मानसून सत्र से पहले सत्ता का मौसम खराब
इधर शनिवार को मोदी सरकार के कहने पर जंतर-मंतर से 21 दिनों से अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक को जबरन उठा कर ले जाया गया।

सोमवार से शुरु हो रहे संसद के मानसून सत्र में सियासत की गरज और चमक देखने मिलेगी, इतना तो तय था लेकिन सत्र शुरु होने से पहले सरकार के खिलाफ जनता की नाराजगी फूट पड़ेगी, इसका अनुमान मोदी सरकार को भी नहीं रहा होगा। पिछले चार हफ्तों से जंतर-मंतर पर धरना कर रही कॉकरोच जनता पार्टी ने ये ऐलान किया था कि 20 जुलाई को जंतर-मंतर से संसद मार्च किया जाएगा। इस ऐलान में विपक्ष के कई दलों की भी सहमति थी। लेकिन इस बीच शुक्रवार और शनिवार को दो बड़ी घटनाएं हुईं। एक तो देहरादून में राहुल गांधी ने 17 जुलाई शुक्रवार को छात्रों की गूंज रैली की, जिसमें कम से कम दो लाख छात्र शामिल हुए। जबकि इस रैली की जगह पहले सरकार ने बदली, फिर रास्ते के पेड़ काटे ताकि लोगों को आने में परेशानी हो और साथ ही एक लोकगायिका का कार्यक्रम रखवा दिया, जिसमें मुफ्त प्रवेश दिया गया। लेकिन इसके बावजूद युवाओं ने मनोरंजन की जगह अपने भविष्य की चिंता करते हुए राहुल गांधी के कार्यक्रम में शिरकत की। यहां भाजपा को बड़ा झटका लगा।
इधर शनिवार को मोदी सरकार के कहने पर जंतर-मंतर से 21 दिनों से अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक को जबरन उठा कर ले जाया गया। वहां जिस दबे-छिपे तरीके से इस कार्रवाई को अंजाम दिया गया, उससे जाहिर हो गया कि सरकार आंदोलनकारियों को डराना-धमकाना चाहती है। असल में पहले मोदी सरकार ने इस प्रदर्शन को हल्के में लिया था, मुमकिन है उसे लगा हो कि थोड़े बहुत नारे लगाने और भाषण देने के बाद मंच खाली हो जाएगा। हालांकि सरकार के कहने पर दिल्ली पुलिस ने कभी पानी, कभी बिजली रोककर तो कभी तिरपाल लगाने में रुकावट डाल कर आंदोलनकारियों को परेशान किया, प्रदर्शनकारी फिर भी डटे रहे और विपक्ष के नेताओं का जंतर-मंतर पर आने का सिलसिला तेज हुआ तो सरकार के कान खड़े हुए। शुक्रवार को अचानक दिल्ली पुलिस कमिश्नर का तबादला किया गया। शुक्रवार सुबह दिल्ली पुलिस कमिश्नर सतीश गोलछा जब वन महोत्सव कार्यक्रम में थे, तब उन्हें अपने तबादले और नए कमिश्नर के आने की जानकारी मिली। यहां तक कि हेडक्वार्टर को भी इसकी जानकारी नहीं थी, जो काफी अजीब बात है। सुप्रीम कोर्ट के 'प्रकाश सिंह जजमेंटÓ और राज्य पुलिस अधिनियमों (जैसे राजस्थान पुलिस अधिनियम, आदि) के अनुसार, एक पुलिस कमिश्नर का न्यूनतम कार्यकाल 2 साल निर्धारित किया गया है। इस हिसाब से देखें तो सतीश गोलछा पिछले साल ही दिल्ली पुलिस कमिश्नर बने थे, तो उन्हें अभी एक साल और इस पद पर रहना था। लेकिन उन्हें बदलने का आदेश अचानक आया। आईबी के पूर्व स्पेशल डायरेक्टर रहे 1994 बैच के अधिकारी अनुराग कुमार ने शुक्रवार को पद संभाला और शनिवार सुबह जंतर-मंतर से सोनम वांगचुक उठा कर अस्पताल पहुंचा दिए गए।
