नीति आयोग की रिपोर्ट और 2047 का भारत
प्रधानमंत्री मोदी आज के हालात सुधारने की जगह या तो हजार साल पुराने भारत की बात करते हैं या फिर 2047 की बात करते हैं।

प्रधानमंत्री मोदी आज के हालात सुधारने की जगह या तो हजार साल पुराने भारत की बात करते हैं या फिर 2047 की बात करते हैं। योजना आयोग की जगह उन्होंने जो नीति आयोग बनाया है, उसकी भी हालिया रिपोर्ट रिइमैजिनिंग स्किलिंग फॉर विकसित भारत एट 2047 है, यानी '2047 में विकसित भारत के लिए कौशल विकास (स्किलिंग) की पुनर्कल्पना'। मोदी चाहते हैं कि 2047 तक भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य को हासिल करने के लिए, देश की मौजूदा कौशल प्रशिक्षण और शिक्षा प्रणाली में नए सिरे से बड़े और प्रभावी बदलाव किया जाए। इसी पर नीति आयोग ने पूरी रिपोर्ट बना दी है कि किस तरह कौशल विकास स्कूलों से शुरु हो, डिजिटल स्किल्स पासपोर्ट हो यानी अलग-अलग जगहों से हासिल स्किल्स और ट्रेनिंग को डिजीटली दर्ज किया जाए, ताकि नौकरी या शिक्षा में उसका उपयोग हो, आईटीआई और पॉलिटेक्निक को स्थानीय उद्योगों के मुताबिक लचीला बनाया जाए, महिलाओं के लिए रोजगार के मौके और स्किल ट्रेनिंग के लिए लचीली व्यवस्था हो। कई तरह के सुझाव नीति आयोग की रिपोर्ट में हैं। लेकिन इन का जमीन असर पर तो तभी दिखाई देगा, जब आज के हालात सुधारे जाएं। क्योंकि नौकरी, रोजगार, स्किल ट्रेनिंग आदि के जो आंकड़े नीति आयोग ने पेश किए हैं, उनमें मोदी सरकार की असलियत सामने आ गई है कि पिछले बारह सालों में उसने देश को कितना पीछे धकेल दिया है।
2014 में नरेन्द्र मोदी ने वादा किया था कि हर साल दो करोड़ रोजगार देंगे। इस हिसाब से अब तक 24 करोड़ लोगों को रोजगार मिल जाना चाहिए था। लेकिन नीति आयोग बता रहा है कि भारत की करीब आधी आबादी तो मजदूरी करती है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 65.4 करोड़ (यानी कुल 145 करोड़ की 45.1 प्रतिशत) आबादी मजदूरी करती है। इनमें 8.4 प्रतिशत कार्यबल तो अपना काम करने वाले (स्वरोजगार) हैं, 21.7 प्रतिशत लोगों के पास नियमित वेतन वाली नौकरी है, जबकि 19.8 प्रतिशत लोग दिहाड़ी मजदूरी का काम करते हैं। वहीं 79.6 करोड़ यानी 54.9 प्रतिशत लोग मजदूर वर्ग से बाहर हैं। इनमें 29.1 करोड़ छात्र हैं, वहीं 59 साल से अधिक या 5 साल से कम उम्र के 27 करोड़ लोग हैं और 14.7 करोड़ अन्य शामिल हैं। लेकिन इस रिपोर्ट में युवाओं के बारे में जो बताया गया है वो बेहद चौंकाने वाला है, नीति आयोग बताता है कि करीब साढ़े आठ करोड़ युवा न पढ़ रहे हैं, न नौकरी कर रहे हैं, न किसी किस्म का प्रशिक्षण ले रहे हैं। नीति आयोग का अनुमान है कि 15 से 29 साल की उम्र के 8.7 करोड़ युवा न तो पढ़ाई कर रहे हैं, न ही नौकरी या ट्रेनिंग में हैं। इनमें से लगभग 88 प्रतिशत युवा घर के कामों में लगे हैं। साथ ही, युवाओं में बेरोज़गारी दर 15.6 प्रतिशत है, जिनमें युवतियों की संख्या 19.5 प्रतिशत तक है।
जिस देश में करीब 9 करोड़ युवा न पढ़ रहे हैं, न नौकरी कर रहे हैं न किसी तरह का प्रशिक्षण ले रहे हैं, उस देश के लिए कैसा खतरनाक भविष्य तैयार हो रहा है, यह समझना कठिन नहीं है। युवा शक्ति के दम पर ही भविष्य के सपने बुने जाते हैं। लेकिन खाली बैठे हताश नौजवान क्या सपनों को जीने लायक बच रहे हैं, यह सवाल अब मोदी सरकार से किया जाना चाहिए।
अच्छी बात है कि देश में शिक्षा प्रणाली में सुधार, परीक्षा व्यवस्था की खामियां, बेरोजगारी, सरकारी नौकरियों में भर्ती की धांधलियां ऐसे बेहद जरूरी विषयों पर आम जनता के बीच चर्चा तेज हो गई है। मई में नीट का पेपर लीक होने के बाद शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था की गड़बड़ियों पर सवाल उठने शुरु हुए और अब अगस्त खत्म होने तक ये सवाल खत्म नहीं हुए हैं, दबाए नहीं जा सके हैं बल्कि तेज होते जा रहे हैं। स्कूलों और कॉलेजों के बच्चे तो पूरी स्पष्टता के साथ अपनी बात सामने रख ही रहे हैं, उनके अभिभावक भी अब उनके साथ उठ खड़े हुए हैं। इसकी बेचैनी सत्तारुढ़ वर्ग में साफ देखी जा सकती है। चाहे राजस्थान में स्कूलों में वीडियो बनाने या तस्वीरें लेने पर प्रतिबंध का मामला हो, या उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी का यह दावा करना कि उनके प्रोजेक्ट अलंकार में सरकारी स्कूलों की हालत को सुधारा गया है और जो जर्जर हाल वाली तस्वीरें सामने आई हैं, वो पिछली सरकारों का स्मारक हैं। ऐसी बातें ही बता रही हैं कि सरकार अब युवाओं के भविष्य से जुड़े इस अहम मुद्दे को नजरंदाज नहीं कर सकती है, न ही किसी तरीके से सवालों को उठने से रोक सकती है।
लेकिन केवल सवाल उठना काफी नहीं है, जरूरी यह है कि सरकार उनके जवाब भी दे। फिलहाल यही नजर आ रहा है कि सरकार जवाब देने की जगह लोगों को भटकाने में ही लगी है। नरेन्द्र मोदी इस बात को अच्छे से जानते हैं कि जब तक लोग हिंदू-मुस्लिम या उग्र राष्ट्रवाद के फिजूल के सवालों में उलझे रहेंगे, उनकी सत्ता सुरक्षित रहेगी। इसलिए एक तरफ 2047 में कौशल विकास की नयी परिकल्पना पर रिपोर्ट बनती है और दूसरी तरफ 2026 में कांवड़ियों पर फूल बरसा कर करोड़ों रुपए फिजूल खर्च किए जाते हैं। इतना खर्च बच्चों के सर्वांगीण विकास पर किया जाए तो 2047 क्या उससे कहीं पहले भारत विकसित हो सकता है। मगर मौजूदा सत्ता केवल बातों में विकसित भारत चाहती है, उसे जमीन पर नहीं उतारना चाहती, यह नीति आयोग की रिपोर्ट ने जाहिर कर दिया है।


