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मोदी- दोनों हाथों में लड्डू

जैसा कि अनुमान लगाया जा रहा था कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए चाहे जितने कठोर नियम बना ले

मोदी- दोनों हाथों में लड्डू
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जैसा कि अनुमान लगाया जा रहा था कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए चाहे जितने कठोर नियम बना ले, उन्हें लागू करना आसान नहीं होगा। और ऐसा ही हुआ भी। यूजीसी द्वारा जारी नए नियमों पर देश भर में सवाल और बवाल दोनों खड़े हुए और उसके बाद सीधे सुप्रीम कोर्ट में इसे रोकने के लिए याचिकाएं दायर हुईं, जिन पर गुरुवार 29 जनवरी को महत्वपूर्ण सुनवाई भी हो गई। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नए नियमों पर अस्थायी रोक लगा दी है।

सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि पहले दृष्टिकोण से यह प्रतीत होता है कि इन नियमों की भाषा में स्पष्टता की कमी है, जिससे उनका गलत उपयोग हो सकता है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने चेतावनी दी कि ऐसे नियम समाज को विभाजित कर सकते हैं और परिसरों में अमेरिका की तरह नस्लीय विभाजन जैसी स्थिति पैदा कर सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन नियमों की जांच की आवश्यकता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उनका दुरुपयोग न हो। कोर्ट ने केंद्र सरकार से इन नियमों की समीक्षा करने को कहा और तब तक उनके लागू होने पर रोक जारी रखने का आदेश दिया। इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल से कहा कि वे एक विशेषज्ञ कमेटी गठित करें। जिसमें कुछ प्रतिष्ठित व्यक्तियों को शामिल करने पर विचार किया जाए, ताकि समाज में बिना भेदभाव के समग्र विकास हो सके।

गौरतलब है कि यूजीसी नियमावली, 2026 को 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित किया गया था। ये नियम अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) छात्रों के खिलाफ भेदभाव, उत्पीड़न और आत्महत्या जैसी घटनाओं को रोकने के उद्देश्य से लाए गए हैं। यह 2012 के पुराने नियमों की जगह लाए गए हैं। इन नियमों के तहत सभी उच्च शिक्षा संस्थानों में समता समितियां (इक्विटी कमेटी) गठित करना अनिवार्य किया गया है। इस कमेटी का काम जातिगत भेदभाव की शिकायतों की जांच करना है। लेकिन एससी, एसटी और ओबीसी के हक की बात उठते ही समाज में बवाल खड़ा हो गया।

भारत में जाति व्यवस्था इतनी गहरी पैठी हुई है कि जाति के नाम पर उत्पीड़न सामान्य व्यवहार के तौर पर अपना लिया गया है। एक इंसान दूसरे इंसान को केवल जाति के आधार पर अपमानित, शोषित या प्रताड़ित करे, यह चलन सदियों से चला आ रहा है और इसे दूर करने की जितनी कोशिशें की गईं, उतने ज्यादा अड़ंगे सवर्ण समाज की तरफ से लगाए गए। चाहे मंडल कमीशन की सिफारिशें हों या अभी यूजीसी के नए नियम, उन पर समाज का एक तबका ऐसे विरोध में उतरा मानो अपने से निचली जातियों का उत्पीड़न उसका जन्मसिद्ध अधिकार है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट में सवर्ण वर्ग की ओर से दायर याचिकाओं में इन नियमों को असंवैधानिक बताया गया है। इसे जाति आधारित भेदभाव करार दिया। याचिकाकर्ताओं में से एक वकील विष्णु शंकर जैन ने कहा कि यह भेदभाव संविधान के अनुच्छेद 14 और 19 के खिलाफ है और इससे शिक्षा क्षेत्र में, समाज में और अधिक खाई पैदा हो सकती है। कितने कमाल की बात है कि शिक्षा क्षेत्र या समाज में जातिगत भेदभाव इन लोगों को तब दिखाई नहीं देता, जब किसी दलित बच्चों को मध्याह्न भोजन में अलग पंक्ति में बिठाने की खबरें आती हैं, या किसी छात्र को उसकी निचली जाति के कारण शारीरिक या मानसिक तौर पर प्रताड़ित किया जाता है। रोहित वेमुला या पायल तड़वी जैसे लोगों को अगर आत्महत्या करने पर मजबूर किया गया, तो उसके पीछे यही सदियों से चला आ रहा जातिगत भेदभाव ही है।

