संसद में गतिरोध और सुविधा का लोकतंत्र
संसद के मानसून सत्र को खत्म होने में बस दो दिन बचे हैं। 13 अगस्त को सत्र खत्म हो जाएगा।

संसद के मानसून सत्र को खत्म होने में बस दो दिन बचे हैं। 13 अगस्त को सत्र खत्म हो जाएगा। लेकिन इन तीन हफ्तों में अब तक एक भी दिन ऐसा नहीं बीता जब सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच गतिरोध खत्म हुआ हो। बल्कि मंगलवार को अजीब नजारा देखने मिला जब एनडीए के सांसदों ने भी संसद परिसर में खड़े होकर हंगामा किया और राहुल गांधी से जवाब मांगा। राहुल गांधी झारखंड क्यों नहीं जा रहे, इस पर सवाल उठाया। दरअसल जंतर-मंतर पर हुए सफल छात्र आंदोलन के बाद से सरकार लगातार अपने कदम पीछे हटाने पर मजबूर हो रही है। पहले तो नरेन्द्र मोदी को धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा लेना पड़ा। इस बीच झारखंड में भी परीक्षा में गड़बड़ी पर बड़ा छात्र आंदोलन खड़ा हो चुका है, तो भाजपा और उसके साथी दल यहां राहुल गांधी को घेर रहे हैं, उनसे झारखंड पर जवाब मांग रहे हैं। हालांकि राहुल गांधी ने सोमवार को एक प्रेस कांफ्रेंस कर साफ कहा कि झारखंड में प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर पुलिस ने जो कार्रवाई की वह ठीक नहीं है और वे भी इस तरह की हिंसा का समर्थन नहीं करते हैं। इससे पहले राहुल गांधी ने बाकायदा आंदोलनकारी छात्रों से फोन पर बात भी की थी।
लेकिन सबसे ज्यादा हैरानी की बात यह है कि अगर भाजपा राहुल गांधी को कुछ नहीं समझती, कांग्रेस पार्टी को राजनीति में अप्रासंगिक मानती है, तो फिर उसके सांसद यह मांग क्यों कर रहे हैं कि राहुल गांधी झारखंड जाएं। वे यही मांग प्रधानमंत्री मोदी से क्यों नहीं करते। अगर वे ऐसा मानते हैं कि झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा के साथ कांग्रेस गठबंधन सरकार में शामिल है, और इस नाते राहुल गांधी को वहां जाना चाहिए। तो इस तर्क के हिसाब से तो जंतर-मंतर पर पहले दिन ही नरेन्द्र मोदी, अमित शाह और धर्मेन्द्र प्रधान को आना चाहिए था। असल में भाजपा भी जानती है कि उसका मकसद सिर्फ हंगामा करना है, समाधान देना नहीं। इसलिए न जंतर-मंतर न झारखंड मोदी-शाह कहीं नजर नहीं आए और सारा ठीकरा अब राहुल गांधी पर फोड़ा जा रहा है। लेकिन भाजपा के इस पैंतरे का उल्टा असर हो रहा है। कहा जा रहा है कि भाजपा सांसदों को भी प्रधानमंत्री नहीं बल्कि राहुल गांधी से उम्मीद है कि छात्रों का हित वही सोचेंगे।
बहरहाल, झारखंड में सरकार और छात्र संगठनों के बीच का गतिरोध किस तरह खत्म होता है, यह जल्द सामने होगा। लेकिन इस समय चिंता इस बात की भी करना चाहिए कि किस तरह पूरा मानसून सत्र लगभग बेकार चला गया क्योंकि अमित शाह और नरेन्द्र मोदी सदन में आने से बचते रहे। मोदी सरकार का दावा है कि विपक्ष की लंबे समय से चली आ रही मांग को देखते हुए छात्र प्रदर्शनों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई पर लोकसभा में विस्तृत चर्चा कराने और गृह मंत्री अमित शाह से जवाब दिलाने की पेशकश की गई। लेकिन कांग्रेस इसे पर्याप्त नहीं मान रही है। कांग्रेस का कहना है कि छात्रों के मुद्दे पर केवल सामान्य चर्चा या गृह मंत्री का भाषण पर्याप्त नहीं है। पार्टी की स्पष्ट तौर पर तीन मांगें हैं-
पहली मांग छात्र प्रदर्शन के दौरान कथित पुलिस कार्रवाई को लेकर गृह मंत्री अमित शाह से साफ़ जवाब की है।
