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नेपाल में नया युग

भारत के पड़ोसी देश नेपाल में जेन ज़ी (नयी पीढ़ी) आंदोलन से हुई बड़ी राजनैतिक उथल-पुथल के बाद सत्ता के नए युवा युग की शुरुआत हुई है

नेपाल में नया युग
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भारत के पड़ोसी देश नेपाल में जेन ज़ी (नयी पीढ़ी) आंदोलन से हुई बड़ी राजनैतिक उथल-पुथल के बाद सत्ता के नए युवा युग की शुरुआत हुई है। 35 बरस के बालेन शाह ने नेपाल के अब तक के सबसे युवा प्रधानमंत्री के तौर पर शुक्रवार को शपथ ली। रैपर-गायक के तौर पर नेपाल के युवाओं में खासे लोकप्रिय रहे बालेन शाह चार बरस पहले 2022 में काठमांडू के मेयर नियुक्त हुए थे, अब उनकी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को हाल ही में हुए चुनाव में लगभग दो-तिहाई बहुमत मिला, जो यह जाहिर करता है कि नेपाल में अब राजनीति का युवा दौर आ चुका है। बालेन शाह ने पूर्व प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली को उनके ही गढ़ झापा में तगड़ी मात देकर बता दिया था कि जेन ज़ी ने अब नेपाल की कमान अपने हाथों में ले ली है।

इससे पहले बांग्लादेश में भी छात्र आंदोलन से ही राजनैतिक उथल-पुथल मची थी, लेकिन वहां अस्थिरता और अशांति का दौर कुछ लंबा खिंचा और अब तारिक रहमान के नए नेतृत्व में फिलहाल भारत से संबंध सुधरते दिख रहे हैं। अब नज़रें नेपाल के नए नेतृत्व पर हैं।

दरअसल समृद्ध और विकास की ओर बढ़ते पड़ोसी देशों से भारत का विकास और सुरक्षा भी जुड़े हुए हैं। पाकिस्तान से तो भारत के संबंधों में तल्खी और अविश्वास बने ही रहते हैं, इसलिए जरूरी है कि नेपाल और बांग्लादेश के साथ भारत के संबंध मजबूत रहें और उन्हें चीन के प्रभाव में न आने दिया जाए। इसके लिए भारत को अभी से मजबूत रणनीति बनानी होगी। ध्यान देने की बात है, राजशाही के बाद नेपाल में बनी तमाम सरकारें कमोबेश चीन के प्रभाव में रही हैं। नेपाल का चीन के साथ होने में कोई आपत्ति नहीं, लेकिन फिर उस वजह से भारत का विरोध नहीं होना चाहिए। यह एक हिंदू बहुल देश है, जिससे भारत से रोटी-बेटी के संबंध सदियों पुराने हैं।

वैसे नेपाल में बालेन शाह ने ऐसे वक्त में सत्ता संभाली है, जब पूरी दुनिया पर मध्यपूर्व में चल रही जंग का असर दिखने लगा है। तेल की कीमतों में आग लगी हुई है और खाड़ी देशों में रोजगार के अवसर अब काफी घट गए हैं। नेपाल से बड़ी संख्या में लोग रोजगार के लिए इन देशों में जाते हैं, लेकिन अब वे लौटेंगे तो इन लोगों को देश में ही रोजगार देना बहुत बड़ी चुनौती रहेगी। आंकड़े बताते हैं कि हर दिन क़रीब 2,900 नेपाली काम के लिए विदेश जाते हैं और उनका भेजा पैसा देश की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा है। यह पैसा नेपाल के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 26 फ़ीसदी से अधिक है।

इसके अलावा भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और अक्षम प्रशासन को सुधारना भी बालेन शाह सरकार के सामने प्रमुख चुनौतियां रहेंगी। क्योंकि इन्हीं कारणों से ही युवाओं की नाराजगी सत्ता के खिलाफ फूटी थी और जेन ज़ी आंदोलन खड़ा हुआ था। बालेन शाह अगर इस मोर्चे पर आधे भी कामयाब होते हैं, तो नेपाल गरीबी और अभाव के दलदल से बाहर निकलने लगेगा।

