दलित होने पर खड़गे का अपमान
मैं इस बात को राजनीतिक मुद्दा नहीं बनाना चाहता। मैं वर्षों से इस सदन (राज्यसभा) का सदस्य हूं और निचले सदन में भी रहा।

मैं इस बात को राजनीतिक मुद्दा नहीं बनाना चाहता। मैं वर्षों से इस सदन (राज्यसभा) का सदस्य हूं और निचले सदन में भी रहा। मैंने कभी किसी से यह नहीं कहा कि मैं दलित हूं, मेरी रक्षा करो और न ही किसी के सामने गिड़गिड़ाया। मुझ में लड़ने की शक्ति है और मैं लड़ता हूं। लेकिन हल्द्वानी में मंच का शुद्धिकरण कर मुझे छुआछूत का एहसास कराया गया और मेरा अपमान किया गया।
ये शब्द कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के हैं। गौरतलब है कि आठ अगस्त को श्री खड़गे ने उत्तराखंड के हल्द्वानी में एक सभा को संबोधित किया था, इसके बाद हिंदूवादी संगठनों ने उस मंच का शुद्धिकरण किया, क्योंकि श्री खड़गे दलित मूल के हैं।
खड़गे जी नौ बार विधायक और पांच बार के सांसद हैं। जब भाजपा द्वारा पोषित घृणित जातिवादी और धर्मांध राजनीति दलित होने पर उनका अपमान कर सकती है, तो समझा जा सकता है कि देश में आज भी दलितों की क्या दुर्दशा है। भाजपा के शासनकाल में दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों के अपमान का यह सिलसिला लगातार चल रहा है। अखिलेश यादव मई 2024 में कन्नौज के बाबा गौरी शंकर महादेव मंदिर में दर्शन करने गए, तो उसके बाद भाजपा कार्यकर्ताओं ने उसका शुद्धिकरण किया था। राजस्थान में अप्रैल 2025 में अलवर में एक राम मंदिर में कांग्रेस नेता टीकाराम जूली के जाने के बाद, भाजपा नेता ज्ञानदेव आहूजा ने गंगाजल छिड़क कर मंदिर का 'शुद्धिकरण' किया था। ऐसे दर्जनों मामले हैं, जहां इसी तरह सवर्ण हिंदू श्रेष्ठता के चलते दलितों का अपमान किया जाता है। दलितों के मूंछ रखने से लेकर विवाह में घोड़ी चढ़ने तक आज भी उन्हें शारीरिक और मानसिक तौर पर प्रताड़ित किया जाता है। मुसलमानों पर अत्याचार की खबरें तो अब इतनी आम हो चुकी हैं कि जनसामान्य इन पर विचलित ही नहीं होता। यह बात भी ध्यान रखनी चाहिए कि संसद के नए भवन के उद्घाटन का मौका हो या राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा का आदिवासी समुदाय से आने वाली राष्ट्रपति वहां मौजूद नहीं थीं। क्यों नहीं थी, इस सवाल का जवाब भाजपा ही बेहतर देगी। उसका चाल, चरित्र और चेहरा दलित, आदिवासी, पिछड़ा विरोधी है, यह बार-बार जाहिर होता है।
दो दिन में देश आजादी की 80वीं वर्षगांठ मनाएगा। लेकिन क्या जातिवादी और धर्मांध राजनीति से देश को आजादी मिल पाएगी, यह सवाल बना हुआ है। भाजपा के लिए तो यही सुविधाजनक है कि लोग धर्म और जाति के झगड़ों में फंसे रहें ताकि शिक्षा, चिकित्सा, भोजन, पानी, रोजगार जैसे अहम विषयों पर सरकार को काम ही नहीं करना पड़े। प्रधानमंत्री मोदी ने हर घर तिरंगा अभियान तो चलाया ही हुआ है, इसके साथ ही संसद में वंदेमातरम का पूरा गान भी कर लिया। ध्यान रहे कि अब तक वंदेमातरम के शुरुआती दो अंतरों को ही आधिकारिक तौर पर राष्ट्रगीत के रूप में गाया जाता था। क्योंकि शुरुआती दोनों अंतरों में मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता और समृद्धि का वर्णन है। रवीन्द्रनाथ ठाकुर का ही सुझाव था कि केवल शुरुआती पद लिए जाएं, क्योंकि इनमें धर्मनिरपेक्ष और सार्वभौमिक अभिव्यक्ति है। जबकि बचे हुए चार छंदों में हिंदू देवी-देवताओं (जैसे दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती) का स्पष्ट रूप से आह्वान और स्तुति की गई है। 