दूसरी मांग छात्रों के खिलाफ हुई कार्रवाई को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से माफी की है।
तीसरी मांग अयोध्या के राम मंदिर के लिए मिले चंदे में कथित चोरी के आरोपों पर संसद में चर्चा और प्रधानमंत्री के जवाब की है।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा है कि इन मुद्दों पर कोई समझौता नहीं होगा। सोमवार को अंग्रेजी दैनिक द हिंदू में राहुल गांधी ने एक लेख लिखकर इन मांगों को दोहराया था, फिर सोमवार शाम ही मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी ने संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस कर फिर से इन्हीं बातों को कहा था। इसके अलावा वे जिस मंच पर जाते हैं, वहां यही सवाल अमित शाह के सामने रखते हैं कि क्या आपने कील लगी लाठियां और पैलेट गन चलाने के आदेश दिए और अगर आपने नहीं दिए तो फिर गृह मंत्रालय से किसने ऐसा करने कहा। इतने ज्यादा सरल और स्पष्ट शब्दों में ये सवाल पूछे गए हैं, फिर भी अमित शाह सीधा जवाब देने की जगह अब भी इस मुद्दे पर चर्चा की बात कह रहे हैं। उनका यह रवैया नरेन्द्र मोदी की तरह ही है, जिनसे अमेरिका में सवाल गौतम अडानी के साथ संबंधों को लेकर हुआ था और उन्होंने जवाब दिया था कि भारत लोकतंत्र की जननी है।
बहरहाल, मोदी-शाह के बचाव में उतरे संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सोमवार को लोकसभा में कहा कि सरकार छात्रों और युवाओं के आंदोलनों तथा उनके खिलाफ हुई पुलिस कार्रवाई पर विस्तृत चर्चा के लिए तैयार है। गृह मंत्री अमित शाह इस चर्चा का सरकार की ओर से जवाब देंगे और हर मुद्दे पर बिंदुवार प्रतिक्रिया देंगे। लेकिन सरकार ने इसके साथ एक शर्त भी रखी कि विपक्ष को चर्चा के दौरान सदन में टोका-टोकी व हंगामा नहीं करना चाहिए और गृह मंत्री का जवाब शांतिपूर्वक सुनना चाहिए।
पता नहीं किस तरह का लोकतंत्र नरेन्द्र मोदी बनाना चाहते हैं, जहां वे विपक्ष को भी अपनी कठपुतली की तरह नचाने की कोशिश में लगे हैं।
सरकार का कहना है कि विपक्ष कई दिनों से अमित शाह के संसद में बयान की मांग कर रहा था और अब जब सरकार चर्चा के लिए तैयार है तो विपक्ष को चर्चा से भागना नहीं चाहिए। राहुल गांधी ने भी साफ कह दिया कि विपक्ष की मांग यह कभी नहीं थी कि अमित शाह संसद में आकर छात्रों या युवाओं से जुड़े सामान्य मुद्दों पर भाषण दें। उनके मुताबिक, असली सवाल यह है कि दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे छात्रों के खिलाफ कथित पुलिस कार्रवाई का आदेश किसने दिया।
सरकार इसी तरह राम मंदिर चढ़ावा चोरी पर भी टालमटोल करती दिखी है। कहा तो जा रहा है कि सरकार चर्चा के लिए तैयार है। लेकिन यह चर्चा कभी हो पाएगी या नहीं, इसमें संदेह है। क्योंकि किरण रिजिजू ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से इस मामले की जांच के लिए एसआईटी बनाई गई है और राज्य स्तर पर कई कदम उठाए जा रहे हैं। सरकार का संकेत है कि चूंकि राज्य स्तर पर जांच चल रही है, इसलिए इसे संसद में उठाने की ज़रूरत को लेकर विपक्ष की मांग स्वीकार करना जरूरी नहीं है।
राम मंदिर बनाने का श्रेय लेना हो तो संसद में उस पर मोदी अपनी वाहवाही कर सकते हैं, लेकिन भक्तों की तरफ से चढ़ाए गए करोड़ों रुपए चोरी कर लिए गए, उस पर संसद में सरकार को चर्चा जरूरी नहीं लगती है, तो समझा जा सकता है कि मोदी लोकतंत्र को भी अपनी सुविधा से ही इस्तेमाल कर रहे हैं।


