पितृसत्ता के खिलाफ लड़कियों ने की आवाज बुलंद
केंद्र की मोदी सरकार और दिल्ली की रेखा गुप्ता सरकार के लिए कितने शर्म की बात है कि लड़कियों को बेखौफ सड़कों पर निकलने की आजादी को लेकर आवाज उठानी पड़ रही है।

केंद्र की मोदी सरकार और दिल्ली की रेखा गुप्ता सरकार के लिए कितने शर्म की बात है कि लड़कियों को बेखौफ सड़कों पर निकलने की आजादी को लेकर आवाज उठानी पड़ रही है। महिला सशक्तीकरण और बेटी बचाने के जितने नारे भाजपा ने गढ़े हैं, वो सब मौजूदा माहौल में ढेर होते दिख रहे हैं। महिला सुरक्षा के लिहाज से दिल्ली की गिनती सर्वाधिक असुरक्षित शहरों में होती है। दिल्ली पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक 2013 से 2025 के बीच राजधानी में 26,582 रेप केस दर्ज हुए हैं। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक भारत में हर दिन करीब यौन हिंसा के करीब 80 मामले दर्ज होते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो और राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों का विश्लेषण बताता है कि देश के 90 प्रतिशत ऐसे मामले तो कभी दर्ज ही नहीं होते।
निर्भया कांड जब हुआ था, तो उसने पूरे देश को हिला दिया था। सड़कों पर उतर कर लोगों ने तत्कालीन यूपीए और कांग्रेस सरकार के खिलाफ अपना गुस्सा जाहिर किया था। लेकिन वो दौर अलग था, कांग्रेस ने इस गुस्से का सामना जनभावनाओं का सम्मान करते हुए किया और साथ ही निर्भया के परिवार को निजी तौर पर राहुल गांधी ने मदद की और सरकार ने अपराधियों पर कड़ी कार्रवाई की। आज सरकार से ऐसी उम्मीदें करना बेकार है। बल्कि दिल्ली के सार्वजनिक पार्क आस्था कुंज में 21 सितंबर को खुद को पुलिसकर्मी बताकर तीन पुरुषों ने एक नाबालिग का बलात्कार किया और घटना के बाद डीडीए ने सलाह दी कि सूरज ढलने के बाद पार्क में किसी को जाने की इजाजत नहीं होगी। यह वारदात लेडी श्रीराम कॉलेज के पास हुई तो कॉलेज ने 22 सितंबर को ऑनलाइन क्लास ही लगा दी। जिसके बाद लेडी श्रीराम, गार्गी कॉलेज, मिरांडा हाउस समेत कई कॉलेजों की छात्राएं इन घटनाओं के खिलाफ सड़कों पर निकल आईं। अब दिल्ली के अलग-अलग हिस्सों में प्रदर्शन हो रहे हैं और कई सार्वजनिक पार्कों में लड़कियां और महिलाएं धरने पर बैठीं।
ठीक ऐसा ही माहौल 2016 में भी बना था, तब 'ब्लैंक नॉइज' नाम की संस्था के तहत लड़कियों ने सार्वजनिक पार्कों में रात को बैठना शुरु किया था। मकसद था सार्वजनिक स्थानों में लड़कियों को सुरक्षित महसूस करवाना और उन्हें यह एहसास दिलाना कि ये जगहें उनकी भी उतनी ही हैं जितनी पुरुषों की। लेकिन दस साल बाद भी दिल्ली क्या पूरे देश के हालात ऐसे ही हैं कि अंधेरा होने पर लड़कियां घर में रहें, यही सलाह दी जाती है। जबकि कायदे से समाज को मानसिकता बदलने की जरूरत है। लड़कों को लैंगिक बराबरी की सीख देने की जरूरत है, ताकि लड़कियां हर हाल में सुरक्षित महसूस करें। अभी डीडीए ने रात को पार्क में न आने की जो सलाह दी, उस पर लड़कियां फिर से पूछ रही हैं कि क्या लड़कियां पब्लिक पार्क में अपनी मर्जी से, अपने तय किए गए वक्त पर नहीं जा सकतीं? अगर सार्वजनिक जगहों पर यौन हिंसा की घटनाएं होती हैं तो क्या इसका उपाय