सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को याद करना जरूरी
दिल्ली में जारी एसआईआर में खामियां और चुनाव आयोग की नाकामियां खुलकर सामने आ ही रही हैं।

दिल्ली में जारी एसआईआर में खामियां और चुनाव आयोग की नाकामियां खुलकर सामने आ ही रही हैं। लेकिन सबसे खतरनाक बात यह है कि चुनाव आयोग सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को ही खत्म करने के संकेत दे रहा है। 20 सितंबर को दिल्ली चुनाव आयोग की एक विज्ञप्ति जारी हुई है, जिसमें लिखा है-
वीआईपी / चिह्नित मतदाताओं को नोटिस जारी किए जाने के संबंध में विभिन्न प्रिंट और सोशल मीडिया रिपोर्टों पर प्रेस नोट। शब्दों पर गौर करें वीआईपी मतदाता का इस्तेमाल चुनाव आयोग ने किया है। जबकि संविधान के मुताबिक सारे नागरिक मतदाता के तौर पर एक समान ही हैं, उनमें न कोई वीआईपी है, न कोई साधारण। इसलिए जब हम चुनावों में वोट डालने जाते हैं तो एक ही कतार में सब खड़े होते हैं और अपनी बारी आने पर एक ही वोट डालते हैं।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर कराए जाने का प्रावधान किया गया है। सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार यानी यूनिवर्सल एडल्ट फेंचाइज़ का अर्थ है कि देश के सभी वयस्क नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के वोट देने का अधिकार प्राप्त होना। पाठक कृपया ध्यान दें, बिना किसी भेदभाव के, अर्थात देश में हर वयस्क नागरिक को एक चुनाव में एक वोट देने का समान अधिकार मिला हुआ है। फिर चाहे वह वोट नरेन्द्र मोदी का हो, गौतम अडानी का हो या किसी गरीब बस्ती में रहने वाले नौशाद खान का हो। संविधान की नजर में पद, ओहदे, संपत्ति, धर्म, जाति, लिंग से परे हर नागरिक समान है। इसलिए हर नागरिक का एक वोट होता है और हर वोट का मूल्य समान होता है। सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार जाति, धर्म, लिंग, वर्ण, नस्ल, आर्थिक स्थिति (संपत्ति या आय) या शिक्षा के आधार पर बिना किसी भेदभाव के सारे वयस्क नागरिकों को हासिल है। भारत में 18 वर्ष या उससे अधिक आयु का प्रत्येक नागरिक वोट देने का अधिकारी है। यानी वह वयस्क है। इससे पहले वर्ष 1988 में 61वें संविधान संशोधन द्वारा मतदान की आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दी गई थी।
सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार ही लोकतंत्र की नींव और भारतीय लोकतंत्र का मुख्य आधार है। सबसे खास बात यह है कि 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के साथ ही सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार नागरिकों को मिल गया। जबकि उस समय अमेरिका समेत कई देशों में हर वयस्क नागरिक को वोट का अधिकार नहीं मिला था। कहीं महिलाओं को, कहीं अश्वेतों को, कहीं गरीबों को वोट देने के योग्य नहीं समझा जाता था। आज के दौर में ये बातें अजीब लग सकती हैं, लेकिन जब दुनिया कई किस्म के भेदभाव का शिकार थी, जिसमें भारत भी शामिल था, उस समय भारत की पहली सरकार ने ऐसा प्रगतिशील कदम उठाया था, जिससे देश में लोकतंत्र की नींव मजबूत बनी। सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का यह पुर्नस्मरण इस समय करवाना जरूरी है। वैसे तो आठवीं कक्षा की राजनीति विज्ञान की किताब में इस पर एक अध्याय है। लेकिन इस समय मोदी सरकार और चुनाव आयोग की जो हरकतें हैं, उसके बाद कब इस अध्याय को हटा दिया जाए और कब सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार से देश के गरीबों, अल्पसंख्यकों, कमजोर तबकों को वंचित कर दिया जाए, कहा नहीं जा सकता। दिल्ली चुनाव आयोग की विज्ञप्ति में वीआईपी मतदाता का जिक्र इसका ताजा उदाहरण है।
