बंगाल में भाजपा का महाराष्ट्र मॉडल
पश्चिम बंगाल की सियासत में घमासान खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है।

पश्चिम बंगाल की सियासत में घमासान खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है। 4 मई को आए विधानसभा चुनाव के नतीजों ने जब बिसात पलट दी और ममता बनर्जी को हरा कर भाजपा पहली बार सत्ता में आई, तो उसके बाद कायदे से नयी सरकार की प्राथमिकताओं और घोषणापत्र पर अमल की शुरुआत पर चर्चा होनी चाहिए थी। भाजपा ने बार-बार बंगाल में सकारात्मक बदलाव लाने का दावा किया था, तो वह दावा सतह पर दिखना भी चाहिए थे। लेकिन इसकी जगह कभी राजनैतिक विरोधियों के साथ हिंसा, कभी मुसलमानों के लिए फरमान, कभी बुलडोजर कार्रवाई की खबरें आईं या फिर तृणमूल कांग्रेस किस तरह विरोध प्रदर्शन कर रही है, उसकी खबरें आईं। इस बीच अब एक और ऐसा घटनाक्रम चल रहा है, जो नया नहीं है, लेकिन चौंकाता जरूरी है कि आखिर कब तक सत्ता पर बने रहने के लिए यही दांव-पेंच एक राज्य से दूसरे राज्य में खेले जाते रहेंगे।
दरअसल प.बंगाल में अब तक भाजपा बनाम टीएमसी की लड़ाई चल रही थी। लेकिन अब टीएमसी बनाम टीएमसी की लड़ाई छिड़ गई है। महज 80 सीटों पर सिमटने वाली टीएमसी अब दो फाड़ होने की कगार पर आ गई है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक खबर है कि विधानसभा अध्यक्ष रथीन बोस को टीएमसी के 58 विधायकों के हस्ताक्षरों वाला एक पत्र सौंपा गया है, जिसमें नेता प्रतिपक्ष के तौर पर ऋतब्रत बंद्योपाध्याय के नाम का प्रस्ताव किया गया है। अध्यक्ष ने इस पत्र को स्वीकार कर लिया है।
पाठक जानते हैं कि प.बंगाल विधानसभा में बीते दिनों जाली हस्ताक्षर कांड के आरोप टीएमसी पर लगे, जिसकी अब सीआईडी जांच हो रही है। खुद मुख्यमंत्री सुवेन्दु अधिकारी ने बताया था कि टीएमसी के दो विधायकों ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने शिकायत की थी कि विधानसभा में पार्टी विधायक दल का नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय को चुनने के लिए जो बैठक हुई थी उसमें पारित प्रस्ताव पर कथित तौर पर उन विधायकों के भी हस्ताक्षर थे जो उस बैठक में हाज़िर ही नहीं थे। मुख्यमंत्री के इस बयान के 15 मिनट बाद ही दोनों विधायकों को पार्टी से बाहर करने का फैसला सुना दिया गया था। इसके एक दिन बाद ही तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ता रहे रिजू दत्त ने पत्रकारों से बातचीत में दावा किया था कि उन लोगों के पास 50 विधायकों का समर्थन है और वही असली तृणमूल कांग्रेस हैं। बगावत की चिंगारी शांत करने के लिए ममता बनर्जी ने अपने घर पर बैठक बुलाई तो उसमें केवल 20 विधायक ही पहुंचे, जिसके बाद बैठक रद्द करनी पड़ी। अभी मंगलवार को ममता बनर्जी ने कोलकाता में राशोमनी एवेन्यू पर जो धरना-प्रदर्शन किया, उसमें भी भीड़ तो बहुत जुटी, लेकिन पार्टी के विधायक नदारद रहे, हालांकि अभिषेक बनर्जी, कल्याण बनर्जी जैसे कुछ दिग्गज पहुंचे हुए थे। ये सारा घटनाक्रम बता रहा है कि अब टीएमसी एकजुट नहीं है। टीएमसी के भीतर बगावत के सुर इतने तेज हो गए हैं कि सवाल उठने लगा है कि क्या ममता बनर्जी की टीएमसी भी उसी रास्ते पर जा रही है, जिस पर कभी बंगाल में कांग्रेस और लेफ्ट पार्टी गई थीं।
