Top
Begin typing your search above and press return to search.

महिला आरक्षण पर सरकार का खेल

देश में अब एक बार फिर सच को नकारने की कोशिश और झूठ को बढ़ावा देने की राजनीति शुरु हो गई है। शनिवार का प्रधानमंत्री का राष्ट्र के नाम संबोधन ऐसी ही एक कोशिश थी।

महिला आरक्षण पर सरकार का खेल
X

सत्यमेव जयते, यह भारत का ध्येय वाक्य है। भारतीयों का यही यकीन है कि सच की ही जीत होती है। लेकिन मौजूदा भाजपा सरकार बार-बार हमारे इस यकीन की परीक्षा ले रही है। देश में अब एक बार फिर सच को नकारने की कोशिश और झूठ को बढ़ावा देने की राजनीति शुरु हो गई है। शनिवार का प्रधानमंत्री का राष्ट्र के नाम संबोधन ऐसी ही एक कोशिश थी। संसद के विशेष सत्र में 131 संविधान संशोधन विधेयक को सरकार पारित नहीं करवा सकी। इंडिया गठबंधन की एकजुटता ने मोदी सरकार को करारी हार का स्वाद चखाया तो अब भाजपा कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दलों पर हमलावर है कि वह नारी का अपमान करती है। हालांकि संसद में चर्चा के दौरान विपक्ष ने लगातार यही कहा कि उसका विरोध महिला आरक्षण से नहीं है।

जब 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम मोदी सरकार लाई थी, जिसके जरिए महिलाओं को संसद और विधानसभा में 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान था, तो सारे दलों ने इस पर सहमति जताई थी। तब प्रधानमंत्री मोदी ने इस सफलता के लिए अपनी पीठ थपथपाई थी, तो अब उनके द्वारा लाया गया एक दूसरा विधेयक पारित नहीं हो सका, तो इस की जिम्मेदारी भी उन्हें खुद लेनी चाहिए, मगर वे विपक्ष पर ठीकरा फोड़ रहे हैं।

दरअसल विपक्ष का विरोध महिला आरक्षण की आड़ में परिसीमन विधेयक पारित कराने की कोशिशों पर था।

यह बात उसने पहले ही साफ कर दी थी, फिर भी सरकार ने विधानसभा चुनावों के बीच में संसद का विशेष सत्र लगाया, ताकि संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026, परिसीमन विधेयक, 2026 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 पारित करवा सकें, लेकिन संविधान संशोधन विधेयक में ही सरकार के हाथ नाकामी लगी, तो अभी के लिए बाकी दोनों विधेयकों से किनारा कर लिया गया। सरकार ने 2023 में पारित विधेयक पर तो कानून नहीं बनाया, लेकिन अब चाहती है कि बिना जनगणना के परिसीमन हों, जिसमें संसद और विधानसभा की सीटें बढ़ जाएं, उसके बाद उसमें महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण किया जाए। लेकिन विपक्ष का तर्क था कि महिलाओं को आरक्षण आप अभी दे दीजिए, उसके लिए परिसीमन की जरूरत नहीं है। असल में मोदी सरकार की निगाहें 2029 के चुनावों पर हैं, जिसमें परिसीमन के बाद उत्तरभारत की सीटें दक्षिण भारत की तुलना में बढ़ जाएंगी, क्योंकि यहां आबादी ज्यादा है और दक्षिण भारत में जनसंख्या पर काफी हद तक नियंत्रण है। भाजपा को उत्तरभारत से ही फायदा है। लेकिन इस बार मोदी सरकार की चालाकी नाकाम हो गई। राहुल गांधी ने इस विधेयक पर चर्चा के दौरान जिस तरह जादूगर का खेल खराब होने की कहानी सुनाई और उस पर सत्तापक्ष के लोग हड़बड़ाए, घबराए दिखे, उसी से समझ आ गया कि उन्हें भी हार का डर था। हालांकि हारने के बाद भी भाजपा ने जब विपक्ष को ही महिला-विरोधी साबित करने की कोशिश की और मीडिया इसमें रूदाली की भूमिका में आ गया, तो प्रियंका गांधी ने शनिवार सुबह एक प्रेस कांफ्रेंस कर सारी स्थिति साफ कर दी कि हम महिला आरक्षण के विरोध में नहीं हैं, उसके नाम पर अभी परिसीमन कराने की कोशिश के विरोध में हैं। उन्होंने यह भी कहा कि महिलाओं का मसीहा बनना आसान नहीं होता। उसके लिए काम करना पड़ता है। इससे पहले प्रियंका गांधी ने संसद में यह भी कहा था कि बहकाने वाले पुरुषों को महिलाएं झट से पहचान लेती हैं। लेकिन नरेन्द्र मोदी की समझ में शायद इनमें से एक भी बात नहीं आई और उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस का जवाब देने के लिए अपने पद का दुरुपयोग किया। राष्ट्र के नाम संबोधन किया, जिसमें मणिपुर में भड़कती हिंसा, ईरान के कारण ऊर्जा संकट, भारतीय झंडे वाले जहाज पर ईरानी नेवी का हमला, अर्थव्यवस्था का डांवाडोल होना, ऐसे किसी जरूरी मुद्दे पर बात नहीं की, आचार संहिता की धज्जियां उड़ाते हुए महिला आरक्षण लागू न करने के लिए विपक्ष को कोसा।

