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पत्रकार भी दिमागी नक्सल!

सत्ता के विरोध की आवाज़ को दबाना और कुचलना किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए अच्छे लक्षण नहीं हैं।

पत्रकार भी दिमागी नक्सल!
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सत्ता के विरोध की आवाज़ को दबाना और कुचलना किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए अच्छे लक्षण नहीं हैं। यह तानाशाही का प्रतीक है कि अपने शासक की हर बात को सिर झुका कर सुना जाए, उस पर सवाल न उठाएं जाएं और सदा उसकी जय जयकार की जाए। खेद की बात है कि भारत में इस समय ऐसा ही माहौल बनता जा रहा है। हालांकि हमारा संविधान इतना मजबूत और कारगर है कि इसके उपाय किसी भी तानाशाही प्रवृत्ति को हावी नहीं होने देते, अगर ऐसे संकेत मिलते हैं तो जनता ही चेतावनी दे देती है। बावजूद इसके इस समय किसी न किसी तरीके से सत्ता विरोधियों के दमन की कोशिशें चल ही रही हैं। यह महज संयोग नहीं है कि दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों पर लाठियां और पैलेट गन चलाकर उन्हें संसद मार्च से रोका गया, उस दौरान बिहार में भी ऐसे ही प्रदर्शन हुए थे, जिसमें दमनकारी उपाय प्रशासन ने आजमाए और अब एक महीने बाद बिहार में फिर से अपना हक मांग रहे प्रदर्शनकारियों पर लाठियां और पानी की बौछारें पड़ रही हैं। इस एक महीने के बीच में देश ने 80वां स्वतंत्रता दिवस भी मना लिया, लेकिन आजाद खयालों को कुचलने के तरीके अब भी भाजपा की तरफ से आजमाए जा रहे हैं।

गौरतलब है कि 15 अगस्त को लाल किले से प्रधानमंत्री मोदी ने दिमागी नक्सल शब्द का इस्तेमाल किया था। जिस पर सभी को हैरानी हुई थी कि अर्बन नक्सल के बाद अब दिमागी नक्सल जैसी संज्ञा प्रधानमंत्री ने क्यों निकाली। अब उसका अभिप्राय समझ आ रहा है। भाजपा उन तमाम लोगों को दिमागी नक्सल बता रही है, जो सरकार से सवाल पूछते हैं। 20 अगस्त को भाजपा ने दिमागी नक्सल कौन है, ऐसे गीत के साथ एक वीडियो अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर डाला है, जिसमें लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी, आप प्रमुख अरविंद केजरीवाल, पत्रकार राजदीप सरदेसाई, अभिनेता प्रकाश राज, यूट्यूबर धु्रव राठी, और गायक विशाल ददलानी जैसे चेहरों को दिखाया गया है।

राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल तो भाजपा की विरोधी पार्टियों के नेता हैं, लेकिन बाकी चारों भाजपा से राजनैतिक मुकाबला नहीं करते हैं, बल्कि वे उसकी नीतियों की आलोचना करते हैं। देश का संविधान इसकी इजाज़त देता है। राजदीप सरदेसाई को भी भाजपा ने जिस तरह दिमागी नक्सल बताया है, उससे जाहिर होता है कि स्वतंत्र मीडिया से भाजपा को कितनी परेशानी होती है। आश्चर्य नहीं कि प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत लगातार गिरता जा रहा है, इस समय उसकी रैंकिंग 180 देशों में 157वां है। जब प्रधानमंत्री नॉर्वे गए हुए थे और वहां पत्रकार हेले लिंग ने उनसे सवाल पूछे तो भारतीय मीडिया के बहुत से लोगों ने उनकी काबिलियत पर ही सवाल उठा दिए। जबकि कायदे से पत्रकारों को भी यही पूछना चाहिए कि प्रधानमंत्री मोदी ने आज तक एक भी खुली प्रेस कांफ्रेंस क्यों नहीं की, क्यों वो चुनिंदा पत्रकारों को स्क्रिप्ट आधारित साक्षात्कार देते हैं। जब उन्हें यकीन है कि जनता ने उन्हें बहुमत से जिताकर सत्ता सौंपी है, तो फिर इतनी बहादुरी भी दिखा दें कि सवालों का सामना कर लें। खैर सवालों से मोदी सरकार की चिढ़ का ही नतीजा है कि राजदीप सरदेसाई को दिमागी नक्सल बताया गया।

