Top
Begin typing your search above and press return to search.

ट्रंप का प्रस्ताव ठुकराना ही बेहतर

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तरफ से भारत को एक ऐसा प्रस्ताव मिला है, जिसे सरकार को फौरन नकार देना चाहिए

ट्रंप का प्रस्ताव ठुकराना ही बेहतर
X

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तरफ से भारत को एक ऐसा प्रस्ताव मिला है, जिसे सरकार को फौरन नकार देना चाहिए। क्योंकि इसमें न केवल भारत की संप्रभुता और गुटनिरपेक्षता पर खतरा खड़ा होगा, बल्कि घोर वैश्विक असंतुलन भी खड़ा हो सकता है। डोनाल्ड ट्रंप गज़ा में शांति बहाल करने और स्थायी व्यवस्था निर्मित करने के लिए बनाए गए बोर्ड में भारत को भी शामिल करना चाहते हैं। अमेरिका की तरफ से बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने का औपचारिक निमंत्रण आया है। 16 जनवरी को प्रधानमंत्री मोदी को लिखे पत्र में ट्रंप ने कहा कि भारत की भागीदारी से मध्य पूर्व में शांति की दिशा में एक 'ऐतिहासिक और निर्णायक प्रयास' को मजबूती मिलेगी। उन्होंने इसे 7 अक्टूबर 2023 से जारी गज़ा संघर्ष को समाप्त करने के लिए एक नए और साहसिक वैश्विक दृष्टिकोण के रूप में पेश किया है। ट्रंप के मुताबिक, उन्होंने 29 सितंबर, 2025 को गज़ा संकट को खत्म करने के लिए 20-बिंदुओं वाली योजना की घोषणा की थी, जिसे अरब देशों, इज़रायल और यूरोप सहित कई वैश्विक नेताओं का समर्थन मिला था। संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी इसे अनुमोदित किया था।

लेकिन बात केवल इतनी ही नहीं है। असल में यह बोर्ड ऑफ पीस पूरी वैश्विक व्यवस्था को उलट-पुलट करने के इरादे से बनाया गया है। डोनाल्ड ट्रंप इसके आजीवन अध्यक्ष रहेंगे, और वो हटते हैं तो उनके द्वारा नामित व्यक्ति ही उनका उत्तराधिकारी बनेगा। यानी अमेरिका अपनी चौधराहट अब नए तरीके से दिखा रहा है। इसके अलावा बोर्ड के जरिए केवल गज़ा तक नहीं बल्कि तीसरी दुनिया के देशों की कमान संभालने का इरादा दिख रहा है।

ट्रंप ने पिछले साल सितंबर में जब ग़ज़ा के लिए एक 20-सूत्रीय शांति योजना प्रस्तावित की थी तो इसमें ग़ज़ा को एक 'अस्थायी शासन' के अधीन रखा जाना था, जिसका प्रबंधन एक 'तकनीकी, गैर-राजनीतिक फिलिस्तीनी समिति' द्वारा किया जाता। जब संरा ने इस बोर्ड को मंजूरी दी, तो इसका कार्यकाल 2027 के अंत तक सीमित था और फोकस केवल ग़ज़ा पर था। लेकिन बोर्ड का चार्टर अब विस्तारित हो चुका है। अब यह सिर्फ मध्यपूर्व की शांति तक सीमित नहीं है, बल्कि 'वैश्विक संघर्षों को सुलझाने' वाला एक 'नया अंतरराष्ट्रीय संगठन और अस्थायी शासन प्रशासन' के रूप में परिभाषित है। चार्टर में 'और संस्थाओं से अलग होने का साहस' पर जोर दिया गया है। यानी संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी संस्था को खत्म कर, एक समानांतर व्यवस्था बनाने की चालाकी ट्रंप ने दिखाई है। बोर्ड का चार्टर 'संघर्ष से प्रभावित' या 'संघर्ष की धमकी वाले' क्षेत्रों में 'स्थायी शांति' पर फोकस करता है। जहां 'धमकी वाले' क्षेत्र की परिभाषा साफ नहीं है। वैसे भारत इस व्यवस्था से दूर ही रहे तो अच्छा है, क्योंकि चार्टर में लिखे 'संघर्ष की धमकी वाले क्षेत्र' जैसे अस्पष्ट शब्द भविष्य में कश्मीर जैसे मुद्दे पर भारत की संप्रभुता को चुनौती दे सकते हैं। ट्रंप अभी पहलगाम के बाद ही किस तरह दखलंदाजी करने लगे हैं, ये सबने देखा है। भारत की हामी के बाद तो उन्हें कश्मीर पर बोलने का लाइसेंस ही मिल जाएगा।

