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कागज दिखाना मौजूदा दौर की सबसे बड़ी त्रासदी!

भाजपा के शासन में कागज की अहमियत इंसान से ज्यादा हो चुकी है। कागज तो दिखाना होगा, मौजूदा दौर का सबसे त्रासद वाक्य है, जिससे लाखों-करोड़ों नागरिक जूझ रहे हैं

कागज दिखाना मौजूदा दौर की सबसे बड़ी त्रासदी!
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भाजपा के शासन में कागज की अहमियत इंसान से ज्यादा हो चुकी है। कागज तो दिखाना होगा, मौजूदा दौर का सबसे त्रासद वाक्य है, जिससे लाखों-करोड़ों नागरिक जूझ रहे हैं। खबर आई है कि मंगलवार को हुई केबिनेट बैठक में प्रधानमंत्री मोदी ने निर्देश दिए हैं कि आम लोगों की सुविधा का ख्याल रखा जाए। लेकिन यह कैसा ख्याल रखना है जिसमें कदम-कदम पर आम जनता को यही साबित करना पड़े कि वह इस देश का नागरिक है। राशन कार्ड, आधार, पैन कार्ड, दसवीं का प्रमाणपत्र, मतदाता पहचान पत्र, पासपोर्ट ये सारे कार्ड किसी व्यक्ति के पास होने के बावजूद यह तय नहीं है कि वह भारत का नागरिक है या नहीं। पासपोर्ट पर तो हाल ही में विदेश मंत्रालय का बयान आया ही था कि यह केवल यात्रा दस्तावेज है, नागरिकता का प्रमाण नहीं, जबकि दूसरे देश जाने पर आपको किस देश का नागरिक माना जाए, यह आपके पासपोर्ट से ही तय होगा। पासपोर्ट पर एक अनावश्यक विवाद मोदी सरकार ने खड़ा किया और हाल ही में उसी से जुड़ा एक अजीबोगरीब प्रकरण सामने आया है।

कोलकाता से निकलने वाले प्रमुख अंग्रेजी दैनिक द टेलीग्राफ के पूर्व संपादक आर. राजगोपाल का पासपोर्ट नवीनीकृत नहीं हुआ, क्योंकि एसआईआर में उनका नाम लाखों अन्य लोगों की तरह काटा गया है। आर. राजगोपाल ने सोशल मीडिया पर अपने साथ घटे इस त्रासद वाकये को बयां किया है कि मार्च 2026 में कोलकाता के बालीगंज विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची से उनका नाम हटा दिया गया। उनके अनुसार, एसआईआर के दौरान अधिकारियों को न तो उनका और न ही उनके दिवंगत पिता का नाम वर्ष 2002 की मतदाता सूची में मिला। इसी आधार पर उनका नाम सूची से हटा दिया गया। राजगोपाल ने लिखा कि उनके पिता एक गांधीवादी, सेवानिवृत्त प्रोफेसर और केरल में गांधी स्मारक निधि के पूर्व राज्य सचिव थे, जिनका 2016 में निधन हो चुका है। उन्होंने सवाल उठाया कि इतने सजग मतदाता रहे उनके पिता का नाम मतदाता सूची में कैसे नहीं मिला। राजगोपाल का कहना है कि पश्चिम बंगाल में लगभग 27 लाख लोगों के नाम तथाकथित 'लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी' के आधार पर मतदाता सूची से हटाए गए। उन्होंने मैट्रिकुलेशन प्रमाणपत्र समेत अन्य दस्तावेज जमा किए, लेकिन उन्हें कोई साफ़ कारण नहीं बताया गया। राजगोपाल समेत हजारों लोगों का मामला अब सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गठित एक ट्रिब्यूनल के सामने लंबित है। इसी वजह से वे हाल में हुए चुनाव में मतदान भी नहीं कर सके।

राजगोपाल ने बताया कि उन्होंने 19 मार्च 2026 को पासपोर्ट नवीनीकरण के लिए बायोमेट्रिक प्रक्रिया पूरी कर ली थी, लेकिन पुलिस सत्यापन नहीं हो सका क्योंकि उनका नाम मतदाता सूची में नहीं था। उन्होंने कई वैकल्पिक दस्तावेज जमा किए, लेकिन उन्हें पर्याप्त नहीं माना गया। 27 जून को उनके बायोमेट्रिक हुए 100 दिन पूरे हो गए। पिछले सप्ताह उन्हें पासपोर्ट कार्यालय से बताया गया कि कोलकाता पुलिस ने मतदाता सूची से नाम हटने के आधार पर प्रतिकूल रिपोर्ट भेजी है। हालांकि उन्हें क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय में तत्काल उपस्थित होने को कहा गया, लेकिन ऑनलाइन अपॉइंटमेंट 17 जुलाई 2026 की मिली।