79 बरस तक यही वंदेमातरम देश में गूंजता रहा और इस पर कोई राजनीति नहीं हुई। बेशक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कई बार पूरे गीत को गाने पर जोर देता रहा और नरेन्द्र मोदी ने अपने तीसरे कार्यकाल में संघ के इस एजेंडे को भी पूरा करके दिखा दिया।
हालांकि विडंबना यह है कि वंदेमातरम का पूरा गान संसद में करवाने के बावजूद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह सदन में रुकने की हिम्मत नहीं दिखा सके। राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान केवल गाए नहीं जाते हैं, इनका असली मर्म तो तभी जाहिर होता है जब आपकी देशभक्ति कार्यों में परिणत हो। प्रधानमंत्री और गृहमंत्री का कार्य सदन में आकर विपक्ष के साथ चर्चा को आगे बढ़ाना होता है। मगर पूरे मानसून सत्र में मोदी और शाह सदन में नहीं आए, इनकी वजह से सदन रोजाना ठप्प हुए, महज 15 घंटे काम हुआ। गुरुवार को सत्र के आखिरी दिन अपनी पूरी केबिनेट के साथ मोदी-शाह लोकसभा में आए भी तो वंदेमातरम सुनकर चले गए, महज तीन मिनट में ओम बिड़ला ने सूचना दे दी कि सत्र अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होता है। जबकि राज्यसभा में मल्लिकार्जुन खड़गे ने दलित होने की वजह से हुए उनके अपमान का मुद्दा सामने रखा तो जे पी नड्डा केवल इतना कह पाए कि खड़गे जी ने जो कहा वह वाकई दुखद है- न सिर्फ कांग्रेस पार्टी के लिए बल्कि हम सबके लिए...हम इसकी जांच करेंगे। मैं इसकी निंदा करता हूं। राष्ट्रीय अध्यक्ष इस मामले को देखेंगे। हम सभी को बहुत खेद है कि आपकी भावनाएं आहत हुईं।
कितने सतही तरीके से जे पी नड्डा ने दलित उत्पीड़न के एक मामले पर प्रतिक्रिया दी है। जबकि बुधवार शाम से यह खबर सामने आ गई थी। भाजपा को भी इसकी खबर रही होगी, उत्तराखंड में भाजपा की ही सरकार है, तो अपेक्षित था कि वहां स्वत: संज्ञान लेकर मामला दर्ज किया जाता। मगर ऐसा नहीं हुआ, कांग्रेस को मामला दर्ज करने की मांग करनी पड़ी। श्री नड्डा ने तो फिर भी अपमान के लिए दुख जताया, मगर नरेन्द्र मोदी और अमित शाह ने इन पंक्तियों के लिखे जाने तक कोई अफसोस इस बात पर प्रकट नहीं किया कि संसद में उनके वरिष्ठ, वयोवृद्ध साथी और प्रमुख विपक्षी पार्टी के अध्यक्ष के साथ ऐसा हुआ है। मोदी शासनकाल में जितनी बार समाज के कमजोर तबकों का उत्पीड़न या अपमान हुआ है, मोदी ने कभी आगे बढ़कर इसके लिए न अफसोस जताया और न माफी मांगी।
इस बार चुनावी मौसम में भाजपा नेताओं का जब किसी दलित के घर खाना खाते हुए वीडियो सामने आए, तो समाज याद रखे कि मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ क्या किया गया है।


