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लोकतंत्र का स्वाद चखते मोदी-शाह

राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को पुलिस ने शाम तक गिरफ्तार किया, लेकिन देर रात छोड़ना भी पड़ा।

लोकतंत्र का स्वाद चखते मोदी-शाह
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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की जुबान पर सत्ता का स्वाद चढ़ा हुआ है, लेकिन अब इंडिया गठबंधन ने इन दोनों सत्ताधीशों को लोकतंत्र का स्वाद अच्छे से चखा दिया है। मंगलवार को इंडिया के सांसदों का चुनाव आयोग तक प्रदर्शन मार्च तो बीच में ही रोक दिया गया और तमाम सांसदों को हिरासत में लिया गया। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को पुलिस ने शाम तक गिरफ्तार किया, लेकिन देर रात छोड़ना भी पड़ा। इसके बाद मोदी-शाह ने शायद मान लिया था कि अब कुछ वक्त तक इंडिया के सांसद शांत बैठेंगे। आखिर विपक्ष के 250-300 सांसदों को बार-बार इक_ा तो नहीं किया जाएगा, वह भी तब जब संसद सत्र न चल रहा हो। लेकिन मोदी-शाह की सोच के विपरीत बुधवार को मल्लिकार्जुन खड़गे ने तमाम सांसदों को दिल्ली में सागर रत्ना नाम के दक्षिण भारतीय व्यंजनों के लिए मशहूर रेस्तरां में दोपहर के भोजन पर आमंत्रित कर लिया।

भाजपा ने इसका भी मजाक उड़ाया कि क्या राहुल को पता नहीं कि सागर रत्ना शुद्ध शाकाहारी व्यंजन ही परोसता है। दरअसल मंगलवार को आकाशवाणी परिसर में जब राहुल गांधी ने खान चाचा का चिकन रोल खाया था, तो उस पर भाजपा ने खूब ट्रोल किया था कि राहुल ने नॉनवेज रोल खाया। बहरहाल, शाकाहारी और मांसाहारी भोजन के चयन पर अपना समय बिताती भाजपा ने इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया कि भोजन की मेज पर केवल भोजन ही नहीं होता है, महत्वपूर्ण रणनीतियां भी बनती हैं। खड़गे जी ने विपक्षी सांसदों के साथ अंताक्षरी खेलने के लिए भोज पर जाने का फैसला नहीं लिया था, बल्कि वहां फिर से तय किया गया कि किस तरह चुनाव आयोग तक पहुंचा जाए।

जंतर-मंतर और चुनाव आयोग के दफ्तर से कुछ ही दूरी पर स्थित सागर रत्ना से निकलते ही तमाम सांसद कुछ बसों में सवार हुए और फिर उस तरफ बढ़ चले जहां से एक रास्ता चुनाव आयोग को जाता है और दूसरा जंतर-मंतर को। दिल्ली पुलिस के लिए एक बार फिर चुनौती खड़ी हो गई कि अब इन्हें कैसे और कहां तक रोके। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक एक बार फिर राहुल गांधी को पुलिस ने हिरासत में ले लिया है, लेकिन युवा कांग्रेस और एनएसयूआई के कार्यकर्ताओं ने पुलिस बस को इस तरह घेर लिया है कि वो राहुल को कहीं ले जा न सके। इससे पहले जब बाकी सांसदों और कार्यकर्ताओं को पुलिस हिरासत में ले रही थी और राहुल गांधी पर पीछे हटने का दबाव डाल रही थी तो प्रियंका गांधी कुछ अन्य महिलाओं के साथ वहीं सड़क पर लेट गई थीं। पुलिस के अलावा रैपिड एक्शन फोर्स के जवान भी बड़ी तादाद में तैनात किए गए थे। विपक्षी सांसदों, उनके समर्थकों, कार्यकर्ताओं और पुलिस की मौजूदगी से लुटियन्स दिल्ली के इस अहम इलाके में इतनी ज्यादा भीड़ इक_ी हो चुकी थी कि कभी भी कुछ भी अनहोनी हो सकती थी।