प्रधानमंत्री मोदी ने देश को संबोधित करते हुए देश की 'माताओं और बेटियों' से माफी मांगी और विपक्ष पर 'छोटी राजनीति' के कारण महिलाओं के सपनों को कुचलने का आरोप लगाया। अपने करीब आधे घंटे के संबोधन में कम से कम 34 बार तो प्रधानमंत्री ने कांग्रेस का नाम लिया, यानी औसतन हरेक मिनट में कांग्रेस कहा, उसके अलावा सपा, डीएमके, टीएमसी सबकी बुराई की। अब उन्हें इतना ही दुख है कि महिलाओं को आरक्षण नहीं मिल पा रहा है, तो विपक्ष जो कह रहा है कि 2023 में पारित विधेयक को ही लागू कर दीजिए, तो इस बात को श्री मोदी क्यों नहीं मान रहे हैं। और विपक्ष के सामने खुद को इतना ही मजबूर समझ रहे हैं, तो इंदिरा गांधी की तरह लोकसभा भंग कर फिर से बहुमत लाने का साहस दिखाइए। ध्यान रहे कि सितंबर 1970 में प्रिवीपर्स खत्म करने वाला विधेयक राज्यसभा में मात्र एक वोट से गिर गया था। इस हार के बाद, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लोकसभा भंग कर दी थी। स्वतंत्र भारत में यह पहली बार था जब लोकसभा भंग की गई थी। तब इंदिरा गांधी ने इसी तरह देश को संबोधित किया और अपने प्रसारण में कहा, 'हम केवल सत्ता में बने रहने को लेकर चिंतित नहीं हैं, बल्कि उस सत्ता का उपयोग अपनी जनता के विशाल बहुमत के लिए बेहतर जीवन सुनिश्चित करने के लिए करना चाहते हैं।Ó इसके बाद 1971 में मध्यावधि चुनाव हुए। जिसमें 'गरीबी हटाओÓ के नारे और राजशाही विशेषाधिकार खत्म करने के मुद्दे ने इंदिरा गांधी को भारी बहुमत से जीत दिलाई। इसके बाद उन्होंने 26वें संविधान संशोधन के माध्यम से 1971 में प्रिवीपर्स को आधिकारिक तौर पर समाप्त कर दिया। नरेन्द्र मोदी चाहते तो ऐसा ही कोई ऐलान करते, मगर उन्हें केवल रोना और कोसना ही आता है।

बहरहाल अब इंडिया गठबंधन भी सरकार को चि_ी लिखने वाला है कि आप 2023 वाला विधेयक फौरन कानूनन लागू कीजिए और साथ ही इस मुद्दे पर पूरे देश में प्रेस कांफ्रेंस भी करने वाला है। देश में फिर 2022-23 जैसा माहौल बनता दिख रहा है, जिसमें विपक्षी एकता के कारण 2024 में भाजपा बहुमत से पीछे रह गई थी। क्या उसे 2029 से पहले ही सत्ता से विदा लेनी पड़ेगी।


Next Story

Related Stories

All Rights Reserved. Copyright @2019
Share it