भक्ति के नाम पर अराजकता कब तक!
हमारे देश में धर्म के नाम पर पाखंड, छल-कपट और टकराव की घटनाएं होती रही हैं, इसके बावजूद समाज में उदारता और सहिष्णुता कायम रही आई।

हमारे देश में धर्म के नाम पर पाखंड, छल-कपट और टकराव की घटनाएं होती रही हैं, इसके बावजूद समाज में उदारता और सहिष्णुता कायम रही आई। लेकिन धर्म को जब से राज्यसत्ता का खुला प्रोत्साहन और समर्थन मिला है, उसमें बड़ी मात्रा में उग्रता और आक्रामकता का समावेश हो गया है। इसके परिणामस्वरूप धार्मिक क्रिया कलाप विकृत होने लगे हैं। उदाहरण के लिये फ़िलहाल कांवड़ यात्रा को ही लें। सावन शुरू होते ही धर्मभीरु लोग अपने कंधों पर जल भरे कलश लेकर शिवालयों की ओर कूच करने लगते हैं, इनमें बड़ी तादाद नौजवानों की होती है। धर्मनिरपेक्ष देश की राज्य सरकारें उनके रास्ते में पड़ने वाली सामिष खाद्य सामग्री की दूकानें और होटल बंद करवा देती है, उन पर हेलीकॉप्टर से फूल बरसाती है और पुलिस के जवान उनके पैरों की मालिश करते नज़र आते हैं। कुल मिलाकर कांवड़ियों की यात्रा को सुविधाजनक बनाने के लिये सरकारें वो सारे जतन करती हैं, जो वे कर सकती हैं। फिर भी साल-दर-साल अन्य धार्मिक यात्राओं के विपरीत, कांवड़ यात्रा में अप्रिय दृश्य देखने को मिलते हैं।
इस बार तो सावन के पहले दिन से ही जगह-जगह कांवड़ यात्रियों ने उत्पात मचाना शुरू कर दिया। हरिद्वार के बहादराबाद इलाके में कांवड़ से टकरा जाने पर कांवड़ियों ने लाठी-डंडों से हमला कर एक कार को बुरी तरह से क्षतिग्रस्त कर दिया, उसमें सवार लोगों के साथ भी मारपीट की। इसी इलाके में कुछ कांवड़ियों ने मामूली सी बात पर मालिश करने वाले एक युवक के साथ जमकर मारपीट की। हरिद्वार-रुड़की राजमार्ग पर कांवड़ियों ने एक कार चालक पर टक्कर मारकर कांवड़ को खंडित करने का आरोप लगाया और बीच सड़क पर भारी बवाल काटा। उन्होंने चालक से जमकर मारपीट की और कार में तोड़फोड़ की। ऐसा ही आरोप लगाकर उन्होंने मुजफ़्फरनगर में बाइक सवार को डंडों से पीटा। इसी शहर में एक ट्रक चालक के साथ भी ऐसा ही हुआ।
लखनऊ में तो मामूली टक्कर के बाद कांवड़ियों ने स्कूली छात्राओं को ले जा रहे वाहन पर ही पथराव कर दिया और लाठी-डंडों से उसके शीशे तोड़ दिए। लखनऊ में ही कांवड़ियों ने जाम में फंसे लोगों से गाली-गलौज की और ऑटो रिक्शे पर डंडे बरसाए। मेरठ में दिल्ली-देहरादून राजमार्ग पर मोटरसाइकिल से कांवड़ टकराने को लेकर कांवड़ियों के ही बीच मारपीट हो गई। उन्होंने बीच-बचाव करने आई पुलिस की भी नहीं सुनी और उसकी जीप में सवार एक शख़्स को खींचकर उसकी पिटाई कर दी। मिज़ार्पुर स्टेशन पर कुछ कांवड़ियों ने सीआरपीएफ के एक जवान को बेरहमी से मारा। वह अपनी ट्रेन का टिकट ले रहा था, तभी कांवड़ियों से उसकी कहासुनी हो गई, जो मारपीट में बदल गई।
