मुनाफे में सरकार, घाटे में जनता
केंद्र सरकार के नियंत्रण वाली तेल कंपनियों ने सोमवार, 25 मई को पेट्रोल और डीजल की कीमतों में एक बार फिर बढ़ोतरी कर दी।

केंद्र सरकार के नियंत्रण वाली तेल कंपनियों ने सोमवार, 25 मई को पेट्रोल और डीजल की कीमतों में एक बार फिर बढ़ोतरी कर दी। यह इस महीने की चौथी बढ़ोतरी है। पेट्रोल की कीमत औसतन 2.61 रुपये प्रति लीटर और डीजल की 2.71 रुपये प्रति लीटर बढ़ी है। ध्यान रहे कि यह बढ़ोतरी ऐसे वक्त हुई है, जब सोमवार को ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का दाम 8 प्रतिशत गिरकर, 100 डॉलर प्रति बैरल से कम होकर 96.83 डॉलर प्रति बैरल पर आ गिरा है। सामान्य गणित तो यही है कि जिस चीज के दाम गिरें, वो आम जनता को भी उसी अनुपात में सस्ती होकर मिलनी चाहिए। लेकिन तेल का गणित बिल्कुल अलहदा है, या ऐसा भी कह सकते हैं कि मोदी सरकार का गणित यही है कि जनता से उगाही करके अपना घर भरें। यह भी नहीं है कि जनता से जो मुनाफा वसूली सरकार करती है, उसके बदले कहीं और जनता को राहत दी जा रही है। मोदी सरकार जितना भी मुनाफा कमा रही है, उससे उद्योगपतियों की जेबें भरी जा रही हैं। आम जनता के हिस्से केवल दर्द और तकलीफ ही दिख रही हैं। अब हाल ऐसा हो गया है कि पेट्रोल पंपों पर डीजल और पेट्रोल की किल्लत दिख रही है। अगर इनकी उपलब्धता है भी तो लोगों के पास उतने पैसे नहीं रह गए कि इत्मीनान से तेल भरवा सकें। लोग नाराजगी प्रकट भी करने लगे हैं, लेकिन अब शायद बहुत देर हो चुकी है। भाजपा ने इस तरह सत्ता से लेकर संवैधानिक संस्थाओं पर अपना शिकंजा कस लिया है कि उसे ढीला करते, कब्जा छुड़ाते शायद बरसों लगे। शायद यही कारण है कि भाजपा को अब लोगों की नाराजगी की भी परवाह नहीं है। कांग्रेस लगातार सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रही है, लोग उसमें शामिल भी हो रहे हैं। लेकिन भाजपा निश्चिंत है कि उसका कुछ बिगड़ नहीं सकता। यही वजह है कि अभी सरकार की चिंता में सबसे ऊपर महंगाई होनी चाहिए थी, लेकिन भाजपा की कई राज्य सरकारें बकरीद पर कुर्बानी और सड़क पर नमाज को लेकर फरमान जारी करने में व्यस्त हैं।
15 मई से शुरू हुई बढ़ोतरी में अब तक कुल करीब 7.5 रुपये प्रति लीटर की वृद्धि हो चुकी है। सरकार के पास इसके पीछे रटा-रटाया बहाना है कि ईरान पर छेड़े गए युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग बंद होने से तेल की कीमतें बढ़ रही हैं। लेकिन विपक्ष इस बढ़ोतरी के लिए सरकार की नीतियों को भी जिम्मेदार बता रहा है। अगर अमेरिका के दबाव में आकर नरेन्द्र मोदी ने रूस से तेल खरीद बंद नहीं की होती तो हमें पहले की तरह रूस से सस्ती कीमतों पर कच्चा तेल मिलता रहता। लेकिन मोदी को अपना अच्छा मित्र बताकर डोनाल्ड ट्रंप ने भारत को लूटने का रास्ता खोला है और सरकार इसे देख कर भी अनदेखा कर रही है। अब हम रूस की जगह अमेरिका और वेनेजुएला से तेल खरीद पर मजबूर कर दिए गए हैं। वित्तीय वर्ष 2025-26 में अमेरिका से तेल का आयात बढ़ा है। दूरी ज्यादा होने के कारण इसमें ढुलाई और इंश्योरेंस का खर्च 2-4 डॉलर/बैरल अतिरिक्त लगता