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पूछेंगी नेहा- अदालत में कौन बा?

यह कोई छोटा-मोटा मामला नहीं था, जिसमें संबंधित व्यक्ति से उसका पक्ष न लिया जाए।

पूछेंगी नेहा- अदालत में कौन बा?
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देश में पत्रकारिता के मूल्यों को कितने नीचे गिरा दिया गया है यह तो देश पिछले डेढ़ दशकों से देख ही रहा है, लेकिन अपनी स्वतंत्र आवाज, अंतरात्मा, ईमान सब बेचकर भी क्या खबर बेचने वालों का पेट नहीं भरा है, जो अब वे महिलाओं का चरित्रहनन पर उतर आए हैं। यूपी में का बा, जैसे चुटीले गीतों से सत्तातंत्र को आईना दिखाने वाली लोकप्रिय गायिका नेहा सिंह राठौर को लेकर एबीपी न्यूज चैनल के डिजीटल प्लेटफार्म पर एक खबर चलाई गई। खबर का शीर्षक था-

नेहा सिंह राठौर वाले हॉस्टल में 'सेक्स रैकेट?' पुलिस ने मारा छापा!

इस खबर के साथ एक तरफ पुलिस की छापेमारी दिखाई जा रही है, साथ में नेहा सिंह राठौर की तस्वीर भी लगी है।

यानी कोई पूरी खबर न भी देखे, केवल खबर का शीर्षक और साथ में लगा चित्र देख ले तो यह समझे कि नेहा सिंह राठौर वेश्यावृत्ति रैकेट चला रही हैं। यह कोई छोटा-मोटा मामला नहीं था, जिसमें संबंधित व्यक्ति से उसका पक्ष न लिया जाए। अगर इस मामले में वाकई पुलिस ने छापेमारी की, तो पुलिस डायरी से ही पता चल जाता कि छापेमारी कहां हुई है और उस जगह का संबंध किससे है। लेकिन इतने गंभीर मामले वाली खबर चलाने से पहले एबीपी के पत्रकारों ने इन मामूली तथ्यों की पड़ताल भी नहीं की। खबर बाकायदा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर आ गई। जिसके बाद नेहा सिंह ने खुद एबीपी के संपादक रजनीश आहूजा से फोन पर बात की। इसका वीडियो इंस्टाग्राम और बाकी प्लेटफॉर्म पर शेयर हुआ, जिसमें साफ सुना जा सकता है कि रजनीश आहूजा नेहा सिंह से किस अकड़ में बात कर रहे हैं। फोन लगाने पर जब नेहा सिंह ने अपना परिचय दिया तो उन्होंने कहा कि हां आपका नंबर मेरे पास सेव्ड है। इसके बाद नेहा सिंह ने कहा कि- मैं आपको बताना चाहती हूं कि मैं कोई कॉलगर्ल नहीं हूं, मेरा कोई हॉस्टल नहीं है, जहां सेक्स रैकेट चलता है, तो रजनीश आहूजा ने कहा कि किसने लिखा। जाहिर है, उन्हें पता ही नहीं था कि उनके पत्रकार या संस्थान के कर्मियों ने कौन सी खबर चलाई है। जब नेहा ने उनसे सवाल किया कि मेरा कोई सेक्स रैकेट चलता है जहां आपके चैनल वाले गए हैं, तो रजनीश आहूजा कहते हैं कौन गया है, कहां गया है। लेकिन उनकी ये अनभिज्ञता उनके निर्दोष होने का प्रमाण नहीं बन सकती। क्योंकि आगे जब नेहा कहती हैं कि पूछिए अपने चैनल वालों से तो बड़ी धृष्टता से आहूजा जवाब देते हैं कि आप ही फोन कर रही हैं तो आप बता दीजिए।

ऐसा जवाब नेहा सिंह को तब सुनने मिला, जबकि वो देश का एक चर्चित चेहरा हैं, अगर कोई आम सी लड़की ऐसे दुष्प्रचार का शिकार होती, तब तो शायद संपादक महोदय सत्ता से नजदीकी की हनक में इतनी बात भी नहीं करते। नेहा सिंह इस बातचीत के दौरान लगभग रो पड़ी और रजनीश आहूजा ने बात पूरी किए बिना ही फोन काट दिया। इसके बाद चैनल की तरफ से एक स्पष्टीकरण एवं खेद जारी हुई जिसमें लिखा कि : एबीपी नेटवर्क के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लोक गायिका नेहा सिंह राठौर से संबंधित एक ख़बर प्रसारित की गई, जो तथ्यों के आधार पर ग़लत पाई गई। इस त्रुटिपूर्ण प्रसारण के लिए हमें खेद है, हम इसके लिए क्षमा प्रार्थी हैं।

