मताधिकार पर जस्टिस भुईयां की अहम टिप्पणी
चुनाव चोरी के मसले पर मोदी सरकार के खिलाफ बढ़ती नाराजगी और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के खिलाफ बढ़ते संदेह के बीच एक राहत देने वाला बयान सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुईयां की तरफ से आया है।

ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए देश में तेज हो रहे आंदोलन, चुनाव चोरी के मसले पर मोदी सरकार के खिलाफ बढ़ती नाराजगी और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के खिलाफ बढ़ते संदेह के बीच एक राहत देने वाला बयान सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुईयां की तरफ से आया है। हालांकि जस्टिस भुईयां ने यह टिप्पणी किसी सुनवाई के दौरान नहीं की है, न ही यह किसी फैसले का हिस्सा है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा न्यायाधीश होने के नाते ही उनकी यह टिप्पणी काफी अहम है, क्योंकि इसमें नागरिकता और मताधिकार के बीच के अटूट संबंध को रेखांकित किया गया है। एसआईआर पर विवाद इसी वजह से ही उठे हैं कि मतदाता सूची शुद्धिकरण के नाम पर दस-बीस नहीं कम से कम 13 करोड़ लोगों से मताधिकार छीन लिया गया है। मताधिकार छीनने की कवायद को जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने संविधान के मूल ढांचे पर प्रहार के समान बताया है। उन्होंने कहा कि अगर कोई प्रक्रिया लाखों भारतीय नागरिकों को उनके मतदान के अधिकार से वंचित कर उन्हें अपने ही देश में बिना वोट वाले नागरिकों में बदल देती है, तो ऐसी प्रक्रिया 'स्वाभाविक रूप से मनमानीÓ होगी और संविधान के मूल ढांचे पर चोट करेगी।
हैदराबाद की नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ में आयोजित 19वें जस्टिस बोध राज साहनी मेमोरियल मूट कोर्ट प्रतियोगिता के समापन पर जस्टिस भुईयां ने कहा कि भारतीय संविधान नागरिकों की दो श्रेणियां नहीं बनाता- एक वे जिनके पास वोट देने का अधिकार है और दूसरी वे जिनके पास यह अधिकार नहीं है। वोट छीनने वाली किसी भी प्रक्रिया को स्वभावत: मनमाना बताते हुए उन्होंने कहा कि इसे किसी भी तरह की दलील या बहाने से जायज नहीं ठहराया जा सकता। उनके मुताबिक ऐसी स्थिति संविधान के 'दिल' पर चोट करती है और भारत द्वारा अपनाए गए संवैधानिक शासन-व्यवस्था की ही नकार बन जाती है। जस्टिस भुईयां ने अपने भाषण में सीधे तौर पर न एसआईआर का नाम लिया, न ज्ञानेश कुमार का जिक्र इस संदर्भ में किया, न ही सुप्रीम कोर्ट में एसआईआर को जायज ठहराने वाले जो फैसले पिछले कुछ वक्त में आए हैं, उन पर कुछ कहा, लेकिन यह सब सीधे तौर पर न कहते हुए भी जस्टिस भुईयां ने अपने भाषण में दो टूक कहा कि किसी भारतीय नागरिक की पहचान से उसके वोट देने या मतदाता सूची में शामिल होने के अधिकार को अलग नहीं किया जा सकता। उन्होंने इसकी तुलना शरीर से आत्मा निकालने से की। यानी नागरिकता और मताधिकार को एक-दूसरे से अलग करके नहीं देखा जा सकता। उन्होंने कानून के विद्यार्थियों और भावी वकीलों के जरिए देश को याद दिलाया कि भारत जैसे लोकतंत्र में आम नागरिक के लिए सरकार के संचालन में भागीदारी का सबसे महत्वपूर्ण और सीधा माध्यम उसका वोट है। उन्होंने कहा कि मताधिकार नागरिकता का सार है और यही वह माध्यम है जिसके जरिए देश का सामान्य नागरिक शासन-व्यवस्था में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करता है।
जस्टिस भुईयां ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 326 को विशेष रूप से महत्वपूर्ण बताया जो लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनावों को वयस्क मताधिकार के आधार पर कराए जाने की संवैधानिक व्यवस्था करता है। जस्टिस भुईयां ने साफ कहा कि अनुच्छेद 326 के साथ छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। उन्होंने जोर देकर कहा कि कोई प्राधिकरण ऐसा नहीं कर सकता और कोई अदालत भी ऐसी प्रक्रिया को मंजूरी नहीं दे सकती जो संवैधानिक मताधिकार को बड़े पैमाने पर खत्म करती हो। उन्होंने कहा कि 'कोई भी संविधान से ऊपर नहीं है।'
इसके साथ ही जस्टिस भुईयां ने अनुच्छेद 326 को संविधान के अनुच्छेद 14 में निहित समानता के सिद्धांत से भी जोड़ा। अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण की गारंटी देता है। जस्टिस भुईयां के अनुसार सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार इस समानता को वास्तविक लोकतांत्रिक अर्थ देता है। यानी समाज में ऊंची स्थिति वाला व्यक्ति और सबसे निचले सामाजिक-आर्थिक पायदान पर खड़ा व्यक्ति दोनों की नागरिक के तौर पर एक जैसी हैसियत है और दोनों के चुनाव में एक-एक वोट हैं। उन्होंने इसे भारतीय संविधान के उस परिवर्तनकारी दृष्टिकोण के रूप में प्रस्तुत किया जिसमें आर्थिक और सामाजिक असमानताओं के बावजूद राजनीतिक समानता सुनिश्चित की गई है। जस्टिस भुइयां ने अनुच्छेद 325 का भी उल्लेख किया। इसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों के लिए प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में एक सामान्य मतदाता सूची का प्रावधान है। जस्टिस भुईयां ने बाबा साहेब अंबेडकर के उद्देश्य को याद दिलाया कि संविधान निर्माताओं ने मताधिकार को केवल संसद द्वारा बनाए जाने वाले सामान्य कानून के भरोसे नहीं छोड़ा, बल्कि इसे संविधान में ही जगह दी।
इसके साथ ही जस्टिस भुईयां ने मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने जनप्रतिनिधित्व कानून, 1950 और सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि किसी मतदाता का नाम एक बार मतदाता सूची में दर्ज हो जाने के बाद, मृत मतदाता के मामले को छोड़कर, उसे बिना नोटिस और सुनवाई के हटाया नहीं जा सकता। यह टिप्पणी एसआईआर के संदर्भ में खास महत्व रखती है। एक अकादमिक कार्यक्रम में जस्टिस भुईयां के संवैधानिक और लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर आधारित भाषण का महत्व एसआईआर तत्काल बंद करने की मांग के बीच और बढ़ जाता है। नरेन्द्र मोदी, अमित शाह और ज्ञानेश कुमार के कारण देश में लोकतंत्र कुचलने का जो निराशाजनक माहौल बनाया गया है, उसमें इन दिनों चल रहा आंदोलन और इसके साथ जस्टिस भुईयां का भाषण वैसा ही है जैसा फैज़ अहमद फैज़ ने कहा था कि-बीमार को बेवज्ह क़रार आ जाए।