दरअसल गज़ा को कट्टरता और आतंकवाद से मुक्त क्षेत्र बनाने, सुरक्षा ढांचा तैयार करने और पुनर्निर्माण करने के नाम पर ट्रंप अब एशिया और अफ्रीका के कमजोर देशों पर अमेरिकी पूंजीवाद के चंगुल और कसना चाहते हैं। नए निर्माण और सुरक्षा के नाम पर कमजोर देशों को मनमानी शर्तों पर समझौता करने मजबूर किया जाएगा और उससे बाद उनकी जमीन और संसाधनों का इस्तेमाल ट्रंप अपने मुनाफे के लिए करेंगे। अभी संयुक्त राष्ट्र संघ चाहे शांति बहाली या युद्ध रुकवाने में प्रभावी रहे न रहे, वहां सभी सदस्य देशों के वोट का महत्व है और वीटो शक्ति के कारण किसी एक देश की मनमानी नहीं चल पाती है। ट्रंप इसे खत्म करके एक नये किस्म की तानाशाही कायम करने की राह पर हैं और इसमें वो भारत को भी शामिल करना चाहते हैं।

अब यह नरेन्द्र मोदी को तय करना है कि वे ट्रंप की मीठी-मीठी बातों में आते हैं या भारत के घरेलू और वैश्विक हितों पर दूरगामी नजरिया रखते हैं। गौरतलब है कि ट्रंप का निमंत्रण ऐसे वक्त में आया है जब मोदी सरकार ट्रंप प्रशासन के साथ एक व्यापार समझौते पर काम कर रही है, ताकि भारतीय निर्यात पर लगे 50प्रतिशत शुल्क को कम किया जा सके।

ट्रंप ने पहले ही भारत को परोक्ष रूप से धमका कर अपने फायदे के सौदे करवाए हैं। चाहे रूस से तेल खरीद कम करना हो या ईरान में चाबहार पोर्ट पर समझौते से पीछे हटना हो, मोदी सारे काम ट्रंप की सुविधा के लिए कर रहे हैं। अब उनके सामने बोर्ड ऑफ पीस का नया चारा फेंका गया है। ध्यान रहे कि ट्रंप इसमें भी चंदा उगाही से बाज नहीं आ रहे हैं। इस बोर्ड में स्थायी सदस्यता पाने के लिए एक अरब अमेरिकी डॉलर का योगदान करना होगा। वहीं, तीन साल की अस्थायी सदस्यता के लिए किसी वित्तीय योगदान की शर्त नहीं रखी गई है। इस राशि का उपयोग गज़ा के लिए होगा, ये कहा गया है। लेकिन जहां ट्रंप की मर्जी चलेगी, वहां क्या कोई देश या बोर्ड का सदस्य हिसाब-किताब मांग सकेगा।

बता दें कि इस समय बोर्ड की कार्यकारी समिति में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो, ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर, मध्य पूर्व के लिए अमेरिका के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ, ट्रंप के दामाद और व्यवसायी जेरेड कुशनर तथा विश्व बैंक के अध्यक्ष अजय बंगा शामिल हैं। इसके अलावा अपोलो ग्लोबल मैनेजमेंट के सीईओ मार्क रोवन और अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रॉबर्ट गैब्रियल भी समिति का हिस्सा हैं। मतलब सभी ट्रंप के करीबी इसमें शामिल हैं, यानी किसी सदस्य ने अलग राय व्यक्त भी की, तो उसका महत्व नहीं होगा।

ट्रंप ने भारत के अलावा, हंगरी, अल्बानिया, ग्रीस, कनाडा, तुर्की, साइप्रस, मिस्र, जॉर्डन, पैराग्वे और अर्जेंटीना जैसे देशों को भी निमंत्रण भेजा गया है। पाकिस्तान ने भारत से पहले अपना निमंत्रण स्वीकार किया, जबकि हंगरी ने स्पष्ट रूप से हामी भरी है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक विदेश मंत्रालय या नरेन्द्र मोदी की कोई टिप्पणी तो नहीं आई है। लेकिन बेहतर यही होगा कि नरेन्द्र मोदी विश्वगुरु बनने के मोह में न पड़ें और इस निमंत्रण को विनम्रता से ठुकरा दें। मोदी अगर भारत की गुटनिरपेक्षता वाली पारंपरिक विदेश नीति पर कायम रहेंगे, तो उनके पास विश्वगुरु कहलाने की संभावनाएं बनी रहेंगी।


Next Story

Related Stories

All Rights Reserved. Copyright @2019
Share it