गौरतलब है कि 1970 के दशक तक बंगाल में कांग्रेस का वर्चस्व था, लेकिन इंदिरा गांधी और सिद्धार्थ शंकर राय के बीच की खींचतान और बाद में कांग्रेसी नेताओं का बार-बार टूटकर तृणमूल या वाम दलों में जाना, पार्टी को हाशिए पर ले गया। फिर 2011 में 34 साल बाद सत्ता से बाहर हुए वाम मोर्चे से बड़ी संख्या में नेता और कार्यकर्ता टूटकर टीएमसी में चले गए। खुद ममता बनर्जी ने 1998 में कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस बनाई थी और अपनी आक्रामक छवि के सहारे सत्ता तक पहुंची थीं। अब टीएमसी में फूट बंगाल के इतिहास को दोहराते हुए ही नजर आ रही है।
प्रत्यक्ष तौर पर तो टीएमसी का सत्ता से बाहर होना ही इस टूट का प्रमुख कारण दिख रहा है। लेकिन जानकार इसे भाजपा का महाराष्ट्र मॉडल पर चलना बता रहे हैं। शिवसेना में एकनाथ शिंदे के बूते कई विधायकों को साथ लेकर भाजपा ने नयी शिवसेना बनवाई और बाद में चुनाव आयोग ने शिवसेना का नाम और निशान भी शिंदे के ही सुपुर्द किया। उद्धव ठाकरे की सरकार एकनाथ शिंदे को साथ लेकर जिस तरह भाजपा ने गिराई थी, उसे सुप्रीम कोर्ट ने भी गलत माना था, लेकिन फिर भी शिंदे मुख्यमंत्री बने रहे और भाजपा सरकार का हिस्सा बनी रही। फिर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) को साथ भी यही काम भाजपा ने किया। अजित पवार ने अलग एनसीपी बना ली और शरद पवार को ही बाहर किया गया। एनसीपी का नाम और निशान अजित पवार गुट को ही मिला। बिल्कुल इसी तर्ज पर अब टीएमसी और न्यू टीएमसी दो दल बनाए जा सकते हैं। देखना यही होगा कि क्या ममता बनर्जी के खाते में नाम और निशान आते हैं या नहीं।
इस खेल में प्रत्यक्ष तौर पर भाजपा नहीं दिख रही है, लेकिन यह महज संयोग नहीं है कि उसके सत्ता में आते ही विपक्षी दल में फूट पड़ गई है। कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि बागी विधायक डर के मारे सीधे तौर पर भाजपा के सामने झुक रहे हैं। आज टीएमसी के जो चुने हुए प्रतिनिधि एक नई पार्टी बनाने की कोशिश कर रहे हैं। उन सभी पर किसी न किसी तरह के भ्रष्टाचार के आरोप हैं, क्योंकि भाजपा के पास पहले से ही ईडी और सीबीआई थीं। अब सीआईडी और बंगाल पुलिस भी उनके साथ हो गई हैं। टीएमसी के ये विधायक बस खुद को बचाना चाहते हैं। इन विधायकों को खुद को बचाने का एक रास्ता मिल जाएगा और भाजपा को सदन में बिना किसी रुकावट के कुछ भी करने की पूरी आज़ादी मिल जाएगी। अधीर रंजन चौधरी की तरह ही कई और जानकारों का मानना है कि भाजपा दबाव के लिए जांच एजेंसियों को आगे करती है और विरोधी दलों में ऐसे ही फूट पड़वाती है। हालांकि टीएमसी तोड़ने वाले विधायक भाजपा में सीधे तौर पर शामिल न होकर नयी पार्टी बना रहे हैं, तो उसके पीछे मुस्लिम वोट बैंक को साथ रखने की मंशा है। भाजपा जानती है कि अभी मुस्लिमों के वोट उसे नहीं मिलेंगे, इसलिए दूसरे तरीके से खेल किया जा रहा है। टीएमसी का नया धड़ा बनाए रखने की एक वजह यह भी है कि इससे कांग्रेस को बढ़त नहीं मिलेगी। अगर टीएमसी नहीं रही तो फिर मतदाताओं के सामने भाजपा या कांग्रेस किसी एक का विकल्प रहेगा। वैसे टीएमसी में टूट के फिलहाल दो बड़े असर दिखाई दे सकते हैं, पहला बंगाल में कमजोर विपक्ष के कारण भाजपा को मनमाने फैसलों की छूट मिलेगी, दूसरा, आठ जून को प्रस्तावित इंडिया गठबंधन की बैठक पर इसका असर पड़ेगा। क्योंकि ममता बनर्जी ने विपक्ष को मजबूत कर भाजपा को खत्म करने की चुनौती दी थी। ममता अब भी यही कह रही हैं कि भाजपा को हराए बिना वो मरेंगी नहीं।