गनीमत है कि इस पर एडिटर्स गिल्ड ने आलोचनात्मक बयान जारी किया है और कहा कि पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ टीवी पत्रकार राजदीप सरदेसाई को 'दिमागी नक्सलÓ बताना पूरी तरह ग़लत है। गिल्ड ने कहा कि राजदीप सरदेसाई ने अपने लंबे पत्रकारिता जीवन में समाचारों और राजनीतिक घटनाक्रमों का पेशेवर और निष्पक्ष विश्लेषण किया है। ऐसे पत्रकार को इस तरह के राजनीतिक लेबल देना न केवल उनकी प्रतिष्ठा पर हमला है बल्कि पूरे मीडिया जगत के लिए चिंताजनक संकेत है। गिल्ड ने कहा कि सबसे गंभीर बात यह है कि यह हमला किसी अनजान समूह या सोशल मीडिया ट्रोल की ओर से नहीं बल्कि सत्ता पक्ष के आधिकारिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से किया गया है। गिल्ड ने कहा कि किसी पत्रकार को सिर्फ इसलिए सार्वजनिक रूप से बदनाम करना कि वह सरकार से सवाल पूछता है या उसकी नीतियों का विश्लेषण करता है, लोकतांत्रिक मूल्यों और प्रेस की स्वतंत्रता के ख़िलाफ़ है। एडिटर्स गिल्ड ने कहा कि लोकतंत्र में पत्रकारों का काम सरकार से सवाल पूछना, नीतियों की समीक्षा करना और जनता तक तथ्य पहुंचाना है। यदि पत्रकारों को राजनीतिक विरोधी या दुश्मन की तरह पेश किया जाएगा तो इससे मीडिया की स्वतंत्रता कमजोर होगी। गिल्ड ने कहा कि भारत के संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की जो गारंटी दी गई है, ऐसे हमले उसकी भावना के विपरीत हैं। गिल्ड का कहना है कि पत्रकारों को डराने या उन्हें राजनीतिक पहचान देने की कोशिश भारत की लोकतांत्रिक छवि को नुक़सान पहुंचाती है। एडिटर्स गिल्ड ने अपने बयान के अंत में भाजपा से अपील की कि वह अपने आधिकारिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल पत्रकारों को बदनाम करने के लिए न करे।

यह बयान सर्वथा उचित है, लेकिन अब देश के पत्रकारों और उनके हितों की रक्षा करने वाली संस्थाओं को यह भी देखना होगा कि उनके बयानों का असर अंजाम में भी नजर आए। क्योंकि इस समय देश में पत्रकारिता के नाम पर सरकार की चाटुकारिता करने वाली एक बड़ी जमात तैयार हो गई है, जिसका काम चौबीस घंटे हिंदू-मुसलमान जैसे फिजूल विवादों को बढ़ाना है। भाजपा की सत्ता की जमीन तैयार करने में ऐसे पत्रकारों का बड़ा योगदान रहा है। पिछले बारह सालों में सत्ता की जी हुजूरी करने वाले कई पत्रकार धन और शक्तिसंपन्न हो चुके हैं। वहीं जिन लोगों ने सत्ता पर सवाल उठाए, उन्हें कभी अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा तो कभी जान से। अमूमन भाजपा ऐसे मामलों से सीधे जुड़े हुए नहीं दिखी, लेकिन अब उसने आधिकारिक तौर पर एक पत्रकार को दिमागी नक्सल बताकर जाहिर कर दिया है कि उस पर सत्ता की हनक पूरी तरह चढ़ी हुई है और वह अपने विरोधियों को कुचलने में कोई संकोच नहीं करेगी। लेकिन सच्चे पत्रकारों और उनकी हितैषी संस्थाओं को देखना होगा कि पानी सिर के ऊपर से निकल रहा है, इसे अब नहीं रोका गया तो लोकतंत्र का काफी नुकसान हो जाएगा।


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