बहरहाल, अब शीर्ष अदालत इस मामले पर अगली सुनवाई 19 मार्च को करेगी। तब तक मोदी सरकार जाति या किसी और कारण से समाज को बांटने के नए तरीके सोच ही लेगी। वैसे तो शिक्षा मंत्रालय और यूजीसी ने बचाव में कहा कि नए नियम किसी समुदाय को निशाना नहीं बनाते हैं और समितियां निष्पक्ष होंगी, जिसमें विविध प्रतिनिधित्व होगा। लेकिन सरकार इस बात को अच्छे से जानती थी कि कमजोर तबके के लोगों को सुरक्षा देने या उन्हें आगे बढ़ाने के लिए जो भी फैसले लिए जाएंगे, उस पर समाज के सवर्ण तबके से तीखी प्रतिक्रिया आएगी ही और इस मामले पर राजनीति भी खूब होगी। और ऐसा ही हुआ भी। यूजीसी के नियम केवल कानूनी मसला नहीं है, बल्कि इसके सामाजिक और राजनैतिक पहलू भी हैं। जिनमें चुनावी हित नाप-तौल के ही मोदी सरकार आगे बढ़ी है।

पूरे देश में यूजीसी के नए नियमों पर केवल विरोध ही नहीं हुआ, बल्कि नरेन्द्र मोदी-अमित शाह के पोस्टरों पर प्रदर्शनकारियों ने अपना गुस्सा जाहिर किया। उनके खिलाफ कब्र खुदेगी जैसे नारे लगाए गए। मज़े की बात ये है कि इन नारों को लगाने वाले सवर्ण छात्रों को किसी ने देशद्रोही नहीं कहा। जबकि जेएनयू में ऐसे ही नारे लगे थे तो छात्रों को फौरन देशविरोधी करार दिया गया था। जाति पर किस तरह का भेदभाव समाज में किया जाता है, ये उसी का एक उदाहरण है।

बहरहाल, यूजीसी के नए नियमों को अभी लाना और फिर लागू होने पर रोक लगाना, सब चुनावी राजनीति की तरफ इशारा करते हैं। बिहार चुनाव में तो एसआईआर के कारण भाजपा को काफी मदद मिल गई। लेकिन तमिलनाडु, प.बंगाल, असम, केरल और पुड्डुचेरी में भाजपा को तरकश में कुछ और तीर बढ़ाने थे। कांग्रेस जातिगत जनगणना और आरक्षण के मुद्दे पर भाजपा से आगे निकली हुई थी, अगले साल उत्तरप्रदेश में चुनाव हैं और वहां समाजवादी पार्टी भी पीडीए को आगे बढ़ाए हुई है। ऐसे में भाजपा को इनकी काट निकालनी थी, सो यूजीसी के नए नियमों से उसमें मदद मिल गई। अब एससी, एसटी और ओबीसी के लोग इस बात की उम्मीद मोदी सरकार से बांध लेंगे कि सामाजिक न्याय भी मोदी के रहते ही मुमकिन होगा और वहीं सवर्ण तबका चाहे भाजपा से जितनी नाराजगी दिखाए, वोट देने के वक्त उसे मोदी की ब्राह्मणवाद को बढ़ावा देने वाली राजनीति ही याद आएगी। संसद में पुरोहितों की मौजदूगी में सेंगोल रखने से लेकर राम मंदिर का उद्घाटन और सोमनाथ मंदिर का समारोह मनाने तक हर जगह नरेन्द्र मोदी ने ब्राह्मणवाद को मजबूत किया है। अब थोड़ा सा दलितों-पिछड़ों को पुचकारा जा रहा है। ताकि दोनों हाथों में लड्डू रहें। इसके बाद क्या सत्ता की मिठास भाजपा को मिलेगी, ये पांच राज्यों के नतीजे बताएंगे।


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