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मोदी ने मान ली बड़ी नाकामी

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ही पेश कर दिए हैं। ये और बात है कि अपनी असफलता को श्री मोदी छद्म देशभक्ति के आवरण में छिपा रहे हैं।

मोदी ने मान ली बड़ी नाकामी
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पिछले 12 सालों से देश की सत्ता पर काबिज भाजपा सरकार हर मोर्चे पर किस कदर नाकाम हो चुकी है, इसके सबूत अब खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ही पेश कर दिए हैं। ये और बात है कि अपनी असफलता को श्री मोदी छद्म देशभक्ति के आवरण में छिपा रहे हैं। अब जनता का अपना विवेक है कि वो देशभक्ति के नाम पर किस हद तक अपना शोषण और उत्पीड़न होने देती है और कहां तक सरकार की शाहखर्ची को चुपचाप बर्दाश्त करती है।

जानकारी के लिए बता दें कि रविवार को तेलंगाना में एक सभा में नरेन्द्र मोदी ने पश्चिम एशिया में चल रहे संकट का जिक्र करते हुए विदेशी मुद्रा भंडार बचाने की बात कही और इसके लिए उन्होंने पेट्रोलियम उत्पादों के इस्तेमाल को कम करने, विदेशी मुद्रा की बचत और आत्मनिर्भरता पर जोर जैसे सुझाव दिए। पेट्रोल-डीजल बचाने के लिए प्रधानमंत्री ने कारपूलिंग या मेट्रो से सफर की बात कही और कोविड के दौरान जिस तरह वर्क फ्राम होम किया जाता था, उसी को फिर से अपनाने की अपील की। नरेन्द्र मोदी ने कहा कि विदेश में शादियां, यात्राएं और छुट्टियां मनाने का चलन बढ़ रहा है। इसलिए उन्होंने अपील की कि संकट के इस समय में कम से कम एक साल तक विदेश यात्राएं स्थगित कर दें। साथ ही त्योहारों पर सोने की खरीदारी को भी एक साल के लिए टालने की सलाह दी। नरेन्द्र मोदी ने यह भी कहा कि, मैं लंबे समय से कह रहा हूं कि खाना पकाने के तेल का उपयोग 10प्रतिशत कम करें। इससे न सिर्फ देश को संकट के समय मदद मिलेगी, बल्कि आपके परिवार की सेहत भी सुधरेगी।

ध्यान रहे कि जिस प.एशिया के संकट के हवाले से आर्थिक तंगी की बात मोदी ने की है, वो एक-दो हफ्ते में नहीं कायम हुआ है। 28 फरवरी को जब अमेरिका-इजरायल ने ईरान पर हमला किया था और 2 मार्च को होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग को बंद करने का ऐलान ईरान ने किया था, तभी से वैश्विक बाजार में संकट दिखने लगा था। भारत में भी एलपीजी सिलेंडर की मारामारी शुरु हो चुकी थी। तब नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सरकार से इस मामले में स्थिति साफ करने कहा था और आगाह भी किया था कि आर्थिक तूफान आने वाला है, जिसकी चपेट में करोड़ों लोग आएंगे। लेकिन उस समय चुनाव प्रचार में व्यस्त नरेन्द्र मोदी ने कांग्रेस पर अफवाह फैलाने का आरोप लगाया। पेट्रोलियम मंत्रालय के अधिकारी रोजाना प्रेस विज्ञप्ति जारी कर बताते कि देश में कोई संकट नहीं है, हमारे पास तेल और गैस का पर्याप्त भंडार है। तो अब मोदी से पूछा जाना चाहिए कि क्या ये भंडार भाजपा नेताओं के गुलछर्रे उड़ाने के काम आ रहा है। नरेन्द्र मोदी ने केरल से लेकर बंगाल तक धुआंधार रैलियां कीं, उनकी हर यात्रा में करोड़ों का पेट्रोल खर्च हुआ होगा। अभी बंगाल में शपथग्रहण समारोह में भाजपा के तमाम दिग्गज, सारे भाजपाई मुख्यमंत्री सब पहुंचे, क्या उनके विमान और हेलीकॉप्टर पानी से चलने लगे हैं। 12 मई को असम में भी भव्य शपथग्रहण होगा, तो क्या खुद मोदी वहां न पहुंचकर वर्चुअली उससे जुड़ेंगे। कोविड में तो ऐसा ही होता था। अगर मोदी न जाएं तो जनता के टैक्स का बहुत सारा पैसा बच जाएगा। रविवार को कर्नाटक और तेलंगाना के बाद नरेन्द्र मोदी सोमवार को सोमनाथ अमृत महोत्सव में पहुंचे, पहले वहां रोड शो किया, फिर 11 तीर्थों के जल से मंदिर में अभिषेक किया, इस पूरे कार्यक्रम में कितने करोड़ रूपए बह गए होंगे, उसका कोई हिसाब नहीं। लेकिन मोदी तो तुलसीदास की वाणी को सार्थक कर रहे हैं कि पर उपदेश कुशल बहुतेरे यानी दूसरों को उपदेश देना और खुद अपने आचरण में न उतारना, ऐसे लोग बहुत हैं, मोदी भी उन्हीं में से एक हैं। मोदी शास्त्रीजी तो कभी बन नहीं सकते, जिन्होंने 1965 में पाक युद्ध के दौरान कायम हुए आर्थिक संकट में एक वक्त का उपवास रखने की अपील देशवासियों से की और खुद भी उस पर अमल किया। और देश की हालत सुधारने के लिए कृषि क्षेत्र को मजबूत करने पर काम किया। मोदी का हाल तो ऐसा है कि खुद 10 लाख का सूट पहनें, 8 हजार करोड़ के हवाई जहाज में घूमें, महंगी गाड़ियों में चलें, विदेशी चश्मा और घड़ी पहनें, लेकिन लोगों से कहें कि तुम अपनी जरूरतों में कटौती करो, क्योंकि देशभक्ति दिखानी है।

