पत्रकारों के साथ अपराधियों जैसा सलूक
समाचार एजेंसी यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ़ इंडिया (यूएनआई) के 9 रफ़ी मार्ग स्थित कार्यालय को कथित तौर पर भूमि आवंटन की शर्तों के उल्लंघन के आरोप में सील कर दिया

दिल्ली पुलिस ने शुक्रवार शाम समाचार एजेंसी यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ़ इंडिया (यूएनआई) के 9 रफ़ी मार्ग स्थित कार्यालय को कथित तौर पर भूमि आवंटन की शर्तों के उल्लंघन के आरोप में सील कर दिया। देश की सबसे पुरानी समाचार एजेंसी के साथ दिल्ली पुलिस ने जो सलूक किया, उस पर लोकतंत्र के पक्षधर नागरिक चिंता व्यक्त कर रहे हैं। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, एडिटर्स गिल्ड, वीमेंस प्रेस क्लब समेत कुछ पत्रकार संगठनों ने भी इसकी निंदा की है और अलग-अलग दलों के कुछ नेताओं ने पुलिस के रवैये पर सवाल उठाए हैं। लेकिन इस खबर पर जो व्यापक हलचल मचनी चाहिए थी, वो कहीं नजर नहीं आ रही। इससे समझ आता है कि अब हम शायद जागरुक समाज नहीं रहे, और काफी हद तक संवेदनहीन, आत्मकेन्द्रित हो चुके हैं। तभी तो बड़ी से बड़ी घटनाएं भी हमें विचलित नहीं करतीं। अल्पसंख्यकों, आदिवासियों, महिलाओं, बच्चों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार की कई खबरें आती हैं और समाज उन्हें सरसरी निगाह से देखकर टाल देता है कि ये सब तो होता ही रहता है। अत्याचार तो पहले भी होते रहे हैं, तब पत्रकार इन्हें उजागर करना अपना दायित्व समझते थे।
क्योंकि जब तक समाज की बुराइयों को सामने नहीं लाया जाएगा, तब तक उनका खात्मा करने के तरीके भी नहीं तलाशे जा सकते। लेकिन अब मीडिया भी उन्हीं खबरों को तरजीह देता है, जो वायरल हों, जिनके कारण टीआरपी बढ़े या लाइक्स और कमेंट्स ज्यादा मिले। यही वजह है कि पहले कुंभ मेले में एक सुंदर युवती मोनालिसा चर्चा में आई, फिर उसके अभिनेत्री बनने की खबरें खूब चलीं और अब उसने विवाह कर लिया तो उस पर भी प्रेस कांफ्रेंस हो गई कि उसने जिस व्यक्ति से विवाह किया, उसका धर्म क्या है और यह सही है या नहीं। सोचिए मीडिया ने अपनी प्राथमिकताओं को किस गर्त में पहुंचा दिया है कि दो बालिग आपसी रजामंदी से विवाह करें तो वह उनकी हेडलाइन्स बन जाती है।
इस माहौल में यूएनआई का दफ्तर सील करना और वहां मौजूद पत्रकारों से बदसलूकी आम खबर की तरह आई और चली भी गई। गौरतलब है कि दिल्ली में संसद भवन के पास 9 रफ़ी मार्ग पर लगभग 5,289.52 वर्ग मीटर ज़मीन दशकों पहले यूएनआई को सरकार ने लीज़ पर दी थी। इस जमीन की अनुमानित क़ीमत मौजूदा दर 7.74 लाख रुपये प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से करीब 409 करोड़ रुपये आंकी गई है। सरकार ने यह जमीन संयुक्त कार्यालय परिसर विकसित करने के यूएनआई को दी थी, लेकिन कम से कम 40 साल बीतने के बाद भी वहां कोई निर्माण नहीं हुआ। सरकार का कहना है कि यूएनआई कार्यालय का निर्माण नहीं कर सका, जो आवंटन पत्र में तय शर्तों का उल्लंघन है। जिसके बाद आवास और शहरी कार्य मंत्रालय के तहत आने वाले लैंड एंड डेवलपमेंट ऑफ़िस ने 12 जनवरी 2023 को कारण बताओ नोटिस जारी करने के बाद 29 मार्च 2023 को आवंटन रद्द कर दिया था।
न्यूज़ एजेंसी ने इस रद्दीकरण को अदालत में चुनौती दी थी, लेकिन हाई कोर्ट ने वित्तीय कमी और लंबित मंजूरियों को देरी का कारण बताने वाले उसके तर्कों को ख़ारिज कर दिया। अदालत ने माना कि चार दशकों से अधिक समय तक भवन का निर्माण न करना आवंटन की शर्तों का गंभीर उल्लंघन है। शुक्रवार को ही यह फैसला आया और इसी शाम को ही कुछ वकील और दिल्ली पुलिस भारी दलबल के साथ परिसर पहुंच गए।
