एसआईआर पर गृहमंत्री का जवाब
मतदाता सूची के विशेष गहनपुनरीक्षण यानी एसआईआर को वापस लेने, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को उनके पद से हटाने और वोट चोरी के खिलाफ इस समय देश में जबरदस्त आंदोलन चल रहा है।

मतदाता सूची के विशेष गहनपुनरीक्षण यानी एसआईआर को वापस लेने, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को उनके पद से हटाने और वोट चोरी के खिलाफ इस समय देश में जबरदस्त आंदोलन चल रहा है। सोमवार शाम राहुल गांधी के नेतृत्व में जिस तरह इंडिया ब्लॉक के तमाम नेताओं, कार्यकर्ताओं, सामाजिक संगठनों और छात्र संगठनों के लोगों ने सुप्रीम कोर्ट तक मार्च किया और इसमें कम से कम दो-ढाई लाख लोग जुट गए, उससे अब भाजपा का डर सतह पर आ गया है। वैसे तो एसआईआर के खिलाफ लगातार ही हल्ला बोल हो रहा है, मगर 2 अक्टूबर से संगठित तौर पर आंदोलन शुरु हो चुका है। पहले कॉकरोच जनता पार्टी, सिविल सोसायटी और कांग्रेस अलग-अलग मोर्चा खोले हुए थे, लेकिन राहुल गांधी ने बता दिया कि इस लड़ाई में सब एकजुट हैं, क्योंकि सबके उद्देश्य एक ही हैं। इसके बाद भले कांग्रेस से अंतर दिखाने वाले छिटपुट बयान आते रहें, लेकिन व्यापक तौर पर जनता ने मान लिया है कि राहुल गांधी के नेतृत्व में ही यह लड़ाई लड़ी जा रही है। मंगलवार को इस आंदोलन से जुड़े तमाम लोगों को चाय पर बुलाकर और फिर सबके साथ प्रेस कांफ्रेंस कर राहुल गांधी ने इस बात को और स्पष्ट कर दिया कि लोकतंत्र बचाने की इस लड़ाई में सब साथ हैं। इसके बाद बुधवार सुबह जब अभिजित दिपके के साथियों आशुतोष रांका और सौरव दास को जंतर-मंतर पर तिरंगा फहराने के आरोप में तिहाड़ जेल भेजा गया तब भी राहुल गांधी ने पोस्ट लिख कर बता दिया कि लोकतंत्र बचाने की लड़ाई में सब साथ हैं और जंतर-मंतर पर तिरंगा फहराना कोई अपराध नहीं है।
भाजपा इसी दिन की कल्पना से डरती थी जब राहुल गांधी को सर्वमान्य नेता माना जाएगा। उसने कांग्रेस और राहुल गांधी को सबसे अलग-थलग करने की कई कोशिशें कीं। मगर अब उसमें कामयाबी नहीं मिल रही और चुनाव चोरी के खिलाफ आंदोलन में जनता भी जुट गई, तब अमित शाह को खुद मैदान में उतरना पड़ा। 2 अक्टूबर के बाद से भाजपा के कई नेताओं ने इस मुद्दे पर राहुल गांधी को घेरा लेकिन उनकी बातें असर नहीं डाल पाईं। तो अब खुद गृहमंत्री अमित शाह ने एसआईआर और वोट चोरी पर बयान दिया है। सवाल अब भी वही है कि जब आरोप ज्ञानेश कुमार पर लगे तो जवाब अमित शाह क्यों दे रहे हैं। बल्कि उन्हें तो कायदे से वोट चोरी के आरोपों को नकारने के लिए ज्ञानेश कुमार की जगह किसी अन्य को मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति पर ऐतराज नहीं होना चाहिए, ताकि वे यह साबित कर सकें कि भाजपा जो चुनाव पर चुनाव जीत रही है, वो चुनाव आयोग की गड़बड़ियों से नहीं बल्कि अपने दम पर जीत रही है। लेकिन इसकी जगह अमित शाह ने अपने जवाब में कई और गलतियां कर दीं।