नयी सरकार के सामने एक महत्वपूर्ण चुनौती राजनैतिक स्थिरता कायम करने की है। तीन करोड़ लोगों के इस देश में राजशाही खत्म होने के बाद से राजनीतिक स्थिरता लाने की कोशिशें की जा रही हैं, लेकिन अब तक कामयाबी नहीं मिली। बल्कि राजशाही के दौर में भी सरकारों के बदलने का सिलसिला जारी था। ध्यान रहे कि 1990 से 2026 के बीच 32 सरकारें नेपाल की सत्ता में आई और किसी भी सरकार ने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं किया है। बालेन शाह ने अगर प्रधानमंत्री के रूप में अपनी सरकार को पांच साल बनाए रखा, तो यह वाकई युगांतकारी घटना होगी।

शाह की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) ने अपने चुनावी घोषणापत्र में कहा था कि वह नैतिकता और सुशासन को प्राथमिकता देगा और ऑनलाइन माध्यम से सेवाएं देने का वादा किया था। इसके अलावा पार्टी ने कहा है कि वह देश की संरचना में पक्षपात ख़त्म करेगी। अब इन घोषणाओं पर कब तक अमल होता है, इस पर नेपाल की जनता निगाह रखेगी ही। वैसे प्रधानमंत्री बनने के तुरंत बाद बालेन शाह की अध्यक्षता में हुई पहली कैबिनेट बैठक में फैसला लिया गया कि आंदोलन में मारे गए मृतक छात्रों के परिजनों को सरकारी नौकरी दी जाएगी, ताकि उनके परिवारों को आर्थिक सहारा मिल सके। इस पर काम भी शुरु हो गया है। इसके अलावा बालेन शाह सरकार ने पूर्व प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली को भी शनिवार को ही गिरफ्तार कर लिया। ओली पर आंदोलन के दौरान हिंसा भड़कने और छात्रों की मौत का ठीकरा फोड़ा गया है। इस मामले में एक जांच समिति भी गठित की गई, जिसकी रिपोर्ट में कहा गया, 'भले ही गोली चलाने का सीधा आदेश साबित ना हुआ हो, लेकिन फायरिंग को रोकने का कोई प्रयास भी नहीं किया गया। कार्यकारी प्रमुख होने के नाते ओली को हर अच्छे-बुरे परिणाम के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।' हालांकि अभी तक यह साबित नहीं हुआ है कि क्या ओली ने लापरवाही दिखाई जिस वजह से 70 से ज्यादा लोगों की मौत हुई है। इसके बाद यही सवाल उठ रहे हैं कि क्या ओली की गिरफ्तारी के पीछे कोई राजनैतिक बदले की भावना है।

क्योंकि खुद ओली ने अपनी गिरफ्तारी पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इसे 'बदले की कार्रवाई' करार दिया है। उन्होंने साफ कहा है कि यह कदम राजनीतिक रूप से प्रेरित है और वह इसके खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ेंगे। 1966 में मार्क्स और लेनिन से प्रेरित होकर राजनीति में आए 74 बरस के ओली चार बार नेपाल के प्रधानमंत्री रह चुके हैं और उन्होंने कई किस्म के राजनैतिक झंझावातों का सामना किया है। 1967 के 'झापा विद्रोह' में सक्रिय भूमिका निभाई, जो किसान आंदोलन था, इसके बाद ओली ने साल 1973 से लेकर 1987 तक अपने जीवन के 14 साल जेल में बिताए। उन पर पंचायत शासन के दौरान हत्या और अन्य राजनीतिक आरोप लगे थे। उनके करीबियों का मानना है कि जेल के अनुभवों ने उन्हें एक 'एकांतप्रिय' और खुद पर भरोसा करने वाला व्यक्ति बना दिया। अब ओली फिर से सलाखों में हैं, लेकिन क्या यह उनके राजनैतिक जीवन का अंत है यह देखना होगा। लेकिन फिलहाल बालेन शाह की नेतृत्व क्षमता की परीक्षा बाकी है कि वे राजनीति में धूमकेतु बनते हैं या धु्रव तारा बनते हैं।


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