दौराला के टोल प्लाज़ा पर एक युवक को कांवड़ियों ने मोबाईल चोरी के शक में पीट दिया। गाज़ियाबाद में दिल्ली-मेरठ मार्ग पर एक एंबुलेंस के कांवड़ियों की ट्रॉली से टकराने से नाराज़ कांवड़ियों ने एंबुलेंस चालक की पिटाई कर दी और सड़क पर जमकर हंगामा किया। नतीजतन, उस सड़क पर लगभग एक घंटे तक लंबा जाम लगा रहा, जिसमें मरीज़ को ले जा रही वही एंबुलेंस भी फंस गई। दिल्ली के रजोकरी इलाके में ट्रक से टक्कर लगने के बाद कांवड़ियों ने उसमें लदा सामान लूट लिया। मुरादाबाद में एक मालवाहक ऑटो रिक्शे की हल्की सी टक्कर लग जाने से नाराज़ कांवड़ियों ने उसके चालक - जिसका नाम अज़ीम था, को इतना मारा कि उसने अस्पताल में दम तोड़ दिया।
हिन्दू धर्म में अत्यंत पवित्र मानी जाने वाली कांवड़ यात्रा में हंगामा, मारपीट और तोड़फोड़ के अलावा भौंडेपन और अश्लीलता का भी प्रवेश हो गया है। यात्रा के लिये बनाये गए शासन-प्रशासन के नियमों को दरकिनार कर भगवा वस्त्रधारी युवतियां अश्लील नृत्य करती दिखाई देती हैं- कभी किसी चलते हुए ट्रक पर, तो कभी सड़क किनारे बने मंच पर, मानो वे कांवड़ यात्रियों के लिये 'चीयर गर्ल्सÓ की भूमिका निभा रही हों। कहीं-कहीं महिला कांवड़ यात्री खुद भी डीजे के कानफ़ाड़ू संगीत पर बेहूदा तरीके से नाचती दिखती हैं। मशहूर पार्श्व गायिका अनुराधा पौडवाल ने पिछले साल ऐसे ही नृत्य के वायरल वीडियो पर टिप्पणी कर उसे 'नॉनसेंसÓ बताया था और इस तरह का नाच-गाना बंद करने की बात कही थी। बिहार के बांका जिले में तो श्रावण मेले के लिये नेपाल और बंगाल से लड़कियों को बुलवाए जाने की ख़बर है।
और लड़कियां ही क्यों, लड़के भी बेहूदगी में कहीं पीछे नहीं हैं। हुक्का-चिलम पीकर धुंआ उड़ाते, पूरे शरीर पर केवल एक अधोवस्त्र के साथ शराब या अफ़ीम के नशे में नाचते, ज़मीन पर लोट लगाते किशोरों और युवकों के वीडियो बहुत वायरल हुए हैं। ऐसे ही एक वीडियो में देखा जा सकता है कि नशे में धुत्त एक कांवड़िया - जिससे ठीक से खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा है, एक पुलिस वाले को कॉलर पकड़ धमका रहा है। लेकिन कोई कार्रवाई करने के बजाय वह पुलिसकर्मी उस कांवड़िये की बदमिजाजी को बर्दाश्त किए जा रहा है। हालांकि पुलिस का यह रवैया तब भी रहता है, जब कांवड़िए मारपीट और तोड़फोड़ करते हैं और किसी की जान तक लेने पर उतारू हो जाते हैं। हरिद्वार में तो एक पुलिसकर्मी को एक कांवड़िए के गुस्से से बचने के लिए भागना पड़ा।
उपद्रव करने वाले कांवड़िये हिन्दू हैं, उनकी ज्यादतियां भुगतने वाले अधिकांश भी हिन्दू। इसलिए शायद किसी की भावनाएं आहत नहीं होतीं। कांवड़ यात्राओं में परोसी जाने वाली अश्लीलता पर भी किसी कट्टर हिन्दू को ऐतराज़ नहीं होता। कांवड़ यात्रा के रास्ते में दूकानों और होटलों के बंद होने से जो सैकड़ों लोग अस्थायी तौर पर ही सही, बेरोज़गार होते हैं, उनसे फ़र्क पड़ने का तो सवाल ही नहीं उठता। लेकिन हिन्दू समाज और हिन्दू हितैषी सरकार- दोनों को सोचना होगा कि भक्ति के नाम पर अराजकता और अश्लीलता, क्यों और कब तक बर्दाश्त की जानी चाहिए।