है। मतलब रूस की तुलना में हम अमेरिका से महंगा तेल खरीद रहे हैं। जिससे कई बिलियन डॉलर का सालाना नुक़सान होने की आशंका है। इसके अलावा भारत की रिफाइनरियां अमेरिकी तेल के शोधन के लिए नहीं बनी हैं। ऐसे में फाइनरियों का लाभ भी दो प्रतिशत घटेगा। सबसे बड़ी आशंका तो डोनाल्ड ट्रंप के व्यवहार को लेकर है, जो कभी भी कैसा भी फैसला लेते हैं। मान लें कि मोदी को मित्र बताते-बताते अगर ट्रंप ने अमेरिका से आने वाले तेल को और महंगा कर दिया तो मोदी इसका प्रतिवाद भी नहीं करेंगे, पिछले अनुभव यही बताते हैं।
मोदी पर देशहित में सही फैसले लेने का दबाव बनाया जा सकता है, बशर्ते मीडिया चाटुकारिता छोड़े और सही-सही तस्वीर सामने रखे। लेकिन अभी कई नामी-गिरामी एंकर पेट्रोल-डीजल की महंगाई को देशहित में वाजिब बता रहे हैं। इसी तरह केन्द्रीय मंत्रिमंडल के सदस्य और भाजपा के नेता, नीति आयोग में बैठे लोग, अधिकारी ये सब भी सच्चाई से जानबूझ कर मुंह मोड़ते दिख रहे हैं, क्योंकि प्रधानमंत्री, गृहमंत्री को नाराज करने का जोखिम नहीं उठाना है। वर्ना यही सारे लोग यूपीए सरकार के वक्त महंगाई पर आलोचना करने में जरा संकोच नहीं करते थे। अब तो आलम ऐसा हो चुका है कि महंगाई डायन खाए जात है, जैसे गीत पर भी प्रतिबंध लगाया जा रहा है।
हालांकि कांग्रेस अब भी सरकार को आईना दिखाने का काम कर रही है। सोमवार को बढ़ी कीमतों पर राहुल ने एक्स पर लिखा है- महंगाई मानव मोदी का फिर से हमला। पेट्रोल-डीज़ल के दाम किश्तों में बढ़ाते हैं- ताकि चुपके-चुपके आपकी जेब कटती रहे। वहीं कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि जब अंतरराष्ट्रीय कीमतें कम थीं तब लाभ जनता को नहीं दिया गया, लेकिन अब बढ़ोतरी हो रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार रोजाना पेट्रोल-डीजल पर हजारों करोड़ रुपये टैक्स वसूल रही है। पाठकों को बता दें कि कीमत बढ़ाने के पीछे सरकारी तेल कंपनियों का तर्क है कि चार साल तक कीमतें फ्रीज रखने के बाद अब घाटे की भरपाई के लिए यह कदम जरूरी हो गया। लेकिन घरेलू खुदरा तेल बाजार पर 90 प्रतिशत से अधिक नियंत्रण रखने वाली तीन प्रमुख सरकारी तेल कंपनियों ने जनवरी-मार्च 2026 की तिमाही में शानदार संयुक्त शुद्ध मुनाफा कमाया है। बीते वर्ष इसी अवधि के मुकाबले 40.74प्रतिशत बढ़कर मुनाफा 19,470 करोड़ रुपये पर पहुंच गया है। अधिकारियों के मुताबिक, अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच तनाव से पहले तक कच्चे तेल की कीमतें स्थिर रहने के कारण कंपनियों को रिफाइनिंग और मार्केटिंग मार्जिन का भारी फायदा मिला, जिससे मुनाफे में यह ऐतिहासिक उछाल दर्ज किया गया। यानी ईंधन की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए नरेंद्र मोदी के पास अभी भी काफी गुंजाइश है, लेकिन बोझ जनता पर डाला जा रहा है। ध्यान रहे कि इस समय डीजल पर उत्पाद शुल्क यूपीए सरकार के मुकाबले 125प्रतिशत अधिक है और पेट्रोल पर 29प्रतिशत अधिक है। मतलब वैश्विक संकट के नाम पर टैक्स का बोझ आम आदमी पर डाला जा रहा है, जिसमें तेल कंपनियां मुनाफे में और आम आदमी घाटे में है।