कितनी हैरानी की बात है कि एक प्रतिष्ठित अखबार के संपादक का पासपोर्ट नवीनीकरण अब तक इसलिए नहीं हो पाया, क्योंकि मतदाता सूची में उनका नाम नहीं था और पुलिस ने इसे ही आधार माना। जबकि केंद्र और राज्य सरकारें पत्रकारों व संपादकों को अधिमान्यता भी देती हैं। इसमें भी उनके तमाम दस्तावेज जांचे-परखे जाते हैं। फिलहाल यह ज्ञात नहीं है कि राजगोपाल के पास इस समय राज्य अधिमान्यता कार्ड या पत्र सूचना कार्यालय की तरफ से जारी कार्ड है या नहीं, लेकिन जब उनके जैसे प्रतिष्ठित संपादक को कागज दिखाने के नाम पर मानसिक संताप से गुजरना पड़ा है, तो आम लोगों की बिसात ही क्या है। खुद राजगोपाल ने यह लिखा है कि वे खुद को पीड़ित की तरह नहीं दिखाना चाहते, लेकिन इतने वर्षों की पत्रकारिता और अखबार का संपादन करने के बाद उन्हें अपनी पहचान साबित करने के लिए इतना संघर्ष करना पड़ रहा है, तो समाज के सबसे कमजोर और हाशिए के लोगों की स्थिति कितनी मुश्किल होगी।

यह तथ्य किससे छिपा है कि आम लोगों के जीवन में रोजी-रोटी कमाने से लेकर शिक्षा, इलाज जैसी मूलभूत सुविधाओं को हासिल करने में सौ झंझटें हैं, इनसे निपटने में ही तीन चौथाई जीवन गुजर जाता है। इसके बाद बार-बार अपने को नागरिक साबित करने के लिए साक्ष्य जुटाने पड़ें तो थक-हार कर व्यक्ति यह कोशिश भी छोड़ देता है। इसी वजह से लाखों काबिल वोटर बिहार में वोट नहीं डाल पाए और फिर बंगाल में यही खेल हुआ। इसके बाद प्रधानमंत्री आम आदमी की सुविधा और इज़ ऑफ डूइंग जैसे जुमले कहें तो वह जले पर नमक छिड़कने जैसा लगता है।

सरकार के ऐसे फैसलों से देश में कितना बड़ा नागरिक संकट खड़ा हो चुका है, इसकी बड़ी मिसाल राजगोपाल प्रकरण में देखी जा सकती है। अगर उनका पासपोर्ट समय पर नवीनकृत होता तो वे 17 अप्रैल को सैन फ्रांसिस्को में अपनी बेटी की शादी में शामिल हो सकते थे। उनके पास अमेरिका का वैध 10 वर्षीय वीजा था, लेकिन सक्रिय पासपोर्ट न होने के कारण विदेश यात्रा संभव नहीं हो सकी। राजगोपाल ने लिखा कि अब उनकी सुबह वोटिंग अधिकार से जुड़ी अपील और पासपोर्ट आवेदन की स्थिति देखने से शुरू होती है।

उन्होंने लिखा, 'मैं यह मुद्दा अपने बारे में नहीं बनाना चाहता था। लेकिन अब मुझे यह और अधिक साफ़ हो गया है कि मुख्यधारा की पत्रकारिता का आम लोगों के जीवन से संबंध लगातार कमजोर होता जा रहा है।' गौरतलब है कि यह बात उन्होंने तब लिखी थी जब एक-दो पत्रकारों ने उनके मुद्दे को सोशल मीडिया पर उठाया, लेकिन तमाम चैनलों में यह बात गायब है। हालांकि अभी एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया ने एक बयान में उस तरीके की निंदा की है जिसमें आर. राजगोपाल के साथ नौकरशाही ने व्यवहार किया है। बयान में लिखा है कि यह नौकरशाही तय कर रही है कि कौन भारतीय नागरिक है और कौन नहीं।'

अच्छा है कि पत्रकारिता से जुड़ी इस अहम संस्था ने इस विषय पर अपना मंतव्य स्पष्ट किया। अन्यथा कुछ तथाकथित पत्रकार यह भी कह रहे थे कि टेलीग्राफ के संपादक रहते हुए राजगोपाल ने स्मृति ईरानी की तस्वीर के साथ आंटी नेशनल जैसी हेडलाइन लगाई थी, तब उन्होंने इस पर विचार क्यों नहीं किया। मीडिया को मोदी सरकार का चरणचुंबक क्यों कहा जाने लगा है, यह ऐसे बयानों से समझा जा सकता है। राजगोपाल ने एक इंटरव्यू में बताया था कि ये सरकार एंटी नेशनल शब्द को जितने हल्के तरीके से इस्तेमाल करती है, उसी से प्रेरित होकर उन्होंने आंटी नेशनल जैसी हेडलाइन लगाई। टेलीग्राफ वैसे भी अपने कड़े शीर्षकों के लिए जाना जाता है। इनसे किसी को सहमति या असहमति हो सकती है, लेकिन क्या पासपोर्ट के नवीनीकरण या मतदाता सूची से नाम कटने को इस वजह से जायज ठहराया जा सकता है। तार्किक बुद्धि का इंसान इसे खारिज ही करेगा, लेकिन इस सरकार में तर्कों की बलि दी जा चुकी है।


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