दिमागी नक्सलियों से डरी सरकार
नरेन्द्र मोदी कितने अलोकतांत्रिक किस्म के नेता हैं, इसका एक और उदाहरण 15 अगस्त को 80वें स्वतंत्रता दिवस पर्व पर लालकिले से दिए उनके भाषण में नजर आया

नरेन्द्र मोदी कितने अलोकतांत्रिक किस्म के नेता हैं, इसका एक और उदाहरण 15 अगस्त को 80वें स्वतंत्रता दिवस पर्व पर लालकिले से दिए उनके भाषण में नजर आया। नरेन्द्र मोदी ने अपने राजनैतिक और वैचारिक विरोधियों के लिए दिमागी नक्सल शब्द का इस्तेमाल किया। खुद को दुनिया के शक्तिशाली नेताओं में से एक मानने वाले नरेन्द्र मोदी संसद में विपक्ष का सामना करने तो आ नहीं सकते, न ही जंतर-मंतर तक विरोधियों की बात सुनने जा सकते हैं। मगर जो युवा अपना सब कुछ दांव पर लगाकर हक की मांग करे तो उसे दिमागी नक्सल बता दो, यही काम मोदी ने किया है। नरेन्द्र मोदी ने यह भी कहा कि सिविल डिफेंस में वॉलियेंटरी फोर्स बनानी होगी। दूसरे शब्दों में कहें तो मोदी समाज में युवाओं के एक तबके को दूसरे तबके से भिड़ाने की बात कह रहे हैं, क्योंकि ये वॉलेंटियर यानी स्वयंसेवी लोग संघ से ही आएंगे, ये तय है। जंतर-मंतर पर पैलेट गन और कील लगी लाठी चलाना कम नहीं था, जो अब विरोधियों को नए तरीके से कुचलने का उपाय मोदी ने सुझाया है।
मोदी सरकार ने देश के 80वें स्वतंत्रता दिवस समारोह की आधिकारिक थीम 'युवा शक्ति फॉर विकसित भारत ञ्च -2047' रखी थी। पिछले कुछ महीनों में युवाओं की नाराजगी मोदी सरकार के लिए जितनी बढ़ चुकी है, उसे देखते हुए यह स्वाभाविक था कि सरकार युवाओं को मनाने के लिए कुछ खास पहल करती। लेकिन नरेन्द्र मोदी ने अपने भाषण में दिमागी नक्सल शब्द का इस्तेमाल करके सारा गुड़गोबर कर दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से दिए अपने भाषण में कहा कि हथियार उठाने वाले नक्सलियों से निपट लिया गया है, लेकिन अब देश को 'दिमागी नक्सलियों' से सतर्क रहने और उन्हें अलग-थलग करने की जरूरत है। आपको बता दूं कि 'दिमागी नक्सल' भारत के कानून में परिभाषित कोई आधिकारिक श्रेणी नहीं है। किसी व्यक्ति को केवल इस राजनीतिक लेबल के आधार पर अपराधी नहीं माना जा सकता। किसी भी आपराधिक आरोप के लिए कानून और सबूत की प्रक्रिया लागू होती है। मगर मोदी ने जिस तरह यह कहा कि अब देश को 'दिमागी नक्सलियों' से सतर्क रहने और उन्हें अलग-थलग करने की जरूरत है। अब इस चुनौती के एक दूसरे स्वरूप से निपटना जरूरी है, तो यह साफ समझ आता है कि वो अपने विरोधियों को कुचलने का आह्वान कर रहे हैं और समाज के एक तबके को उकसा रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में किसी व्यक्ति, संगठन, पत्रकार, अकादमिक, राजनीतिक दल या सामाजिक समूह का नाम लेकर यह नहीं बताया कि 'दिमागी नक्सली' कौन हैं। लेकिन इससे पहले मोदी सरकार और भाजपा विपक्षी नेताओं, सरकार विरोधी पत्रकारों, रंगकर्मियों, लेखकों, कवियों-शायरों, फिल्म निर्माता-निर्देशकों आदि को अर्बन नक्सल कहती आई है। तो समझना कठिन नहीं है कि अर्बन नक्सल से दिमागी नक्सल का यह शिफ्ट जंतर-मंतर के प्रदर्शनकारियों और राहुल गांधी के छात्रों की गूंज कार्यक्रम में आने वाले युवाओं के लिए किया जा रहा है।
वैसे अर्बन नक्सल जैसा शब्द भी सरकारी शब्दकोष में नहीं है, खुद मोदी सरकार के नुमांइदे ने संसद में यह बताया है। 11 मार्च 2020 को, राज्यसभा में टीएमसी सांसद शांता छेत्री द्वारा पूछे गए एक प्रश्न (अतारांकित प्रश्न संख्या 1978) का उत्तर देते हुए, गृह राज्य मंत्री जी. किशन रेड्डी ने स्पष्ट बयान दिया था कि भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा 'शहरी नक्सल' शब्द का प्रयोग नहीं किया जाता है। उन्होंने आगे स्पष्ट किया कि यद्यपि सरकार की राष्ट्रीय नीति और कार्य योजना शहरी गतिविधियों सहित 'अपने सभी रूपों' में वामपंथी उग्रवाद (एलडब्ल्यूई) को संबोधित करती है, लेकिन भारतीय कानून या नीति के तहत 'शहरी नक्सलियों' के लिए कोई आधिकारिक वर्गीकरण या परिभाषा नहीं है।
सरकार की डिक्शनरी में अर्बन नक्सल शब्द नहीं था फिर भी समाज में मोदी और बीजेपी की नीतियों का विरोध कर रहे बड़े वर्ग को बार-बार अर्बन नक्सल कहकर अपमानित और प्रताड़ित किया गया। अब यही काम युवाओं के लिए करने की साजिश रची गई है, अर्बन नक्सल के बाद दिमागी नक्सल शब्द को लाना असल में लोकतंत्र पर बड़ा प्रहार करने जैसा है। लेकिन मोदी सरकार के पिछले बारह सालों के रवैये को देखते हुए इसके अलावा कोई और उम्मीद उनसे की भी नहीं जा सकती। इससे पहले किसानों को खालिस्तानी और शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों को पाकिस्तानी कहा जा चुका है। अब मोदी युवाओं को कुछ और नहीं कह पाए तो दिमागी नक्सल ही कह दिया। लेकिन मोदी भूल गए कि प्रधान न्यायाधीश ने कॉकरोच शब्द कहा तो कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन खड़ा हो गया। अब कहीं ऐसा न हो कि दिमागी नक्सल शब्द को मीम मटेरियल बनाकर Gen Z उनकी योजना को फिर से चौपट कर दे।
बोलचाल की भाषा में, अनौपचारिक तौर पर मतभेद रखने वालों या परस्पर विरोधी विचार वालों के लिए कहा जाता है कि तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है, तुम मानसिक तौर पर दिवालिया हो गए हो, लेकिन प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठकर कोई अपने विरोधियों को दिमागी नक्सल कहे, तो समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र को तानाशाही की गंभीर बीमारी जकड़ चुकी है और इसका जल्द से जल्द उपाय निकालना होगा।


