नाजी जर्मनी की तरफ बढ़ता भारत
सभी राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों को स्वत: संज्ञान लेकर शिकायत का इंतजार किए बिना अपराधियों के खिलाफ तत्कालीन आईपीसी की धारा 153 ए, 153 बी, 295 ए और 505 के तहत प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दिया था।

शाहीन अब्दुल्ला बनाम भारत संघ (2022) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने घृणास्पद बयान यानी हेट स्पीच के खिलाफ कड़ी कार्रवाई के निर्देश दिए थे। कोर्ट ने सभी राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों को स्वत: संज्ञान लेकर शिकायत का इंतजार किए बिना अपराधियों के खिलाफ तत्कालीन आईपीसी की धारा 153 ए, 153 बी, 295 ए और 505 के तहत प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दिया था। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा था कि पुलिस को औपचारिक शिकायत के अभाव में भी नफरत भरे भाषणों के मामलों में स्वत: संज्ञान लेकर कार्रवाई करनी चाहिए और कोई भी निष्क्रियता या हिचकिचाहट कर्तव्य की गंभीर लापरवाही मानी जाएगी। तो सवाल यह है कि क्या असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा शीर्ष अदालत के इस निर्देश से भी परे हैं।
मुख्यमंत्री पद के लिए ली गई संवैधानिक शपथ की तो धज्जियां वो सांप्रदायिक जहर उगलते हुए लगातार उड़ा ही रहे हैं, अब वो अदालती निर्देश की भी परवाह नहीं कर रहे हैं। क्या हिमंता बिस्वासरमा गुजरात मॉडल के कारण निश्चिंत हैं, जहां अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत और हिंसा का जानलेवा माहौल बना, लेकिन सत्ता पर बैठे लोगों का बाल भी बांका नहीं हुआ। बल्कि आगे उन्हें पदोन्नत कर शिखर पर बिठा दिया गया। 2002 में गुजरात के कारण सवाल उठने लगा था कि क्या हम नाजी जर्मनी के दौर में पहुंच रहे हैं, लेकिन तब ये सवाल एक राज्य तक ही सीमित था। अब इसका दायरा बढ़ते हुए राष्ट्रव्यापी हो चुका है। इक्का-दुक्का राज्यों को छोड़कर हर जगह सांप्रदायिक नफरत घुन की तरह व्यवस्था के भीतर पैठ जमा चुकी है। लगभग रोजाना ऐसी खबरें आती हैं, जहां केवल धर्म के नाम पर किसी नागरिक या नागरिकों को प्रताड़ित किया जाता है।
लेकिन अभी असम से जो खबरें आई हैं, वो बेहद चिंताजनक है। भारतीय जनता पार्टी की असम ईकाई ने अपने आधिकारिक 'एक्सÓ अकाउंट से 7 फरवरी को एक वीडियो पोस्ट किया था, जिसे एक दिन बाद ही हटा दिया गया लेकिन अभी भी सोशल मीडिया पर यह उपलब्ध है। वीडियो में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वासरमा को हथियार से लैस दिखाया गया है और वे मुसलमान दिख रहे लोगों को निशाना बना रहे हैं और उन्हें गोली मार रहे हैं। इस विवादित वीडियो में इस्तेमाल की गई तस्वीरों और 'पॉइंट ब्लैंक शॉट' और 'कोई दया नहीं' जैसे बयान भी हैं, जो सीधे-सीधे नरसंहार के लिए उकसाने वाले हैं। इस वीडियो पर कांग्रेस, शिवसेना, राजद, एआईएमआईएम जैसे विपक्षी दल तो सवाल उठा रहे हैं, लेकिन असल में कार्रवाई की ताकत जिनके पास है, उनकी चुप्पी बेहद डरावनी लग रही है। डर लग रहा है कि असम में अभी किए जा रहे इस प्रयोग को अगर बाकी देश पर भी किया गया तो क्या होगा। केंद्र सरकार यानी नरेन्द्र मोदी, अमित शाह जैसे लोगों से कोई उम्मीद नहीं है कि वे इस बारे में या हिमंता बिस्वासरमा के खिलाफ कुछ कहेंगे।
