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संकट के वक्त सत्र-सत्र का खेल

केंद्र सरकार ने 16, 17 और 18 अप्रैल को संसद का विशेष सत्र बुलाने का फैसला लिया है।

संकट के वक्त सत्र-सत्र का खेल
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केंद्र सरकार ने 16, 17 और 18 अप्रैल को संसद का विशेष सत्र बुलाने का फैसला लिया है। संसदीय व्यवस्था यह है कि संसद का विशेष सत्र आमतौर पर तब बुलाया जाता है जब सरकार को किसी महत्वपूर्ण विधायी कार्य, राष्ट्रीय मुद्दे, या आपातकालीन स्थिति पर तत्काल चर्चा या निर्णय लेने की आवश्यकता होती है। मोदी सरकार नारी शक्ति वंदन अधिनियम को पारित करवाने के लिए 2023 में ऐसा सत्र बुला चुकी है, इससे पहले 30 जून 2017 को जीएसटी लागू करने के लिए भी संसद का विशेष सत्र बुलाया गया था। लेकिन इस बार बजट सत्र के फौरन बाद ही तीन दिन का सत्र बुलाया जा रहा है। अब यह विशेष सत्र कहलाएगा या नहीं, इस पर सवाल है, क्योंकि 2 अप्रैल को बजट सत्र समाप्त होना था, लेकिन अब इसे महिला आरक्षण बिल से संबंधित विशेष कार्यों के लिए स्थगित कर दिया गया है। तो चाहें इसे विशेष सत्र कहें या बजट सत्र का ही हिस्सा मानें, कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा। क्योंकि असली सवाल तो यह है कि इस तीन दिन के सत्र से देश क्या हासिल करने जा रहा है। और क्यों पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के बीच में सरकार को इस सत्र की आवश्यकता पड़ी?

अभी 9 अप्रैल को असम, केरल और पुड्डुचेरी में मतदान हो जाएंगे, लेकिन तमिलनाडु में 23 अप्रैल और प.बंगाल में 23 और 29 अप्रैल को वोट पड़ने वाले हैं। भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन चुके इन दो महत्वपूर्ण राज्यों में चुनावों से ठीक पहले संसद का यह सत्र बुलाने पर अब भाजपा की नीयत पर सवाल उठ रहे हैं। दोनों राज्यों में आचार संहिता लागू रहेगी, यानी कोई महत्वपूर्ण घोषणा, उद्घाटन, शिलान्यास जैसे कार्य फिलहाल सरकारें नहीं कर पाएंगी। तो क्या संसद के जरिए इन दोनों राज्यों की महिला मतदाताओं को साधने की कोई चालाकी की जा रही है। याद रहे कि बिहार में इसी तरह रोजगार सहायता के नाम पर 10-10 हजार रुपए महिलाओं के खाते में डाले गए थे, उस पर विपक्षी दल बेईमानी और आचार संहिता उल्लंघन का आरोप लगाते रहे, लेकिन इसे रोकने की हिम्मत उन संवैधानिक संस्थाओं ने नहीं दिखाईं, जिन पर लोकतंत्र की रक्षा और निष्पक्ष चुनाव कराने की महती जिम्मेदारी है।

बहरहाल, 16,17,18 अप्रैल को संसद का विशेष सत्र बुलाने के पीछे चार कारण बताए जा रहे हैं-

1.महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण को 2027 की जनगणना से अलग करना

2.लोकसभा और राज्य विधानसभाओं का विस्तार, अर्थात सीटें बढ़ाना

3.महिलाओं के लिए विस्तारित लोकसभा में 273 सीटें आरक्षित करना

और

4. 2011 की जनगणना के आंकड़ों का उपयोग करके परिसीमन करना, साथ ही राज्यवार अनुपात को बनाए रखना।