यह है कि लड़कियों को वहां जाने से ही मना कर दिया जाए? छात्राओं का कहना था कि सुरक्षा के नाम पर लड़कियों के पार्कों में प्रवेश पर रोक लगाना समस्या का समाधान नहीं है। हालांकि अब डीडीए ने रविवार देर शाम स्पष्टीकरण जारी किया है कि पार्कों में आने वाले लोग पहले से निर्धारित समय के अनुसार उनका इस्तेमाल जारी रख सकते हैं। सूर्यास्त के बाद सुनसान या कम रोशनी वाले स्थानों पर नहीं जाने की सलाह केवल सुरक्षा के दृष्टिकोण से दी गई है। इससे पार्कों के खुलने और बंद होने के निर्धारित समय में कोई बदलाव नहीं किया गया है और तय समय के भीतर पार्कों में आने-जाने पर कोई रोक नहीं है।
लेकिन सवाल यही है कि चाहे स्थान सुनसान हो या भीड़-भाड़ वाला हो, अंधेरा हो या उजाला हो, घर हो, दफ्तर-कॉलेज-स्कूल हो या सड़क हो, हर जगह, हर तरीके से, हर उम्र की लड़कियां सुरक्षित क्यों नहीं हैं। इसका जवाब यही समझ आता है कि समाज में लड़कियों का सम्मान करने और उनके साथ बराबरी का व्यवहार करने की तमीज नगण्य है। गिने-चुने लोग ही होंगे जो लड़कियों को उनकी शारीरिक संरचना से परे केवल इंसानों के तौर पर देखें और वैसा ही व्यवहार करें जो एक इंसान को दूसरे इंसान से करना चाहिए। भारत के समाज में तो सुरक्षा के नाम पर लड़कियों की तरह-तरह की बंदिशें थोपीं गई हैं और इस तरह लड़कों के उच्छृंखल व्यवहार को और बढ़ावा दिया जाता है। अभी जमुई जिले में नाबालिग का उत्पीड़न कर, सोशल मीडिया पर उसका वीडियो वायरल कर दिया गया था, इस मामले में कई ऐसे वीडियो भी सामने आए जहां आरोपियों के गांव वालों ने उनका साथ दिया और कहा कि गलती उस लड़की की थी जो अंधेरे में एक लड़के के साथ घूम रही थी। यानी महिलाओं के साथ अपराध हो तो सजा पीड़िता को ही मिले और अपराधी खुले घूमते रहें।
राहुल गांधी ने पुणे में पितृसत्ता खत्म करो, पिंजड़ा तोड़ो का आह्वान किया था और अब उन्होंने एक बार फिर कहा है कि पूरे देश में महिलाएं सड़कों पर चलने से डरती हैं; उन्हें उत्पीड़न और बलात्कार का डर रहता है और सरकार का जवाब क्या है? घर पर रहो।
यह पितृसत्ता का असर है: एक ऐसा सिस्टम जो पीड़ित को ही दोषी ठहराता है और अपराधी को बचाता है। अब इसे खत्म करने का समय आ गया है।
इसका समाधान महिलाओं को घर में बंद करना नहीं है। समाधान है हमारी सड़कों को सुरक्षित बनाना, महिलाओं के साथ बुरा बर्ताव करने वाले पुरुषों की सोच का सामना करना, और उन लोगों को सज़ा देना जो उन पर हमला करते हैं- बिना किसी देरी और बिना किसी रियायत के।
हज़ारों छात्र और युवा सड़कों पर उतरकर महिलाओं की सुरक्षा की मांग कर रहे हैं। मैं और भी ज़्यादा युवा महिलाओं, खासकर पूरे भारत की जेन ज़ी से अपील करता हूं कि वे बड़ी संख्या में बाहर आएं।
यह सरकार आपके दर्द के प्रति बहरी है और तभी सुनेगी जब उस पर दबाव डाला जाएगा।
शांतिपूर्ण विरोध आपका लोकतांत्रिक अधिकार है, और मैं पूरे दिल से आपके साथ खड़ा हूं।
कायदे से जो कुछ राहुल गांधी ने कहा, वह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को कहना चाहिए था। लेकिन उन्हें महिला सुरक्षा का इतना ही ख्याल रहता तो आज वो हालात बनते ही नहीं जो दिल्ली से लेकर पूरे देश में बने हुए हैं।