अमित शाह ने 2029 में भी भारी बहुमत से चुनाव जीतने का दावा किया और कांग्रेस की बड़ी हार का ऐलान कर दिया। लोकतंत्र में कोई भी नेता चुनाव से तीन साल पहले यह दावा नहीं कर सकता। लेकिन अमित शाह ने किया तो जाहिर हो गया कि वे किस आधार पर ऐसा कर रहे हैं। एसआईआर पर सवाल उठाने वाले तमाम लोग यही पूछ रहे हैं कि बिना किसी ठोस आधार के मतदाताओं के नाम काटे क्यों जा रहे हैं और अचानक जोड़े क्यों जा रहे हैं। किसी भी मतदान केंद्र पर मतदान खत्म होने तक कितने वोट पड़े इसका सही-सही आंकड़ा क्यों नहीं आ पाता है। शाम तक अचानक वोट प्रतिशत बढ़ जाता है और दो-तीन दिन बाद उसमें और ज्यादा इजाफा हो जाता है। एक जगह कितने लोग वोट डालने आए, इसकी सही गिनती करना आखिर कितना कठिन हो सकता है। लेकिन इस पर सवाल उठाने के जवाब में अमित शाह ने कहा कि राहुल गांधी घुसपैठियों को बचाना चाहते हैं। तो क्या जिन 13 करोड़ लोगों को अचानक एसआईआर के जरिए वोटर लिस्ट से बाहर कर दिया गया है, वो सब घुसपैठिए हैं। अगर यही सच है तो फिर अमित शाह गृहमंत्री बन कर क्या कर रहे हैं। देश की सीमाओं को लांघकर 13 करोड़ लोग अगर घुस आए हैं तो यह मोदी सरकार की बड़ी नाकामी है और इसी पर उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए। मगर अमित शाह तो बता रहे हैं कि भाजपा का संगठन हर गली-कूचे, दूर-दराज के इलाकों में है और कांग्रेस खेत-खलिहानों, नदी-पहाड़ों सब जगह से ग़ायब है। अमित शाह बता रहे हैं कि गुजरात, बंगाल, उत्तरप्रदेश समेत कई राज्यों में कांग्रेस कई दशकों से हार रही है।
एसआईआर पर उठे सवाल को कांग्रेस की हार का हवाला देकर टरकाया नहीं जा सकता। बल्कि राहुल गांधी जिस तरह एक के बाद एक प्रेस कांफ्रेंस कर रहे हैं, अमित शाह चाहें तो राहुल गांधी को अपने ही किसी मंच पर आमंत्रित कर उनसे इस बारे में आमने-सामने सवाल-जवाब कर लें। इससे उनकी बात का वजन भी बढ़ेगा। अभी तो प्रेस ब्रीफिंग के नाम पर उन्होंने एएनआई, आईएएनएस और पीटीआई इन तीन न्यूज एजेंसियों के माइक के सामने खड़े होकर कागज पर जो कुछ लिखा था, उसे पढ़ दिया। बॉडी लैंग्वेज एक्सपर्ट बता सकते हैं कि अमित शाह के हाव-भाव में कितना डर नजर आ रहा था। लेकिन जो इस विधा का विशेषज्ञ नहीं है, वह भी देख रहा था कि अमित शाह हर हाल में ज्ञानेश कुमार को बचाने की जद्दोजहद करते दिखे।
वैसे पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओ पी रावत ने भी एसआईआर के दौरान एक बड़े गैरकानूनी काम की तरफ ध्यान दिलाया है। उन्होंने कहा है कि कानूनन अगर चुनाव से पहले संशोधित मतदाता सूची को अंतिम रूप से प्रकाशित नहीं किया जाता है, तो पहले प्रकाशित सूची का ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए। फिर भी, पश्चिम बंगाल में संशोधित सूची के आधार पर चुनाव कराए गए, जबकि लाखों योग्य मतदाता सूची से बाहर रह गए थे और उनकी अपीलें अभी भी लंबित थीं। यही हाल बिहार में भी हुआ था। इसका मतलब है कि कम से कम बिहार और प.बंगाल में भाजपा की जीत को जायज नहीं ठहराया जा सकता। देखना होगा कि माननीय सुप्रीम कोर्ट इस गैरकानूनी फैसले पर स्वत:संज्ञान लेता है या नहीं। बहरहाल, अमित शाह का एसआईआर पर जवाब देना विपक्ष के चुनाव चोरी के आरोपों को और मजबूत कर गया।