मोदी-शाह की नजर में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष, राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष और तमाम विपक्षी सांसदों की जान की कोई कीमत नहीं है, यह बात एक बार फिर जाहिर हुई। मंगलवार की जगह बुधवार को भी दिल्ली पुलिस ने राहुल गांधी को कई बार जबरदस्ती रोकने की कोशिश की, ठीक ऐसा ही व्यवहार उनके साथ तब भी हुआ था जब जुलाई में वे प्रधानमंत्री आवास के सामने पहुंच गए थे। राहुल गांधी को जेड प्लस सिक्योरिटी मिली हुई है, यानी कम से कम 50-55 जवानों का घेरा उनके इर्द-गिर्द होना ही चाहिए। लेकिन जब दिल्ली पुलिस उन्हें घेरती है, तो यह घेरा कहां चला जाता है और किसके इशारे पर चला जाता है, इसका जवाब अमित शाह को देना चाहिए।

हालांकि राहुल गांधी अपनी जान की परवाह न करके पहले लोकतंत्र बचाने की परवाह कर रहे हैं, इसलिए लगातार सड़क पर उतर रहे हैं। और जिन लोगों के हाथों में सत्ता है, वे मोदी-शाह लगातार संविधान के खिलाफ काम कर रहे हैं। शांतिपूर्ण प्रदर्शन में बाधा डालना ऐसा ही एक काम है। विपक्षी सांसद केवल ज्ञानेश कुमार से मिलना ही तो चाहते हैं, इसमें कुछ असंवैधानिक नहीं है। लेकिन ज्ञानेश कुमार तो इस समय न जाने कहां छिपे बैठे हैं। उनका छत्तीसगढ़ दौरा भी रद्द कर दिया गया, इससे पहले भी उनके कुछ और राज्यों के दौरे रद्द हो चुके हैं। जब देश का मुख्य चुनाव आयुक्त छिप कर बैठ जाए, जब प्रधानमंत्री अपने प्रचार में लगे रहें, गृहमंत्री कानून व्यवस्था पर मुंह न खोलें तो फिर जनता को समझ जाना चाहिए कि किन हाथों से लोकतंत्र को असली खतरा है।

वैसे इस समय सवाल दिल्ली पुलिस पर भी उठ रहे हैं कि वह संविधान और कानून के हिसाब से न चलकर अमित शाह के हिसाब से क्यों चल रही है। संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) में हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मिली है। शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का अधिकार संविधान के इसी अनुच्छेद में निहित है और लोकतंत्र में इसे बहुत ही अहम माना गया है। लेकिन फिर भी दिल्ली पुलिस इस अधिकार को कुचल रही है।

भारत के पूर्व गृह सचिव और मोदी सरकार में मंत्री रहे आरके सिंह ने एक्स पर लिखा है, 'भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 के अंतर्गत शांतिपूर्वक और बिना हथियारों के प्रदर्शन करना या जुलूस निकालना नागरिकों का मौलिक अधिकार है। पुलिस दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन से क्यों रोक रही है? आईएएस और आईपीएस संविधान और क़ानून के अनुसार काम करने की शपथ लेते हैं। दिल्ली पुलिस को इसी हिसाब से काम करना चाहिए न कि किसी नेता के अवैध आदेश के अनुसार।'

जिसे भी संविधान की समझ होगी वह ऐसी ही तार्किक बात करेगा, लेकिन मोदी-शाह के राज में तर्कों को लगातार कुचला ही जा रहा है। विपक्ष को दबाने के लिए उन पर मामले दर्ज हो रहे हैं। मंगलवार के प्रदर्शन के बाद राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और इंडिया ब्लॉक के कुछ अन्य नेताओं के ख़िलाफ़ आकाशवाणी भवन में कथित तौर पर बिना अनुमति प्रवेश करने के मामले में एफ़आईआर दर्ज की गई है। राहुल गांधी ने इस पर कहा है कि उनके ख़िलाफ़ 45 एफआईआर दर्ज हो चुकी हैं और वह 100 एफआईआर चाहते हैं।

इसके बाद कम से कम मोदी-शाह को समझ जाना चाहिए कि वे किन लोगों से उलझ कर अपनी सत्ता बचाना चाहते हैं।


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