व्यापार समझौते में सरकार की उलझन
किसी भी चीज को अपने लिए फायदेमंद बताने का हुनर कोई मोदी सरकार से सीखे

किसी भी चीज को अपने लिए फायदेमंद बताने का हुनर कोई मोदी सरकार से सीखे। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पहले 25 प्रतिशत टैरिफ और रूस से तेल खरीदने के जुर्माने के तौर पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाया तो इसे हुज़ूर का अहसान बताते हुए देश के लिए फायदेमंद बताया गया। इसके बाद फरवरी के शुरू में व्यापार समझौता हुआ और 18 प्रतिशत टैरिफ तक बात पक्की हुई तो इसे इतना बड़ा मास्टर स्ट्रोक बताया गया कि मोदीजी को सांगोपांग मालाओं से लाद दिया गया। अब अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने टैरिफ लगाने के फैसले को रद्द किया है तो इसे फिर से भारत के हित में बताया जा रहा है। समझ ही नहीं आ रहा है कि सरकार की नज़र में फायदे की परिभाषा क्या है।
गौरतलब है कि बीते दिनों अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप द्वारा इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट के तहत लगाए गए बड़े पैमाने के टैरिफ को अवैध करार दिया। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को 6-3 के बहुमत से फैसला सुनाया कि ट्रंप ने आपातकालीन शक्तियों का दुरुपयोग कर टैरिफ नहीं लगा सकते, क्योंकि इसके लिए कांग्रेस की मंजूरी जरूरी है। हालांकि ट्रंप की हनक अब भी कम नहीं हुई, फैसले के तुरंत बाद ट्रंप प्रशासन ने 1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 122 के तहत अस्थायी टैरिफ लगाए, पहले 10प्रतिशत और फिर इसे बढ़ाकर 15प्रतिशत कर दिया। भारत के लिए यह दर फिलहाल 10प्रतिशत तय की गई है, जो पहले घोषित 18प्रतिशत से कम है। ट्रंप ने शुक्रवार को ही बयान दिया कि 'भारत के साथ समझौते में कोई बदलाव नहीं है। भारत टैरिफ चुकाएगा और अमेरिका नहीं।' उन्होंने इसे 'उलटा' करार दिया, जिसमें पहले भारत अमेरिका को 'लूट' रहा था, लेकिन अब स्थिति बदल गई है।
इस बदली स्थिति के बाद अब भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित अंतरिम व्यापार समझौते की बातचीत भी टल गई है। वाशिंगटन डीसी में सोमवार 23 फरवरी से शुरू होने वाली तीन दिवसीय बैठक को स्थगित कर दिया गया है, जिसमें समझौते के कानूनी पाठ को अंतिम रूप देने की योजना थी। दरअसल दोनों देशों ने इस महीने की शुरुआत में एक फ्रेमवर्क पर सहमति जताई थी, जिसमें अमेरिका द्वारा भारतीय सामानों पर टैरिफ को 18प्रतिशत तक कम करने और भारत द्वारा अमेरिकी उत्पादों की खरीद बढ़ाने का प्रावधान था। हालांकि, समझौता अभी औपचारिक रूप से हस्ताक्षरित नहीं हुआ था। भारतीय मुख्य वार्ताकार और उनकी टीम की अमेरिका यात्रा, जो रविवार को निर्धारित थी, अब स्थगित कर दी गई है। दोनों पक्षों ने संयुक्त रूप से कहा है कि 'नई घटनाओं और उनके प्रभावों का मूल्यांकन करने के बाद' नई तारीख तय की जाएगी।
वाणिज्य मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, टैरिफ नीति में आई इस अनिश्चितता के कारण बातचीत स्थगित की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह देरी भारत के लिए फायदेमंद हो सकती है, क्योंकि अमेरिकी उत्पादों को भारतीय बाजार में तत्काल पहुंच देने की जरूरत टल गई है। समझौता अभी हस्ताक्षरित नहीं होने से भारत की कोई बाध्यता नहीं है।
अब सोचने वाली बात ये है कि आखिर इन विशेषज्ञों की बात मोदी सरकार तक पहुंच रही है कि नहीं, क्योंकि जब कांग्रेस सवाल उठा रही थी कि अमेरिकी उत्पादों को खरीदने की मजबूरी से किसानों का बड़ा अहित होगा, तब तो उसका जवाब देने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने पीयूष गोयल को आगे कर दिया, और उन्होंने भी पुरजोर तरीके से व्यापार समझौते की वकालत की। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भारत सरकार किस दिशा में कदम बढ़ाएगी, कैसे अपने हित सुरक्षित रखेगी, इसका जवाब नदारद है। पीयूष गोयल भी दृश्य में नहीं हैं। लगता है सरकार फिर किसी मास्टर स्ट्रोक वाली पटकथा का इंतजार कर रही है।
बहरहाल, इस बीच संयुक्त किसान मोर्चा ने रविवार 22 फरवरी को राष्ट्रपति को भेजे गए पत्र में कहा कि मोदी सरकार अमेरिका के दबाव में झुक गई है, जिससे देश की आत्मनिर्भरता और संप्रभुता खतरे में पड़ गई है। संगठन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निर्देश देने की अपील की है कि वे किसानों के लिए हानिकारक शर्तों पर यह समझौता हस्ताक्षर न करें। एसकेएम ने आरोप लगाया कि अंतरिम व्यापार समझौते की शर्तें भारतीय अर्थव्यवस्था और किसानों के लिए घातक हैं। उन्होंने कहा, 'वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल, जो मुख्य वार्ताकार हैं, के सभी बयानों से यही साबित होता है कि सरकार अमेरिका के आदेशों के सामने खड़ी होने में असमर्थ या अनिच्छुक है। वो लगातार झूठ बोल रहे हैं।'
मोदी सरकार की नाकाबिलियत कई तरीके से जाहिर हो चुकी है, अफसोस कि उसे नजरंदाज करने की भूल बार-बार हो रही है।


