वैश्विक राजनीति में बड़े उलटफेर
वैश्विक राजनीति में दो ऐसे बड़े उलटफेर हुए हैं, जो सत्ता को अपनी तिजोरी में रखी संपत्ति समझने वाले नेताओं के लिए बड़ा सबक हैं।

वैश्विक राजनीति में दो ऐसे बड़े उलटफेर हुए हैं, जो सत्ता को अपनी तिजोरी में रखी संपत्ति समझने वाले नेताओं के लिए बड़ा सबक हैं। पहली घटना दक्षिण अमेरिकी देश ब्राजील की है, जहां वर्कर्स पार्टी के नेता लूला डि सिल्वा ने फिर से राष्ट्रपति चुनाव में महत्वपूर्ण जीत हासिल की है। दूसरी घटना सर्बिया की है, जहां राष्ट्रपति अलेक्जेंडर वुसिक की सर्बियन प्रोग्रेसिव पार्टी (एसएनएस) को स्टूडेंट लिस्ट ने हरा दिया है। इन दोनों देशों के इस राजनैतिक घटनाक्रम को अमेरिका के लिए बड़े झटके के तौर पर देखा जा रहा है। क्योंकि डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका की दखलंदाजी की परंपरा को बरकरार रखते हुए अपनी पसंद की सरकारें यहां बनवाना चाहते थे।
ब्राजील में लूला डि सिल्वा की जीत न केवल राजनैतिक बल्कि पर्यावरणीय दृष्टिकोण से भी अहम है। यहां दक्षिणपंथी शासन में बड़ी तेजी से अमेजन के जंगलों का सफाया किया गया, लेकिन लूला के सत्ता में रहने से उम्मीद बंधी है कि अमेजन के जंगल कम से कम अब कुछ और वक्त तक बचे रहेंगे। क्योंकि उद्योगपतियों की गिद्ध दृष्टि यहां लगातार बनी हुई है।
वैसे लूला डि सिल्वा ने अपने दक्षिणपंथी प्रतिद्वंद्वी और लिबरल पार्टी के नेता फ्लावियो बोल्सोनारो को मामूली अंतर से हराया है। लूला को 51.76 प्रतिशत वोट मिले, जबकि पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो के बेटे फ्लावियो बोल्सोनारो को 48.24 प्रतिशत वोट मिले। बोल्सोनारो के वक्त ही बड़ी तेजी से अमेजन के जंगल काट दिए गए थे और जंगलों में आग लगने की भी कई घटनाएं हुईं। लूला की जीत कई चुनावी सर्वे के अनुमानों के उलट रही, क्योंकि तमाम सर्वे बोल्सोनारो को बढ़त दे रहे थे। अक्टूबर के शुरु में पहले दौर के मतदान में फ्लावियो बोल्सोनारो ने लगभग दो प्रतिशत अंकों की बढ़त हासिल की थी। लेकिन फिर दूसरे दौर में लूला ने उन्हें मात दे दी। यह परिणाम भी संभव नहीं होते, अगर सुप्रीम कोर्ट के एक जज ने मतदान केंद्रों के बंद होने का निर्धारित समय क़रीब आने पर मतदान की अवधि दो घंटे बढ़ाने का आदेश न दिया होता। ब्राज़ील के कई नागरिक मतदान केंद्रों तक पहुंचने के लिए सार्वजनिक परिवहन पर निर्भर हैं और लूला के संगठन ने शिकायत की थी कि बहुत सी जगहों पर सार्वजनिक परिवहन में व्यवधान आया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस शिकायत का संज्ञान लिया और ऐसा फैसला दिया, जिससे जनता की जीत हुई।
हालांकि हार के बाद फ्लावियो बोल्सोनारो ने नतीजों को मानने से मना कर दिया है, ठीक ऐसे ही 2022 में जाएर बोल्सोनारो ने भी चुनाव में अपनी हार स्वीकार करने से इंकार कर दिया था। और यही काम ट्रंप ने जो बाइडेन की जीत के बाद किया था। हालांकि एक ही पैंतरा बार-बार काम नहीं करता। लिहाजा तय है कि अब ब्राजील में वामपंथी नेता का शासन रहेगा। लूला इससे पहले 2003 से 2010 तक राष्ट्रपति रह चुके हैं, फिर चार साल पहले उन्होंने तीसरी बार राष्ट्रपति पद हासिल किया था और अब चौथे कार्यकाल के लिए जनादेश उन्होंने हासिल कर लिया