मोदी के हाथ में त्रिशूल और डमरू
गले में भगवा गमछा, माथे पर त्रिपुंड और हाथों में भगवान शिव की तरह त्रिशूल और डमरू पकड़े हुए देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का नया अवतार सामने आया है

गले में भगवा गमछा, माथे पर त्रिपुंड और हाथों में भगवान शिव की तरह त्रिशूल और डमरू पकड़े हुए देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का नया अवतार सामने आया है। अलग-अलग विचारधारा और कार्यशैली के प्रधानमंत्री देश ने देखे हैं, लेकिन पहली बार एक ऐसे प्रधानमंत्री को देश देख रहा है, जिनकी वक्त-वक्त पर बदलती वेशभूषा फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता की याद दिलाती है। बहरहाल, प्रधानमंत्री मोदी कोई भी काम अकारण नहीं करते। इस बार हिंदुत्व का जयघोष करने वाली मुद्रा उन्होंने सोमनाथ में 8 से 11 जनवरी तक आयोजित 'सोमनाथ स्वाभिमान पर्व' के लिए धारण की। इस उत्सव को 'भव्य' बनाने में गुजरात की भाजपा सरकार ने कोई कसर नहीं छोड़ी क्योंकि इसके गहरे राजनैतिक निहितार्थ भी हैं।
एक हजार साल पहले1026 में सोमनाथ मंदिर पर पहला हमला हुआ था। उसी याद में यह उत्सव मनाया जा रहा है। गौरतलब है कि भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में सर्वप्रथम ज्योतिर्लिंग सोमनाथ का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व है। मान्यता है कि इसका निर्माण स्वयं चन्द्रदेव ने किया था, जिसका उल्लेख ऋग्वेद में भी है। लोककथाओं के अनुसार यहीं श्रीकृष्ण ने देहत्याग किया था। यह ऐतिहासिक मंदिर अब भाजपा के लिए राजनैतिक महत्व का भी बन गया है।
प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी) के अनुसार, 'यह उत्सव विनाश को याद करते हुए नहीं बल्कि आस्था, सांस्कृतिक आत्मसम्मान और पुनर्जन्म की भावना के सम्मान के रूप में मनाया जा रहा है।' दरअसल प्राचीन सोमनाथ मंदिर में कई गांवों का चढ़ावा आता था, जिससे यहां सोने, चांदी, बड़ी संख्या में मोतियों और अनमोल रत्नों समेत बड़ी धनसंपदा सदियों से जमा थी और इस वजह से विदेशी हमलावर इसे लूटना चाहते थे। महमूद गजनी ने 1026 में जब भारत पर एक और आक्रमण किया तो उस समय गुजरात में चालुक्य वंश के राजा भीम प्रथम का शासन था, महमूद गजनी ने तभी सोमनाथ पर पहला आक्रमण किया था। इसके बाद कई और शासकों और आक्रांताओं ने सोमनाथ मंदिर पर हमले किए और इसकी धन संपदा को लूटा। मध्ययुग का वह दौर ऐसा ही था, जिसमें राज्य और शक्ति बढ़ाने के लिए शासक खुलेआम लूटपाट करते थे। अभी अमेरिका इसी तरह के काम कर रहा है, बस इसमें लोकतंत्र का आवरण ओढ़ लिया है और सीधे-सीधे गैर धार्मिक स्थल को निशाना नहीं बनाया जा रहा है।
खैर, सोमनाथ पर कम से कम 16 बार आक्रमण और देश के दूसरे हिंदू धर्मस्थानों पर हुए आक्रमण के बावजूद देश से न हिंदू धर्म खत्म हुआ, न हिंदुओं के अस्तित्व पर कोई खतरा आया। लेकिन मोदीराज में आस्था के पुनर्जन्म के नाम पर करोड़ों रुपए खर्च करके सोमनाथ स्वाभिमान पर्व मनाया गया।
