनमानी करे, जितनी मोदी सरकार करती है। लेकिन 2014 के बाद एक अलग ही चलन बन गया है कि सारी जिम्मेदारी विपक्ष पर डाल दी जाती है, सवाल भी विपक्ष से ही होते हैं। पिछले कार्यकाल में अधीर रंजन चौधरी नेता प्रतिपक्ष थे, तो उनसे उतने सवाल नहीं होते थे, वो कब संसद में आए या संसद सत्र के दौरान कहां रहे, इसकी भी जानकारी पत्रकारों को शायद ही होती होगी। लेकिन राहुल गांधी जब से नेता प्रतिपक्ष बने हैं, सवालों के तीर उनकी तरफ ही रहते हैं। सत्र में व्यवधान हो तो उसके जिम्मेदार राहुल गांधी हैं, प्रधानमंत्री संसद न आएं तो उसके भी जिम्मेदार राहुल गांधी हैं और अगर सत्र के बीच में दो-चार दिन के लिए राहुल गांधी कहीं चले जाएं, तो उन्हें पार्ट टाइम राजनेता कहने में गुरेज नहीं होता। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी से कभी कोई सवाल नहीं होता और अब तो पत्रकारों ने ये पूछना भी जरूरी नहीं समझा कि आप हर महीने आकर अपने मन की बात सुनाते हैं, तो कभी खुली प्रेस कांफ्रेंस क्यों नहीं करते, ताकि हम भी जनता से जुड़े सवाल सीधे आपके सामने रख सकें।

बहरहाल, आज का दौर ऐसा हो चुका है कि अब सरकार के साथ-साथ पत्रकारों से निष्पक्ष रहने की उम्मीद भी खत्म होती जा रही है। जहां तक सवाल युवा कांग्रेस के विरोध-प्रदर्शन का है, तो लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध अधिकार ही होता है, अपराध नहीं होता। 2010 में जब दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेल आयोजित हुए थे, तब भाजपा ने भी विरोध किया था। तब भी अंतरराष्ट्रीय आयोजन ही था, तो क्या उसमें देश की बदनामी नहीं हुई होगी। असल में भाजपा को देश की नहीं अपनी बदनामी का डर सता रहा है। क्योंकि युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने पीएम इज़ कॉम्प्रोमाइज़्ड लिखी जो टी शर्ट्स दिखाकर विरोध किया, उसमें संदेश दूर-दूर तक पहुंच गया कि हमारे प्रधानमंत्री खुद को या अपने मित्रों के बचाने के लिए किसी भी हद तक झुक कर समझौता कर सकते हैं। वैसे राहुल गांधी यह बात पहले ही संसद में कह चुके हैं और इस आरोप को लगाने की वजह खुद मोदी सरकार ने ही दी है। कांग्रेस उनसे बार-बार पूछ रही है कि आखिर व्यापार सौदे में डोनाल्ड ट्रंप की सारी शर्तों को मानने की कौन सी मजबूरी है। ट्रंप ने केवल भारत पर ही नहीं दुनिया के कई देशों पर टैरिफ थोपे हैं, लेकिन चीन जैसे शक्तिशाली देश से लेकर ब्राजील जैसे विकासशील देश ने अपनी शर्तें खुलकर ट्रंप के सामने रखीं और बेजा बातों को मानने से इंकार कर दिया।

नरेन्द्र मोदी ऐसा क्यों नहीं कर पाए, किसलिए रूस जैसे पुराने मित्र से तेल खरीदना बंद किया, पांच सौ बिलियन डॉलर का सामान अमेरिका से खरीदने की शर्त क्यों मान ली। अगर सरकार इनका तार्किक जवाब दे देती तो शायद कांग्रेस को विरोध का मौका नहीं मिलता। लेकिन जवाब देने की जगह प्रधानमंत्री मोदी संसद से नदारद हो गए और उनके दूसरे मंत्री एक-दूसरे पर इन सवालों को टालते रहे कि इनसे पूछो, हमें नहीं मालूम। ऐसे टरकाने वाले रवैये से शक ही पैदा होगा कि कोई न कोई ऐसी मजबूरी है, जो मोदी सरकार देश से छिपा रही है और किसानों, व्यापारियों का हित दांव पर लगा रही है।

हैरानी की बात ये है कि अभी अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट तक ने ट्रंप सरकार के खिलाफ फैसला दिया है कि टैरिफ लगाने का हक उसे नहीं है। अगर मोदी सरकार इस फैसले का इंतजार करती और हड़बड़ी में फरवरी की शुरुआत में व्यापार समझौता नहीं करती तो शायद देश का भविष्य दांव पर नहीं लगता। लेकिन अब देर हो चुकी है और मामले को संभालने की कोशिश भी सरकार नहीं कर रही है। व्यापार समझौते के अलावा एपस्टीन मामले में भी नरेन्द्र मोदी का रवैया हैरान करने वाला है। दुनिया भर में इसमें जिन लोगों के नाम आए हैं, उनके इस्तीफे हो रहे हैं। यहां तक कि ब्रिटिश प्रिंस एंड्रयू को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और राजपरिवार ने ऐसा होने दिया, क्योंकि मामला नैतिकता का है। मगर देश में हरदीप पुरी को अपनी सरकार से निकालने की जगह नरेन्द्र मोदी उन्हें सोशल मीडिया पर जन्मदिन की बधाई दे रहे हैं, ताकि सबको ये पता चल जाए कि उन्हें आने वाले वक्त में मोदी बचाते रहेंगे। यहां भी वही सवाल है कि एक मंत्री को बचाने की आखिर कौन सी मजबूरी है।

देश के युवाओं में मोदी सरकार के ऐसे रवैये को लेकर जो आक्रोश है, उसे ही युवा कांग्रेस ने व्यक्त किया, लेकिन भाजपा इस मामले में ऐसा प्रलाप कर रही है, मानो देश की कितनी बदनामी हो गई। हालांकि भाजपा भूल रही है कि जब मणिपुर की महिलाओं को इंसाफ दिलाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आवाज़ें उठी थीं, या बिलकिस बानो के दोषियों को रिहा कर तिलक लगाकर उनका स्वागत किया गया, या दुनिया को पता चला कि ऑपरेशन सिंदूर अचानक ट्रंप के कहने पर रोका गया, तब देश की असली बदनामी होती है। भाजपा के हिसाब से तो आज की तारीख में भगत सिंह अगर बहरे कानों तक संदेश पहुंचाने के लिए असेंबली में बम फोड़ते तो बड़ा अपराध ही करते या गांधीजी ड्रेस कोड की परवाह किए बिना आधी धोती में चर्चिल से मिलने पहुंचते तो देश का अपमान हो जाता।


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