अदालत का फैसला और उसके मुताबिक कानूनी कार्रवाई तो सही है, लेकिन यहां असली सवाल पुलिस के रवैये का है। जिस तरह एक मीडिया संस्थान से कर्मचारियों को निकाला गया, वैसा सलूक अपराधियों के साथ किया जाता है। सोशल मीडिया पर कई वीडियो आए हैं, जिनमें यूएनआई परिसर में बड़ी तादाद में पुलिसकर्मी दिखाई दे रहे हैं और पत्रकारों-कर्मचारियों से दफ़्तर खाली करने को कह रहे हैं। नई दिल्ली के पुलिस उपायुक्त सचिन शर्मा ने समाचार एजेंसी पीटीआई से कहा कि दफ़्तर खाली कराने में क़ानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया और कुछ भी ग़लत नहीं हुआ, क्योंकि पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी की गई थी। लेकिन यूएनआई ने अपनी पोस्ट में एक वीडियो भी शेयर किया है, जिसमें उसके दफ़्तर में बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी नज़र आ रहे हैं और कर्मचारी आरोप लगा रहे हैं कि उनके साथ धक्का-मुक्की हो रही है।
यूएनआई के कुछ कर्मियों ने बताया कि शाम को कुछ वकील और अधिकारी बड़ी संख्या में दिल्ली पुलिस और अन्य बलों के साथ यूएनआई के दफ़्तर पहुंचे। शाम 6 से 6.30 बजे के बीच प्रशासनिक कार्यालय बंद हो चुका था, ये सभी लोग सीधे न्यूज़ रूम में घुस गए जहां उर्दू और हिंदी सर्विस है। रोज़ा इफ़्तार का समय था तो उर्दू सर्विस के कुछ लोग बाहर गए थे। अधिकारियों ने आते ही कहा कि आप अपने कम्प्यूटर तुरंत बंद कीजिए क्योंकि आपका लीज़ कैंसिल हो गया है और आपको तुरंत बाहर निकलना चाहिए, पांच मिनट, दस मिनट, सात मिनट...इस तरह वो काउंट डाउन करने लगे। उन्होंने मोबाइल पर पढ़कर आदेश सुनाया कहा कि आपको यह कार्यालय तुरंत खाली करना पड़ेगा क्योंकि इसे सील करवाना है। कर्मियों का कहना है कि हमें ज़बरदस्ती धकेला गया, महिला कर्मचारियों को खींचा गया।
इस तरह से किसी समाचार संगठन को बंद करने की शायद यह पहली घटना है, लेकिन क्या आखिरी भी होगी, यह मीडिया संस्थानों और समूचे प्रेस जगत को सोचना होगा। कर्मचारियों को बाहर निकालने के बाद यूएनआई दफ्तर का गेट सील कर उसके बाहर एक नोटिस चिपकाया गया है। जिसमें लिखा है, 'लैंड एंड डेवलपमेंट ऑफ़िस की बिना इजाज़त के इस परिसर में किसी भी व्यक्ति का किसी तरह का प्रवेश, कब्ज़ा या इसका इस्तेमाल पूरी तरह प्रतिबंधित है और इसके उल्लंघन पर क़ानून के तहत कार्रवाई होगी।'
इस प्रकरण पर यूएनआई के मौजूदा मालिक स्टेट्समैन ने एक्स पर एक पोस्ट में लिखा, 'भारत में मीडिया की आज़ादी पर एक अभूतपूर्व अत्याचार और हमले के तौर पर देश की सबसे पुरानी समाचार एजेंसी यूएनआई के रफ़ी मार्ग स्थित दफ़्तर पर पुलिस बल ने सचमुच हमला बोल दिया।' स्टेट्समैन ने कहा कि 'कर्मचारियों को अपना सामान लेने या प्रबंधन से बात करने के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया गया। स्टेट्समैन ने इस घटना को 'अभूतपूर्व अत्याचार और भारत में मीडिया स्वतंत्रता पर हमला' बताया और कहा कि रफ़ी मार्ग कार्यालय पर पुलिस की कार्रवाई किसी जबरन आतंकवाद-रोधी ऑपरेशन जैसी लग रही थी।'
स्पष्ट है कि दिल्ली पुलिस का व्यवहार बुलडोजर न्याय सरीखा ही था, बस पुलिस बुलडोजर लेकर नहीं पहुंची, इतनी ही गनीमत है।