सोमनाथ पर भाजपा पहले भी सफल दांव खेल चुकी है। दिसंबर 1989 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने पहली बार अपने चुनावी घोषणापत्र में राम मंदिर (अयोध्या) निर्माण के मुद्दे को शामिल किया था। तब उसकी लोकसभा सीटें बढ़ीं, फिर 1991 में लाल कृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक अपनी रथ यात्रा शुरू की, जिसके बाद भारत में वही धार्मिक विभेद की खाई गहरी होनी शुरु हुई, जो भाजपा की सत्ता के लिए जरूरी थी। 1992 में बाबरी मस्जिद तोड़ी गई। फिर 1996 में भाजपा को केंद्र की सत्ता में आने का मौका पहली बार मिला। और अब नरेन्द्र मोदी के आने के बाद तो 12 सालों से भाजपा के पास सत्ता है। ध्यान रहे कि आडवाणी की रथयात्रा में गुजरात में नरेन्द्र मोदी को बड़ी जिम्मेदारी दी गई थी, जिसे मोदी ने सफलतापूर्वक निभाया।
सवाल भाजपा को सत्ता में लाने का था, तो नरेन्द्र मोदी ने पूरी तैयारी से अपनी जिम्मेदारी निभाई। लेकिन अभी प्रधानमंत्री के तौर पर तीसरा कार्यकाल संभालने के बाद मोदी लगातार अपने पद की गरिमा निभाने में नाकाम दिख रहे हैं। इंदौर में कई लोग दूषित पेयजल से मर गए, मोदी ने उफ तक नहीं की। दिल्ली से लेकर कई शहरों में हवा जानलेवा बनी हुई है। उन्नाव की पीड़िता इंसाफ के लिए लड़ती रही, मोदी चुपचाप देखते रहे। अभी अंकिता भंडारी मामले में लोगों ने आक्रोश न दिखाया होता तो भाजपा सरकार बेफिक्र बैठी रहती। उत्तरप्रदेश में लगातार महिला उत्पीड़न के मामले सामने आ रहे हैं। एसआईआर में एक तरफ कई बीएलओ काम के बोझ से मर गए, तो दूसरी तरफ बुजुर्ग और गरीब मतदाता परेशान हो रहे हैं, मोदी को इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ रहा। अरावली के पहाड़ काटने से लेकर मनरेगा खत्म करने जैसे बेसिरपैर के फैसले ले लिए गए। विपक्षी दलों को दुश्मन समझ कर उन्हें निशाने पर लिया जा रहा है। देश में महंगाई और बेरोजगारी संभल नहीं रही है। रूपया कितना गिर गया है, इस बारे में मोदी बात नहीं करते। ट्रंप हर दूसरे दिन मोदी और देश का अपमान कर रहे हैं, लेकिन विदेश मंत्रालय ऊटपटांग तर्क देकर ट्रंप और मोदी के अच्छे रिश्तों की गवाही दे रहा है। गलवान का हमला और सैनिकों की शहादत भुलाई जा चुकी है और अब चीन के साथ व्यापार शुरु हो गया है। पहलगाम और दिल्ली के आतंकी हमलों पर क्या कार्रवाई हो रही है, इसकी कोई चर्चा नहीं होती। यानी मोदी चाहें तो उनके पास करने के लिए ढेरों काम हैं। उन्हें प्राथमिकताएं तय करने में मुश्किल होगी कि पहले किस काम को करें, किस गलती को दुरुस्त करें। लेकिन ये सब छोड़कर मोदी इस बात से खुश हैं कि उन्हें सोमनाथ में एक हजार सेंकंड्स का ओंकारनाद करने का सौभाग्य मिला।
मतलब देश भी अब खुद को भाग्य के हवाले कर अनुलोम-विलोम शुरु कर दे, क्योंकि अकर्मण्यता ही अब देश का वर्तमान और भविष्य है। आजादी के बाद से अब तक सरकारों के काम करने का जो इतिहास था, वो भी मोदी मिटाने पर तुले हैं। उन्हें या तो एक हजार साल बाद के भारत की बात करना अच्छा लगता है, या एक हजार साल पहले के भारत की। आज जो है, उससे मोदी मुंह चुरा रहे हैं और जनता का ध्यान भटकाने के लिए पंडितों जैसी वेषभूषा में आ रहे हैं। मोदी को लगता है कि इस साल गुजरात के स्थानीय चुनाव, पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव और अगले साल फिर गुजरात और उप्र के चुनावों में इस तरह उन्हें धार्मिक कार्ड खेलने का मौका मिल जाएगा।
पाठक ध्यान दें मोदी का फकीरी झोला चला गया है, उन्होंने त्रिशूल और डमरू उठा लिए हैं।


