नक्सलवाद पर सरकार की सोच
अमीर क़ज़लबाश के इस शेर का मतलब भाजपा के लोग ही अब बेहतर समझेंगे और समझाएंगे

उसी का शहर वही मुद्दई वही मुंसिफ़।
हमें यक़ीं था हमारा कु़ सूर निकलेगा।।
अमीर क़ज़लबाश के इस शेर का मतलब भाजपा के लोग ही अब बेहतर समझेंगे और समझाएंगे। क्योंकि शासन भी उन्हीं का है, दावे भी उन्हीं के हैं और सच-झूठ ठहराने का हक भी उन्होंने अपने पास ही रखा है। देश की तमाम समस्याओं के लिए कांग्रेस को दोषी ठहराने का चलन भी भाजपा का ही है। फिर चाहे वह आतंकवाद हो, पड़ोसी देशों से संबंध हों, महंगाई या बेरोजगारी हो या नक्सलवाद हो। हर बात के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराना ही इस सरकार की खास पहचान है।
बहरहाल, ऊपर लिखी इन पंक्तियों की याद केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह के उस दावे के बाद आई, जिसमें भारत से नक्सलवाद को खत्म बताया गया है। पाठक जानते हैं कि अमित शाह ने 31 मार्च 2026 तक भारत को नक्सलमुक्त कराने की बात कही थी। और सोमवार 30 मार्च को लोकसभा में गृहमंत्री अमित शाह ने देश को वामपंथी उग्रवाद से मुक्त करने के प्रयासों पर चल रही चर्चा के दौरान कहा कि सबसे पहले मैं रेड कॉरिडोर के नाम से पहचाने जाने वाले पूरे क्षेत्र, जिसमें 12 राज्य और 70 प्रतिशत का भूभाग शामिल थे, उसमें रह रही जनसंख्या की तरफ से सदन को धन्यवाद देना चाहता हूं। गृह मंत्री ने कहा कि आज बस्तर से नक्सलवाद लगभग-लगभग समाप्त हो चुका है। बस्तर के अंदर हर गांव में स्कूल बनाने की मुहिम चली। बस्तर के अंदर हर गांव में राशन की दुकान खोलने की मुहिम चली। मैं इतना ही पूछना चाहता हूं कि जो लोग कह रहे हैं कि अब तक आदिवासियों का विकास क्यों नहीं हुआ? तो, वो खुद बताएं कि 70 सालों से उन्होंने क्या किया?
गृहमंत्री की कही इस एक पंक्ति से जाहिर हो गया कि भाजपा के लिए नक्सलमुक्त भारत बनाने की उपलब्धि का ज्यादा महत्व इसलिए है क्योंकि इसके जरिए कांग्रेस और वामदलों को घेरा जा सकता है। वर्ना नक्सलवाद देश के लिए एक ऐसी समस्या बनी हुई थी या अब भी है, जिसकी चपेट में न केवल कांग्रेस, बल्कि भाजपा, वामदल और कई क्षेत्रीय दल भी आए हुए हैं। प.बंगाल, ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, झारखंड, बिहार इन तमाम राज्यों में कांग्रेस, भाजपा अथवा क्षेत्रीय दलों की सरकारें रहीं और बरसों-बरस इन सभी सरकारों ने नक्सलियों से मोर्चा लिया। इनके नेता नक्सलियों के निशाने पर बने रहे।
बेशक नक्सलवाद पर राजनीति करने के कारण ही इसका समाधान ढूंढने में कठिनाइयां हुईं। नक्सलियों को कभी मुख्यधारा में लाने की कोशिशें हुईं, कभी उनसे मुठभेड़ें हुईं, कभी नक्सलियों के शीर्ष नेताओं पर ईनाम रखे गए, कभी सलवा जुडूम जैसे उपायों से ग्रामीणों को अपने साथ लेकर सरकार ने मुकाबला करना चाहा। इन तमाम उपायों में कभी सफलता मिली, कभी असफलता, तो कभी गंभीर विवाद खड़े हुए। इसकी बड़ी वजह यही है कि नक्सलवाद को काले या सफेद रंग में बांट कर विश्लेषित नहीं किया जा सकता। यह एक गुत्थियों में उलझा हुआ मसला है, जिसके हरेक सिरे को बड़ी सावधानी से पकड़ने और अलग करने की जरूरत है। लेकिन सत्ता में बैठे लोगों ने अक्सर वाहवाही बटोरने के लिए कठोर कार्रवाइयां करने का दावा किया और कई बार यह बताया कि नक्सली हताश हो चुके हैं, कमजोर पड़ चुके हैं। लेकिन फिर कोई बड़ा हमला होता तो सरकारें इसे कायरता का प्रतीक बताकर फिर इसे कुचलने का