रविवार को उनकी पत्नी गीतांजलि की याचिका पर अदालत ने सुनवाई की कि उन्हें सफदरजंग की जगह गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में भर्ती किया जाए। लेकिन इसकी अनुमति नहीं दी गई। दिल्ली हाईकोर्ट में जस्टिस मिनी पुष्करणा की एकल बेंच ने मामले की विशेष सुनवाई करते हुए कहा कि 'हर जिंदगी कीमती है।Ó इससे पहले दिल्ली पुलिस का तर्क भी यही था कि सोनम वांगचुक की हालत खराब थी। लेकिन मामला इतना सीधा नहीं लगता। इसी मोदी सरकार में 2018 में प्रो.जी डी अग्रवाल ने भी गंगा नदी बचाने के लिए 111 दिनों के अनशन के बाद दम तोड़ दिया था। लेकिन तब मोदी सरकार ने उन्हें बचाने की कोई कोशिश नहीं की और न ही उनकी मांगों पर ध्यान दिया। खास बात यह है कि 2010 में भी प्रो. अग्रवाल ने 38 दिनों का अनशन किया था, तब यूपीए सरकार ने उनकी मांग भी मानी और अनशन खत्म करवाया था। उसके बाद 2011 में अन्ना हजारे के अनशन को भी यूपीए सरकार ने खत्म करवाया। अभी सोनम वांगचुक के लिए कांग्रेस नेता पवन खेड़ा सोनिया गांधी के कहने पर ही जंतर-मंतर गए। क्योंकि सोनिया ने याद दिलाया कि 1984 में अपनी मौत से कुछ महीने पहले सोनम वांगचुक के पिता सोनम वांग्याल का अनशन खत्म करवाया था। लेकिन मोदी सरकार का रवैया अनशन खत्म करवाने की जगह अपना जोर दिखाने का है। इसलिए आंदोलन के बीच ही पुलिस कमिश्नर बदल गए और आंदोलनकारियों के हौसले पस्त करने की कोशिश की। मगर यहां बाजी उल्टी पड़ गई, शनिवार को जंतर-मंतर पर सरकार के अनुमान से कहीं ज्यादा लोग पहुंचे, ये सिलसिला रविवार को भी जारी रहा। जिस तरह के नारे यहां लगे, पोस्टर लहराए गए, उनसे जाहिर हो गया कि अब धर्मेन्द्र प्रधान से ज्यादा नरेन्द्र मोदी के लिए नाराजगी कायम हुई है।
दरअसल सत्ता के बारह सालों में नरेन्द्र मोदी ने कई बार जनभावनाओं को कुचलने का काम किया है और ऐसे फैसले लिए हैं जिनमें लोगों की जान दांव पर लगी। नोटबंदी, जीएसटी, कोरोना लॉकडाउन जैसे फैसले देशहित के नाम पर लिए गए और इनमें लोगों को जानलेवा नुकसान हुआ। वहीं जब अपने हक के लिए आवाज उठाते हुए लोगों ने शाहीन बाग जैसे आंदोलन किए, जब किसान तीन काले कृषि कानूनों के खिलाफ साल भर सड़क पर बैठे रहे, जब महिला पहलवान जंतर-मंतर पर इंसाफ की लड़ाई लड़ने के लिए बैठीं तो मोदी सरकार ने उनके साथ कैसा सलूक किया, ये भी देश ने देखा। किसान आंदोलन को तो सरकार पूरी तरह कुचलने के लिए सारे हथकंडे अपना ही रही थी, लेकिन राकेश टिकैत की आंखों से जब नाइंसाफी के खिलाफ आंसू टपके तो सारा मामला पलट गया। जिस किसान आंदोलन को मोदी सरकार ने खत्म समझ लिया था, उसमें नयी जान पड़ गई। आखिरकार मोदी को अपने कदम पीछे लेने पड़े। इसके बावजूद मोदी सरकार ने कोई सबक नहीं सीखा और आम जनता की उपेक्षा करना उसने जारी रखा। अब जंतर-मंतर पर अभिजित दिपके के आंसू भी टपके हैं और सोनम वांगचुक की जगह दिपके ने अनशन करना शुरु कर दिया है। देखना होगा, कल का दिन सियासत में कैसा मोड़ लाता है।


