ब्रिक्स का कितना असर
तेल और गैस की क़ीमतों में भारी बढ़ोत्तरी से दुनिया में एक और मंदी का संकट गहराने लगा तो वहीं कई देशों के एक या दूसरे युद्ध में उलझने या किसी भी तरह उससे प्रभावित होने के कारण वैश्विक शांति भी प्रभावित हुई।

ईरान पर अमेरिका और इजरायल की तरफ से छेड़ा गया युद्ध, होर्मुज जल डमरू मध्य मार्ग पर वर्चस्व की जंग, फिलीस्तीन पर इजरायल के हमले, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के थोपे टैरिफ़ से दुनिया भर के कारोबार में उथल-पुथल मची। तेल और गैस की क़ीमतों में भारी बढ़ोत्तरी से दुनिया में एक और मंदी का संकट गहराने लगा तो वहीं कई देशों के एक या दूसरे युद्ध में उलझने या किसी भी तरह उससे प्रभावित होने के कारण वैश्विक शांति भी प्रभावित हुई। ऐसे तनावपूर्ण माहौल में भारत में 18वां ब्रिक्स सम्मेलन आयोजित हुआ। ब्रिक्स 2006 में जब बना तो यह ब्रिक (बीआरआईसी) हुआ करता था, जिसमें ब्राजील, रूस, इंडिया(भारत) और चीन शामिल थे, फिर 2010 में साउथ अफ्रीका (द.अफ्रीका) इसमें शामिल हुआ और यह ब्रिक्स बना। अब इस समूह में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब, यूएई और इंडोनेशिया भी शामिल हैं। सदस्य देशों के अलावा अबू धाबी, मलेशिया, बेलारूस, क्यूबा, कजाकिस्तान, बहरीन, वियतनाम, बुरुंडी, नाइजीरिया, युगांडा, उरुग्वे के प्रतिनिधि बैठक में मेहमान देशों के तौर पर शामिल हुए।
संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस के साथ-साथ विश्व स्वास्थ्य संगठन, विश्व बैंक, एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक, न्यू डेवलपमेंट बैंक के प्रतिनिधियों ने भी सम्मेलन में शिरकत की। यानी भारत के ब्रिक्स सम्मेलन में दुनिया की तक़रीबन आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाले नेता एक ही मंच पर इक_े हुए और वैश्विक अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण किरदार भी यहीं नजर आए।
इस लिहाज से भारत में आयोजित ब्रिक्स 2026 काफी खास हो जाता है। क्योंकि इस शिखर सम्मेलन से यह संदेश निकला है कि दुनिया में किसी एक देश, किसी एक ताकतवर नेता की मर्जी हमेशा नहीं चल सकती है, अंतरराष्ट्रीय संबंध और कूटनीति परस्पर सम्मान और बराबरी के व्यवहार से ही निभाए जाते हैं। भारत के लिए यह सम्मेलन इसलिए अहम रहा क्योंकि पिछले कुछ बरसों में हमारी विदेश नीति में स्पष्ट नजरिए की कमी देखी गई है। गुट निरपेक्षता को दरकिनार करने का दुष्परिणाम यह हुआ कि हम बार-बार अमेरिका के साए में दिखाई दिए, जिससे हमारे पारंपरिक मित्र देश भी थोड़े खिन्न नजर आए। गनीमत यह रही कि ब्रिक्स सम्मेलन के कारण संबंधों की प्राचीन ऊष्मा फिर झलकने लगी है।