प्रण ले लेतीं। यह सिलसिला बरसों बरस चलता रहा। इसी में छत्तीसगढ़ बनने के बाद झीरम घाटी जैसा भयावह हमला भी हुआ, जिसमें राज्य कांग्रेस की पहली पंक्ति ही लगभग खत्म हो गई। इस दौरान सरकार भाजपा की थी, जबकि केंद्र में यूपीए सरकार थी। इस बड़े हमले से नक्सलवाद की गंभीरता को समझा जा सकता था, लेकिन तब भी एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप चलते रहे। इस बीच जिन कारणों से नक्सलवाद पनपा और फैला, उन पर सार्थक चर्चाएं न के बराबर रहीं। कोई आदिवासियों, गरीबों, मजदूरों के हक की बात करें तो उसे नक्सल समर्थक ठहरा दिया जाए, या वामपंथी विचारों का समर्थन करे तो उसे देशविरोधी की तरह देखा जाए, इसी मानसिकता को बढ़ावा दिया गया। अफसोस कि जब नक्सलवाद खत्म करने के दावे पर केंद्र सरकार अपनी पीठ थपथपा रही है, वह तब भी इस मानसिकता से मुक्त नज़र नहीं आ रही है।
अमित शाह ने संसद में वामदलों के बारे में जो कहा वो गौरतलब है, श्री शाह ने कहा कि 1969 में भारत में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी), या सीपीआई (मार्क्सवादी), की स्थापना हुई, इसका प्राथमिक उद्देश्य न तो राष्ट्र का विकास था और न ही नागरिकों के अधिकारों की रक्षा। इसके बजाय, पार्टी का संवैधानिक लक्ष्य चीन और रूस के उदाहरणों का अनुसरण करते हुए सशस्त्र विद्रोह के माध्यम से संसदीय प्रणाली को उखाड़ फेंकना था। वहीं उन्होंने यह भी कहा कि अपनी विचारधारा को फैलाने के लिए वामपंथियों ने भोले-भाले आदिवासियों को बरगलाया। नक्सलवाद गरीबी के कारण नहीं फैला, बल्कि नक्सलवाद के कारण इन पूरे क्षेत्र में सालों तक गरीबी रही। नक्सलवाद की जड़ें गरीबी और विकास से जुड़ी नहीं है, वो वैचारिक है। इसके अलावा अर्बन नक्सल शब्द का इस्तेमाल करते हुए अमित शाह ने कहा, 'मैं उन अर्बन नक्सलों से सवाल करना चाहता हूं- इनके सभी आर्टिकल हथियार उठाकर घूमने वालों से बातचीत करने की बात करते हैं, लेकिन उनके द्वारा मारे गए निर्दोष लोगों के बारे में क्यों नहीं लिखते? एक भी आर्टिकल उस मां के लिए नहीं है, जिसके बच्चे को जबरन उठाकर नक्सली बना दिया गया, या उस किसान के लिए नहीं है जिसके पैर उड़ा दिए गए। 5 हज़ार से अधिक शहीद सुरक्षा बलों के जवानों की विधवाओं के लिए भी कु छ नहीं लिखा गया। इनकी मानवता का यह दोहरा चरित्र मैं स्वीकार नहीं करता- ये मानवतावादी नहीं, बल्कि नक्सल समर्थक हैं।'
आश्चर्य की बात है कि देश के गृहमंत्री ने संविधान सम्मत दो दलों माकपा और भाकपा पर सीधे-सीधे आऱोप लगा दिया कि वे सशस्त्र विद्रोह के जरिए संसदीय प्रणाली को खत्म करना चाहते थे। जबकि वामदलों से आए सोमनाथ चटर्जी लोकसभा अध्यक्ष रहे हैं, और प.बंगाल, त्रिपुरा में वामपंथी सरकारें थीं, केरल में अब भी है। क्या यह सब सशस्त्र विद्रोह से संभव हुआ। नक्सलवाद के कारणों को भी कितनी आसानी से गरीबी, अन्याय से हटाते हुए उन्होंने विचारधारा से जोड़ दिया। इसके अलावा अर्बन नक्सल शब्द तो इस सरकार के चंद प्रिय शब्दों में से एक है, जो बार-बार विरोधियों के लिए इस्तेमाल होता है।
बहरहाल, अगर अमित शाह ने ये सारी बातें किसी चुनावी मंच पर दी होतीं, तो समझ आता। लेकिन संसद में बतौर गृहमंत्री उनका ये बयान आश्वस्त कम करता है, चिंता अधिक उपजाता है।
वैसे नक्सलवाद अगर वाकई पूरी तरह खत्म हो गया है, तो इसके लिए सरकार को बधाई, मगर सवाल फिर भी बाकी है कि क्या नक्सल आंदोलन खड़े होने के कारण कभी खत्म हो पाएंगे।


