बांग्लादेश में राजनैतिक बदलाव
भारत से पड़ोसी देश बांग्लादेश में एक बड़ा राजनैतिक बदलाव आया है। देश आखिरकार एक स्थिर सरकार हासिल करने की तरफ बढ़ा है

भारत से पड़ोसी देश बांग्लादेश में एक बड़ा राजनैतिक बदलाव आया है। देश आखिरकार एक स्थिर सरकार हासिल करने की तरफ बढ़ा है। 2024 में शेख हसीना की सरकार गिरा दी गई थी, और उन्हें भारत में राजनैतिक शरण लेकर अपनी प्राणरक्षा करनी पड़ी। इसके बाद मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार चली और इस दौरान न केवल अल्पसंख्यक हिंदुओं के लिए अविचारित हिंसा की गई, बल्कि भारत के खिलाफ तल्खी बढ़ाने वाले कई बयान अहम पदों पर बैठे नेताओं ने दिए। बांग्लादेश ने उस पाकिस्तान के साथ नजदीकी बढ़ाई है, जिसके अत्याचारों के कारण उसे इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान से अलग करवाया था। बहरहाल, युनूस सरकार पर लगातार चुनाव करवाने का दबाव बना, आखिरकार 12 फरवरी 2026 को बांग्लादेश में आम चुनाव हुए थे। इस चुनाव में अवामी लीग को हिस्सा लेने नहीं दिया गया। शेख हसीना ने इन चुनावों को रद्द करने की मांग की है, लेकिन अब यह तय है कि तारिक रहमान देश की कमान संभालने जा रहे हैं। पिछले 35 सालों में शेख हसीना और खालिदा जिया ही बांग्लादेश का नेतृत्व करती रहीं, लेकिन अब बेगमों का राज बांग्लादेश में इतिहास बन गया है और दिवंगत खालिदा जिया के बेटे देश संभालने जा रहे हैं।
17 फरवरी को तारिक रहमान प्रधानमंत्री पद की शपथ लेंगे और इसमें उन्होंने सार्क देशों के नेताओं को आमंत्रित किया है। जिसके बाद सवाल उठने लगे हैं कि क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इसमें शामिल होंगे, क्योंकि जाहिर है सार्क में पाकिस्तान भी है और शाहबाज शरीफ संभवत: बांग्लादेश पहुंचेंगे ही। बहरहाल, प्रधानमंत्री मोदी ने शुक्रवार को तारिक रहमान से फ़ोन पर बात की और सोशल मीडिया पर बधाई भी दी। तारिक रहमान ने भी भारत के साथ अच्छे संबंध बनाने की इच्छा जताई है। लेकिन क्या मात्र इच्छा जताने से दोनों देशों के बीच उलझे हुए तार सुलझेंगे, ये देखना होगा।
तारिक रहमान ने अमेरिका फर्स्ट के नारे की तरह 'बांग्लादेश फर्स्ट' का नारा दिया है। जो राष्ट्रवाद के नए फैशन की तरह बन चुका है। बेशक हर राजनेता, हर राष्ट्रप्रमुख अपने ही देश को सर्वोपरि रखता है, लेकिन उसे फलाना फर्स्ट या ढिकाना फर्स्ट के नारे के तहत व्याख्यायित करना जुबानी प्रचार से ज्यादा कुछ नहीं है। तारिक रहमान ने कहा है कि भारत, चीन और पाकिस्तान से बराबर दूरी रखना चाहते हैं। उन्होंने पहले कहा था, 'न दिल्ली, न पिंडी, बांग्लादेश सबसे पहले।' अब जीत के बाद अपनी पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में तारिक रहमान ने कहा कि उनकी सरकार की विदेश नीति बांग्लादेश और उसके लोगों के हितों पर आधारित होगी। कोई देश-केंद्रित नीति नहीं होगी। उन्होंने कहा, 'चीन विकास के मामले में दोस्त है, लेकिन अगर कुछ बांग्लादेश के हित में नहीं होगा तो हम उसे नहीं मानेंगे। बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव को देखेंगे कि क्या यह हमारी अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा है।' वहीं शेख हसीना के प्रत्यर्पण के सवाल पर उन्होंने कहा कि यह क़ानूनी प्रक्रिया पर निर्भर करेगा। अवामी लीग समर्थकों पर केस और परेशानी के बारे में कहा कि कानून का राज चलेगा। उन्होंने सभी राजनीतिक दलों से एकता की अपील की और कहा कि राष्ट्र निर्माण में सबकी ज़रूरत है। चुनाव के बाद कोई बदला या हिंसा नहीं होगी। उन्होंने अपनी पार्टी बीएनपी के कार्यकर्ताओं से शांति बनाए रखने को कहा और विजय जुलूस नहीं निकालने का निर्देश दिया।
बता दें कि बीएनपी ने 300 में से क़रीब 209 सीटें जीतीं। वहीं जमात-ए-इस्लामी ने 68 सीटें जीतीं हैं, जो भारत के लिए चिंता का सबब है। तारिक रहमान ने तो भारत के साथ अच्छे संबंधों को रखने की इच्छा जताई है, लेकिन शेख हसीना का प्रत्यर्पण और जमात के प्रभाव में उठती भारत-विरोधी आवाजों को शांत करने के मुद्दे पर वे क्या करते हैं, उसी के आधार पर पता चलेगा कि आगे जाकर भारत और बांग्लादेश के संबंध कैसे रहेंगे।
जमात-ए-इस्लामी और उसके 11 सहयोगियों ने जिन सीटों पर जीत हासिल की है, उनमें से एक बड़ा हिस्सा पश्चिम बंगाल और असम की सीमा से लगे बांग्लादेशी जिलों में स्थित हैं। जमात की चुनावी ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उसने पश्चिम बंगाल के छह जिलों जलपाईगुड़ी, मालदा, मुर्शिदाबाद, नदिया, उत्तर 24 परगना और दक्षिण 24 परगना से लगी सीमा के साथ-साथ असम के सिलचर से लगे क्षेत्रों में अपना प्रभुत्व फिर से स्थापित कर लिया है। सुरक्षा जानकारों का मानना है कि यह स्थिति भारत के सीमा सुरक्षा बल और खुफिया एजेंसियों के लिए चुनौती बन सकती है। सीमा के वे हिस्से जहां कंटीले तार नहीं लगे हैं, वे लंबे समय से मानव तस्करी और तस्करी के लिए उपयोग किए जाते रहे हैं। इस फैसले के बाद भारत को हाई अलर्ट पर रखा गया है। ढाका के राजनीतिक विश्लेषकों का आकलन है कि सरहदी क्षेत्रों में जमात की जीत की एक बड़ी वजह ये है कि उन क्षेत्रों में बंटवारे के बाद भारत से आने वाले मुसलमान हैं। उनके वंशज जमात को वोट कर रहे हैं और उनकी आबादी में तेजी से इजाफा हुआ है।
भारत में जल्द ही असम और प.बंगाल में चुनाव हैं, जहां सांप्रदायिक धु्रवीकरण को बढ़ावा देने की कोशिश भाजपा कर रही है। पड़ोसी जिलों में जमात की मौजूदगी इस धु्रवीकरण को न केवल बढ़ाएगी, बल्कि देश की सुरक्षा के लिए खतरा भी पैदा करेगी। अब नरेन्द्र मोदी पर निर्भर करता है कि वे भाजपा का चुनावी हित पहले रखते हैं या देश की आंतरिक सुरक्षा उनकी प्राथमिकता रहेगी।