है। हालांकि इस बार का कार्यकाल पहले के मुकाबले ज्यादा चुनौतीपूर्ण रहेगा, क्योंकि दक्षिण अमेरिकी देशों में ट्रंप अपनी पिट्ठू सरकारें बनवाना चाहते हैं। वेनेजुएला में जिस तरह निकोलस मादुरो को अगवा कर ट्रंप ने अपनी मर्जी की सरकार बनाई है, यह दुनिया देख रही है। ट्रंप ने फ्लावियो बोल्सोनारो का सीधे तौर पर समर्थन नहीं किया था, लेकिन कोलंबिया और होंडुरास में राष्ट्रपति चुनाव जीतने वाले दक्षिणपंथी उम्मीदवारों का समर्थन किया था। इधर फ्लावियो बोल्सोनारो ने तो पहले ही ब्राज़ील को अमेरिका के और क़रीब लाने का वादा किया था। जबकि लूला ने अमेरिका को चुनाव में हस्तक्षेप न करने की चेतावनी दी थी। उन्होंने ज़ोर देकर कहा था कि ब्राज़ील 'कभी भी किसी का पिछलग्गू नहीं बनेगाÓ। लूला के ऐसे ही तेवर ट्रंप को चुभते हैं। पिछले साल से अमेरिका ने ब्राज़ील पर व्यापार शुल्क और अन्य प्रतिबंध लगाए हैं ताकि लूला डि सिल्वा को सरकार चलाने में दिक्कत आए। लेकिन लूला अमेरिका के आगे नहीं झुके।
ब्राज़ील तेल के समृद्ध भंडार वाला देश है और यहां रेयर अर्थ मिनरल्स का दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा भंडार मौजूद है। इसलिए जाहिर तौर पर ट्रंप की दिलचस्पी इसी में थी कि ब्राजील में भी अमेरिका की जी हुजूरी करने वाली सरकार बने।
इधर सर्बिया में भी जनता की ताकत देखने मिली। करीब दो साल से भ्रष्टाचार और सरकार की जवाबदेही के खिलाफ आंदोलन कर रहे छात्रों के समर्थन वाली 'स्टूडेंट लिस्टÓ ने संसदीय चुनाव में ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। देश के लंबे समय से प्रभावशाली नेता अलेक्जेंडर वुसिक ने चुनाव में हार स्वीकार कर ली है। गौरतलब है कि सर्बिया में नवंबर 2024 में छात्र आंदोलन की शुरुआत हुई थी। तब उत्तरी शहर नोवी साद के रेलवे स्टेशन के प्रवेश द्वार पर बना कांक्रीट का छज्जा ढह गया था, जिसमें 16 लोगों की मौत हो गई थी। इस हादसे ने सरकारी जवाबदेही, निर्माण कार्यों में भ्रष्टाचार और सुरक्षा मानकों को लेकर जनता में आक्रोश पैदा कर दिया था। छात्रों ने हादसे की जिम्मेदारी तय करने, भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच कराने और राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव की मांग की थी और फिर विश्वविद्यालयों से शुरू हुआ आंदोलन देशव्यापी विरोध प्रदर्शन में बदल गया। छात्रों के अलावा आम नागरिकों और सरकार के आलोचकों ने भी आंदोलनों में हिस्सा लिया। वुसिक सरकार पर जवाबदेही से बचने और लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने के आरोप लगते रहे, जिसे वुसिक और उनकी पार्टी ने खारिज किया। जनता की नाराजगी की उपेक्षा करने का परिणाम अब अलेक्जेंडर वुसिक को मिल गया है।
अब इजरायल में 27 अक्टूबर को आम चुनाव होने हैं। 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद पहला आम चुनाव है और इस बार बेंजामिन नेतन्याहू की सत्ता दांव पर है। जनमत उनके विरोध में बताया जा रहा है, क्योंकि पहले गज़ा फिर ईरान और सीरिया पर थोपे जा रहे युद्धों से लोग त्रस्त आ चुके हैं। ट्रंप तो खुलकर नेतन्याहू को जिताने की अपील कर रहे हैं। देखना होगा कि क्या यहां भी ब्राजील जैसा हाल होता है, या फिर युद्धपिपासुओं की जीत होती है।