देश की बढ़ती आबादी के मुताबिक निर्वाचन क्षेत्रों में बदलाव जरूरी है, और महिलाओं का प्रतिनिधित्व संसद और विधानसभा में बढ़ाना भी अत्यंत आवश्यक है। लेकिन इसके लिए यही वक्त क्यों चुना गया। 2023 से नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित हो चुका है और कोरोना काल बीते भी छह साल हो गए हैं। जनगणना 2021 में न सही, 2022 या 2023 तक तो कराई ही जा सकती थी। लेकिन सरकार इसे टालती रही और अब जाकर इसकी प्रक्रिया शुरु हुई है। 2027 तक जनगणना पूरी होगी, ऐसी उम्मीद है। उसके बाद भी सरकार के पास सत्ता के दो साल बचे ही रहेंगे। फिलहाल तो जिस तरह नीतीश कुमार, चंद्रबाबू नायडू या बाकी एनडीए सहयोगियों पर भाजपा का दबदबा बना हुआ है, उसमें मध्यावधि चुनाव की संभावना भी नहीं है। तो सरकार पहले जनगणना पूरी करवा लेती, फिर ताजा आंकड़ों के मुताबिक परिसीमन पर फैसला लेती और उस के बाद महिला आरक्षण को लागू करवाती, तो यह तार्किक प्रक्रिया लगती। लेकिन अभी फिर यही नजर आ रहा है कि जैसे हड़बड़ी में जीएसटी लागू कर दिया गया था और फिर बार-बार इसमें बदलाव हुए, या नोटबंदी लागू करने के बाद बैंक से पैसे निकालने की मियाद बढ़ाई जाती रही, वैसा ही हश्र इस बार भी होने वाला है।

दरअसल मोदी सरकार के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि वह किसी भी फैसले में विपक्ष को साथ लेना जरूरी नहीं समझती है। कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने बताया है कि 16 से 26 मार्च के बीच कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और संसदीय कार्यमंत्री किरण रिजीजू के बीच पत्र व्यवहार हुआ, जिसमें श्री खड़गे ने किरण रिजीजू से मांग की कि 29 अप्रैल को चुनाव खत्म होने के बाद सर्वदलीय बैठक बुलाई जाए ताकि संविधान संशोधन पर चर्चा हो सके। लेकिन जाहिर है इस मांग को नजरंदाज कर सरकार ने सत्र बुलाने का इकतरफा फैसला ले लिया। सरकार इसके पीछे महिला आरक्षण को लागू करने का तर्क दे, लेकिन ऐसा लग रहा है कि सत्र का असली मकसद 2027 की जनगणना से पहले और 2029 के आम चुनावों से ठीक पहले विधायिका के विस्तार या परिसीमन को आगे बढ़ाना है। दक्षिण भारत के राज्यों में उत्तर की अपेक्षा आबादी कम है और उन्हें चिंता है कि नए परिसीमन से उनके प्रतिनिधित्व पर असर पड़ेगा। हालांकि नरेन्द्र मोदी ने इस बारे में भी तर्क दिया है कि अगर लोकसभा की सीटों की संख्या 50प्रतिशत बढ़ा दी जाए और प्रत्येक राज्य की सीटों की संख्या भी 50प्रतिशत बढ़ा दी जाए, तो दक्षिण भारतीय राज्यों को कोई नुकसान नहीं होगा। लेकिन कांग्रेस ने इसमें भी खुलासा किया है कि जैसे लोकसभा में उत्तर प्रदेश और केरल की सीटों का अंतर अभी 60 है।

प्रधानमंत्री के प्रस्ताव से यह अंतर बढ़कर 90 हो जाएगा। इसी तरह उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु की सीटों का अंतर 41 से बढ़कर कम से कम 61 हो जाएगा। कांग्रेस का कहना है कि ऐसे और भी उदाहरण दिए जा सकते हैं। सरकार एक ऐसे प्रस्ताव को जबरदस्ती थोप रही है, जिससे बड़े और अधिक आबादी वाले राज्यों को ही फायदा होगा, क्योंकि उनकी पहले से ही बड़ी संख्या और भी बढ़ जाएगी। सिर्फ दक्षिण भारत ही नहीं, बल्कि पंजाब, हरियाणा और उत्तर-पूर्वी राज्यों का सापेक्षिक प्रभाव भी कम हो जाएगा।

कांग्रेस की ये चिंताएं वाजिब हैं। देश में जरूरत और वक्त के हिसाब से संविधान संशोधन होने चाहिए, सभी वर्गों और राज्यों को समुचित प्रतिनिधित्व मिले, यह भी देखना सरकार का काम है। लेकिन चुनाव के बीच में इस जरूरी मुद्दे पर पर्याप्त राय-मशविरे के सरकार ऐसा क्यों कर रही है, यह सवाल तो उठेगा ही। वैसे भी इस समय ईरान के खिलाफ छेड़े गए युद्ध के कारण जो गंभीर संकट खड़ा हुआ है, उसमें सरकार की प्राथमिकता आम आदमी को फौरी राहत पहुंचाने की होनी चाहिए थी। लेकिन सरकार सत्र-सत्र खेलकर फिर ध्यान भटकाने में लगी है।


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