गौरतलब है कि दिल्ली में एसआईआर की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट जारी करते समय चुनाव आयोग ने पहले की वोटर लिस्ट के मुकाबले 47 लाख से ज्यादा लोगों के नाम काट दिए थे। जिन लोगों के नाम ड्राफ्ट लिस्ट में हैं उनमें से 33 लाख से ज्यादा लोगों को विभिन्न कारणों के नोटिस भेजे जा रहे हैं। जिन लोगों को नोटिस भेजे गए हैं उन सभी को चुनाव आयोग के अधिकारियों के सामने पेश होकर अपने वोटर होने का दावा पेश करना होगा। खास बात यह है कि नोटिस पाने वालों में दिल्ली में रहने वाले कई वरिष्ठ मौजूदा और रिटायर्ड आईएएस अफसर शामिल है, इनमें चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधु का नाम भी दर्ज है। चुनाव आयोग ने जिन लोगों को नोटिस भेजा है उनमें दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, बीजेपी सांसद बांसुरी स्वराज, विदेश मंत्री एस जयशंकर, विदेश सचिव विक्रम मिसरी, सेबी चेयरमैन तुहिन कांत पांडे, प्रधानमंत्री के प्रधान साइंटिफिक एडवाइजर अजय सूद जैसे कई नाम शामिल हैं। इनमें से किसी का नाम पिछली लिस्ट में नहीं मिला, किसी का नाम गलत लिखा गया है। हैरानी की बात यह है कि लालकृष्ण आडवानी को भी नोटिस मिला है, क्योंकि 2002 की वोटर लिस्ट में उन का नाम नहीं मिला जबकि उस दौरान लालकृष्ण आडवाणी देश के उप प्रधानमंत्री थे और दिल्ली में ही रहते थे। चुनाव आयोग की लापरवाही का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति में रहे बिबेक देबरॉय के नाम भी नोटिस जारी हुआ है, जबकि 2024 में उनका देहांत हो चुका है।
वैसे चुनाव आयोग ने शनिवार को भी एक विज्ञप्ति जारी कर मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के नाम पर नोटिस जारी होने पर स्पष्टीकरण दिया था कि अब उनका नाम वोटर लिस्ट में शामिल कर लिया गया है। लेकिन बाकी जिन लाखों लोगों को नोटिस जारी हुए है उस पर चुनाव आयोग की तरफ से अभी तक कोई सफाई नहीं आई है। रेखा गुप्ता मामले में चुनाव आयोग ने जब तत्परता से काम करते हुए उनका नाम फौरन जोड़ा था, तब सवाल उठे थे कि क्या चुनाव आयोग उन तमाम लोगों के लिए भी ऐसी ही तत्परता दिखाएगा, जो अकारण वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं। अब चुनाव आयोग ने खुद वीआईपी मतदाता वाली विज्ञप्ति जारी कर अपना रुख साफ कर दिया है। इससे जाहिर हो गया है कि चाहे लालकृष्ण आडवाणी हों या बांसुरी स्वराज, तमाम नेताओं और अफसरों को तो वीआईपी होने का लाभ चुनाव आयोग दे देगा, और बचे लाखों लोग नोटिस पर सफाई देने के लिए सारे कामधाम छोड़कर बीएलओ के पास चक्कर लगाते रहेंगे।
एसआईआर लोकतंत्र के साथ कितना बड़ा खिलवाड़ है, यह एक बार फिर जाहिर हो गया है। बिहार से लेकर प.बंगाल तक बार-बार विपक्ष ने इस पर सवाल उठाए, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक नहीं लगाई, अब वीआईपी मतदाता वाली विज्ञप्ति के बाद क्या माननीय अदालत संज्ञान लेगी, यह देखना होगा।