मध्यवर्ग की छुट्टियों में विदेश यात्रा की संस्कृति पर मोदी जो टिप्पणी कर रहे थे, वो असल में देश के विकास का सूचक थी। वो विकास जो मोदी के आने से पहले कांग्रेस की यूपीए सरकार में हुआ। जब लोगों के पास रोजगार भी था और खर्च करने के लिए धन भी। लेकिन अब खुद संयुक्त अरब अमीरात, स्वीडन, नीदरलैंड, नॉर्वे और इटली की सात दिनों की यात्रा पर निकल रहे मोदी चाहते हैं कि आम जनता छुट्टियों का आनंद भी न ले। इसी तरह साल भर सोना न खरीदने की उनकी अपील भी लाजवाब है। सोना-चांदी इतने महंगे हो चुके हैं कि आम आदमी अब शौकिया उन्हें खरीद भी नहीं सकता। लेकिन शादी-ब्याह में स्त्रीधन के तौर पर देने की जो परंपरा चली आई है, उसे भी मोदी खत्म करवाना चाहते हैं। पहले नोटबंदी करवा कर स्त्रियों की घरेलू बचत से जमा पूंजी प्रधानमंत्री ने निकलवा ली थी, अब उनके स्त्रीधन पर भी बंदिश लगवाई जा रही है। मोदी को अपील ही करनी थी तो नीता अंबानी, ईशा अंबानी जैसे लोगों से करते, जो विदेशों में भारतीय संस्कृति दिखाने के लिए सोने की जरी वाली साड़ी, माणिक, पन्नों से जड़े हार, सोने-चांदी से बने करोड़ों के बटुओं का प्रदर्शन कर रही हैं। विलासिता का ऐसा फूहड़ प्रदर्शन भारतीय संस्कृति तो कहीं से नहीं है। लेकिन धनपशुओं के सामने तो नरेन्द्र मोदी की बोलती बंद हो जाती है।

नरेन्द्र मोदी चाहते तो हालात पहले ही काबू में करने की कोशिश करते। लेकिन चुनाव खत्म होने तक उन्होंने आर्थिक संकट पर एक लफ्ज़ नहीं कहा। विपक्ष ने जब भी रूपए की गिरती कीमत, तेल-गैस के संकट पर बात करना चाही, तो उसे नकारा गया। अब चुनाव खत्म होते ही जनता पर गाज़ गिराने की तैयारी है। पेट्रोल-डीजल महंगा होगा इस आशंका में सोमवार को शेयर बाजार धड़ाम गिरा, जिसमें नुकसान छोटे निवेशकों का ही होगा। इसके अलावा अब कंपनियों को छंटनी करने का बहाना भी मिलेगा। कायदे से हालात बिगड़ने पर मोदी अपनी नाकामी मानते, अर्थशास्त्रियों से उचित सलाह-मशविरा करते ताकि जनता पर कम से कम बोझ पड़े तो उनकी भी देशभक्ति साबित हो जाती। लेकिन यहां तो सारी जिम्मेदारी जनता पर ही डाली जा रही है।


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