क्योंकि यह सब उनकी ही शह पर हो रहा होगा, अन्यथा कोई भाजपाई मुख्यमंत्री इतना दुस्साहस नहीं दिखा सकता। राष्ट्रपति महोदया भी केवल दही-चीनी खिलाने को ही अपना काम मान बैठी हैं। जब वे मणिपुर पर चुप रहीं तो असम पर भी चुप रहेंगी। चुनाव आयोग से भी कोई उम्मीद रखना बेमानी है। जब 2024 के चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी खुलेआम ज्यादा बच्चों वाला तंज मुसलमानों पर कस रहे थे, या झारखंड चुनाव में घुसपैठियों के नाम पर मुसलमानों के खिलाफ वीडियो बनाए जा रहे थे, आयोग तब भी सब देखता रहा और अब भी वह कुछ नहीं कहेगा। ले देकर उम्मीद बचती है सर्वोच्च न्यायालय से, लेकिन इन पंक्तियों के लिखे जाने तक वहां भी खामोशी ही है। आश्चर्य है कि माननीय न्यायालय को 2022 का दिया गया अपना ही निर्देश याद क्यों नहीं है। अगर इस मामले में अदालत की तरफ से कार्रवाई के निर्देश आते हैं, तब तो देश, संविधान, लोकतंत्र के बचे रहने की उम्मीद भी बचेगी, वर्ना विपक्ष अपनी तरफ से इन्हें जिंदा रखने की जो लड़ाई लड़ रहा है, बस वही आसरा अब रह गया है।
ऐसा नहीं है कि हिमंता बिस्वा सरमा ने संवैधानिक पद पर होने के बावजूद अल्पसंख्यक समुदाय के ख़िलाफ़ पहली बार ज़हर उगला है, वे तो लगातार इस नफरत को बढ़ाते ही जा रहे हैं। कुछ वक्त पहले डिगबोई में उन्होंने कहा था कि 'मियां मुसलमानों को किसी भी तरीक़े से परेशान करो। अगर वे परेशानी का सामना करेंगे, तो वे असम से चले जाएंगे। तब भी सवाल उठे थे, लेकिन उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई तो अब हिमंता बिस्वासरमा सीधे अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा का आह्वान कर रहे हैं।
भारत में नफ़रत भरी भाषा, सांप्रदायिक धु्रवीकरण और अल्पसंख्यकों के खिलाफ़ बढ़ती हिंसा एक आम भारतीय के लिए चिंता का विषय होना चाहिए, क्योंकि भाजपा को इसमें सत्ता का लाभ मिल रहा है, लेकिन नागरिकों के लिए अमन-चैन, रोजगार, शिक्षा और तमाम सुविधाएं छिनने के खतरे बढ़ रहे हैं। सेंटर फॉर स्टडी ऑन हेट की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, साल 2025 में देशभर में 1,318 नफ़रती भाषणों की घटनाएं दर्ज की गईं, जो 2024 के मुकाबले 13 प्रतिशत ज़्यादा है और 2023 के मुकाबले लगभग दोगुनी हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक़ पिछले साल औसतन हर दिन चार नफ़रती भाषण हुए। रिपोर्ट यह दावा भी करती है कि नफ़रत अब सिर्फ चुनावी भाषणों तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह एक निरंतर और संगठित राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बनती जा रही है।
बीबीसी से एक चर्चा में पूर्व प्रशासनिक अधिकारी और सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर ने कहा कि, 'ऐसा लगने लगा है कि नफ़रत कोई अपराध ही नहीं रहा। लेकिन इतिहास हमें चेतावनी देता है, नाज़ी जर्मनी में यहूदियों का नरसंहार गैस चैंबर से नहीं, बल्कि नफ़रती भाषण से शुरू हुआ था।Ó सवाल यही है कि क्या सत्ता में बने रहने के लिए भाजपा देश में आगे गैस चैंबर बनवाने की तैयारी में है।