भाजपा के शासन में सत्ता से नजदीकी वाले किसी चैनल से इससे ज्यादा की उम्मीद भी नहीं की जा सकती। नेहा सिंह को रूआंसा देखना कष्टदायी रहा, क्योंकि देश ने देखा है कि वे किस तरह गीतों के जरिए लोकतंत्र के सवाल उठाती रही हैं और भाजपा के तमाम प्रहारों को झेलकर भी डटी रहीं। कभी उन पर एफआईआर हुई, कभी चैनलों ने अपने मंच पर बुलाकर उन्हें घेरने की कोशिश की। लेकिन राहुल गांधी के साथ जब पुणे में वे छात्रों की गूंज के मंच पर आईं तो अब उनके हौसले को तोड़ने के लिए भाजपा ने शायद यही साजिश रची है। एबीपी का स्पष्टीकरण अपनी जगह है, लेकिन जो कोई भी खुद को पत्रकार कहे वह इतनी बड़ी खबर चलाने से पहले तथ्यों को न जांचे तो फिर उसे पत्रकार माना ही नहीं जा सकता। तथ्यों की पड़ताल करके खबरें देना पत्रकारिता का पहला उसूल है, और एबीपी लिख रहा है कि जो खबर प्रसारित हुई वह तथ्यों के आधार पर गलत पाई गई। अब देखना होगा कि माननीय मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत इस पर क्या कहेंगे। क्योंकि अभी दिल्ली प्रदर्शनों से जुड़े मामलों में पत्रकारों की सुरक्षा से जुड़ी एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान उनकी बेंच ने टिप्पणी की थी कि 'अगर हर नागरिक पत्रकार बन जाए, तो यह सबके लिए मुश्किलें पैदा करेगा।

नेहा सिंह ने इस मामले में महिला आयोग, रेखा गुप्ता, स्मृति ईरानी, कंगना रानौत जैसे लोगों से सवाल किए हैं। कंगना रानौत ने जरूर जवाब दिया है कि यह गलत है, मगर बाकियों के जवाब का इंतजार है। देखना ये भी है कि पत्रकारों से जुड़े तमाम संगठन, प्रेस क्लब आदि की तरफ से कोई भर्त्सना की जाती है या नहीं। जन संस्कृति मंच ने इस मामले की निंदा की है, जो सर्वथा सही है। वैसे इस पूरे प्रकरण में शीर्ष अदालत को भी स्वत: संज्ञान लेना चाहिए, वैसे ही जैसे 2007 के उमा खुराना मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने लिया था। सुधीर चौधरी तब लाइव इंडिया के सीईओ और प्रधान संपादक थे। उनके एक रिपोर्टर ने 30 अगस्त, 2007 को दिल्ली सरकार के एक स्कूल की शिक्षिका उमा खुराना को एक छात्रा को वेश्यावृत्ति में फंसाने का स्टिंग ऑपरेशन चलाया था। जब यह खबर प्रसारित हुई तो उसके बाद उमा खुराना पर भीड़ ने हमला किया था। शिक्षा निदेशालय ने उमा खुराना को निलंबित किया और बाद में उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया। फिर पता चला कि निजी विवाद के चलते उमा खुराना को फंसाने के लिए यह पूरा जाल बुना गया और जिसे पीड़िता दिखाया गया था, वह असल में एक नयी पत्रकार थी। अदालत ने तब इस घटना का स्वत: संज्ञान लेते हुए दिल्ली सरकार और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किए। और दिल्ली उच्च न्यायालय बनाम राज्य के मामले में 14 दिसंबर, 2007 को दिए फैसले में एक अहम सवाल उठाया था कि- ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को कैसे रोका और कम किया जा सकता है ताकि कोई निर्दोष व्यक्ति इसका शिकार न बने और उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान न पहुंचे। अदालत ने यह भी कहा था कि प्रेस की स्वतंत्रता का अधिकार एक मूल्यवान अधिकार है, लेकिन इस अधिकार के साथ सत्य बोलने और दूसरों के अधिकारों की रक्षा करने की जिम्मेदारी और कर्तव्य भी जुड़ा हुआ है।

आज क्या सुप्रीम कोर्ट ऐसे ही स्वत:संज्ञान लेकर नागरिक अधिकारों और गरिमा की रक्षा करेगा या नेहा को पूछना पड़ेगा कि अदालत में कौन बा?


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