इस बार रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ईरान के राष्ट्रपति डॉक्टर मसूद पेज़ेश्कियान का भारत आना खास चर्चा में रहा। खासकर इजरायल और अमेरिका के राष्ट्राध्यक्षों से नरेन्द्र मोदी जो नजदीकी दिखाने की कोशिश में रहते हैं, उसके कारण यह सवाल उठता रहा कि क्या मोदी ईरान और रूस से पुरानी दोस्ती कायम कर पाएंगे। वहीं चीन की आक्रमणकारी नीति का खामियाजा गलवान में भारत को उठाना पड़ा, उसके बाद भारत का रुख क्या रहेगा। नरेन्द्र मोदी और शी जिनपिंग के बीच बातचीत में कुछ बहुत ठोस निकलकर तो नहीं आया लेकिन दोनों देशों के बीच संबंधों को सामान्य बनाने की दिशा में एक और कदम बढ़ा है, यह भी अच्छी बात है। हालांकि भारत को अब भी सावधानी बरतनी होगी।
18वें ब्रिक्स सम्मेलन में शनिवार को जो संयुक्त घोषणापत्र जारी हुआ उसमें आतंकवाद के हर रूप की कड़ी आलोचना की गई। ब्रिक्स ने आतंकवाद, इसकी आर्थिक मदद, सीमा पार आतंकवाद और आतंकवादियों को सुरक्षित ठिकाना दिए जाने के ख़िलाफ़ मिलकर कार्रवाई करने की प्रतिबद्धता दोहराई। 45 पन्नों और 140 बिन्दुओं के नयी दिल्ली घोषणापत्र में '22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर में हुए आतंकवादी हमलेÓ की निंदा की गई, जिसमें 26 लोगों की मौत हुई थी। भारत इसके लिए पाकिस्तान समर्थित संगठनों को ज़िम्मेदार ठहराता है, लेकिन घोषणापत्र में पाकिस्तान का ज़िक्र नहीं किया गया है। क्या इसके पीछे ट्रंप का दबाव था, या जिनपिंग के होने की झिझक, यह स्पष्ट नहीं हुआ है। क्योंकि ऑपरेशन सिंदूर में चीन का साथ पाकिस्तान को मिला था और असीम मुनीर ट्रंप के प्रिय हैं, यह जगजाहिर है।
बहरहाल, घोषणापत्र में यह भी कहा गया है कि कई देशों को 'अन्यायपूर्ण और एकतरफ़ा संरक्षणवादी कदमोंÓ से नुकसान हो रहा है। इसे ट्रंप की तरफ से थोपे गए टैरिफ की आलोचना माना जा रहा है। लेकिन फिर बिना नाम लिए अगर अमेरिका या ट्रंप की आलोचना की जाए, तो क्या उससे मकसद हासिल होगा, यह ब्रिक्स देशों को सोचना होगा। घोषणापत्र में तीसरा अहम बिंदु प.एशिया में पसरा तनाव रहा। सम्मेलन में शामिल देशों की ओर से पहले फ़िलस्तीन और फिर अमेरिका-ईरान के बीच युद्ध से घिरे प.एशिया के संकट को अधिकतम संयम और कूटनीति के ज़रिए सुलझाने की अपील की गई। घोषणापत्र में ग़ज़ा और कब्ज़े वाले फ़िलस्तीनी इलाकों की मानवीय स्थिति पर भी गंभीर चिंता जताई गई। इसमें ग़ज़ा में सीज़फ़ायर बनाए रखने और बगै़र किसी बाधा के मानवीय मदद पहुंचाने की अपील की गई। साथ ही फ़िलस्तीनियों को जबरन विस्थापित किए जाने का विरोध किया गया है।
यह बिंदु काफी महत्वपूर्ण था और अगर इसमें सीधे इजरायल का नाम लेकर आलोचना और विरोध किया जाता तो बेहतर था। फिलहाल तो यह रस्मअदायगी लग रही है।
कुल मिलाकर ब्रिक्स देशों ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि दुनियाभर की राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था में बदलाव आना चाहिए। घोषणापत्र का मुख्य संदेश यही है कि अमेरिका या कोई भी महाशक्ति, दुनिया के अन्य देशों को जिन्हें आजकल ग्लोबल साउथ में शुमार किया जाता है, उन्हें दरकिनार नहीं कर सकती। लेकिन यह संदेश कितना असर दिखा पाएगा, यह देखना होगा।


