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विविधता की खेती का जवाब नहीं

यह परंपरागत खेती खाद्य सुरक्षा, मिट्टी-पानी के संरक्षण, पशुपालन में मददगार, जैवविविधता व पर्यावरण का संरक्षण सभी दृष्टियों से महत्वपूर्ण है।

विविधता की खेती का जवाब नहीं
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— बाबा मायाराम

विविधता की खेती हर दृष्टि से उपयोगी है। यह परंपरागत खेती खाद्य सुरक्षा, मिट्टी-पानी के संरक्षण, पशुपालन में मददगार, जैवविविधता व पर्यावरण का संरक्षण सभी दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। जलवायु बदलाव के दौर में यह और भी उपयोगी है, अगर एक फसल कमजोर होती है, तो दूसरी से मदद मिल जाती है। प्रकृति में सहअस्तित्व का भी यह बहुत ही अच्छा तरीका माना जा सकता है।

इन दिनों खेतों में रबी की फसलें लहलहा रही हैं। हरे-भरे खेत हैं। मुझे याद आ रही है, सतपुड़ा अंचल की, जहां एक जमाने में चने की खेती बहुतायत में होती थी। चना, बिना सिंचाई या बहुत कम पानी की फसल है, जिसे किसान उगाते थे। आज जब खेती का अभूतपूर्व संकट है, तब ऐसी देसी खेती को याद जरूरी है, जिसमें कम पानी, कम लागत और मिट्टी की उर्वरता बनी रहे। इसी प्रकार, सतपुड़ा अंचल में मिश्रित खेती की एक पद्धति है उतेरा, जिसमें कई फसलें एक साथ बोते हैं। आज इस कॉलम में इस पर बात करना चाहूंगा, जिससे खेती को समग्रता में समझा जा सके।

नर्मदापुरम जिला ( पूर्व में होशंगाबाद जिला) भौगोलिक रूप से दो भागों में बंटा है। एक है सतपुड़ा की जंगल पट्टी। दूसरा है नर्मदा का कछार। नर्मदा कछार मैदानी इलाका है, जहां अच्छी उपजाऊ मिट्टी है। जंगल पट्टी में प्राय: सूखी और असिंचित खेती होती है। जबकि नर्मदा के कछार में तवा की नहरें हैं। कछार की जमीन काफी उपजाऊ मानी जाती है। यही काली मिट्टी की जमीन में चना अच्छा होता है।

बिना सिंचाई के चना की खेती होती है। दीपावली के समय बारिश की नमी में ही चना को बोया जाता है, और होली के पूर्व ही चना कटाई हो जाती है। मुझे याद है, मैं अपने परिवारजनों के साथ खेत में चना का होउरा ( भुना चना) खाने के लिए जाया करता था। कई बार मेहमानों व अतिथियों को भी चना का होउरा खिलाने खेत भी ले जाते थे। यह अतिथियों का आत्मीय स्वागत करने का भी एक तरीका होता था। होउरा को भूनकर रख लिया जाता था, और जब भी जरूरत होती थी, उसे खाते थे। यह एक तरह का ड्राई फूड होता था।

हमारे यहां गेहूं और चना दोनों को मिलाकर आटा पिसाने का चलन है। इसे बिर्रा कहते थे। इसकी रोटी बहुत ही पसंद की जाती हैं। यह रोटी बिना सब्जी की भी बहुत अच्छी लगती है। बुजुर्ग लोगों को बिर्रा की रोटी आज भी याद है। चने का सत्तू तो बहुत प्रचलन में था। सत्तू में गुड़ मिलाकर खाते थे। इसे यात्राओं में या गर्मी के दिनों में बड़े चाव से खाया जाता था। यह भी ड्राई फूड का एक प्रकार है।

देशी बीजों के जानकार व पदमश्री से सम्मानित बाबूलाल दाहिया बताते हैं कि चने की भाजी बहुत अच्छी स्वादिष्ट होती है। इसकी सब्जी बनाई जाती है, और इसकी कोपलों को ऐसे ही अचार के साथ भी खाया जाता है। जब चने में भरे दाने हो जाते हैं, तो होउरा ( भुना हरा चना) भी भूनकर खाते हैं। इस तरह ज्वार की रोटी और कोदो के चावल के साथ 3 माह तक चने की भाजी खाई जाती थी। चना के दाने भरे होने पर भी इसकी सब्जी बनाई जाती है। चना की दाल और बेसन से तो कई व्यंजन बनाए जाते हैं।

सतपुड़ा की जंगल पट्टी में परंपरागत खेती की पद्धति प्रचलित है जिसे उतेरा कहा जाता है। यह छत्तीसगढ़ की उतेरा पद्धति से भिन्न है। यह मिश्रित पद्धति की खेती है। इसमें 6-7 प्रकार के अनाजों को मिलाकर बोया जाता है। इस अनूठी पद्धति में ज्वार, धान, तिल्ली, तुअर, समा, कोदो मिलाकर बोते हैं। एक साथ सभी बीजों को मिलाकर खेत में बोया जाता है और बक्खर चलाकर पेंटा लगा देते हैं। फसलें जून में बोई जाती हैं लेकिन अलग-अलग समय में काटी जाती हैं। पहले उड़द, फिर धान, ज्वार और अंत में तुअर कटती है। कुटकी जल्द पक जाती है।

इसमें किसी प्रकार की लागत नहीं है। खुद की मेहनत, बैलों का श्रम और बारिश की मदद से हमारी फसल पक जाती है। हर साल हम अगली फसल के लिए बीज बचाकर रखते हैं और उन्हें खेतों में बो देते हैं। हमारे पास बैल हैं जिनसे हम खेतों की जुताई करते हैं। मवेशियों से हमें गोबर खाद मिलती है जिससे हमारे खेतों की मिट्टी उपजाऊ बनती है। उतेरा से पूरा भोजन मिल जाता है। दाल, चावल, रोटी और तेल सब कुछ। इसमें दलहन, तिलहन और मोटे अनाज सब शामिल हैं। इन सबसे साल भर की भोजन की जरूरतें पूरी हो जाती है। मवेशियों के लिए चारा और मिट्टी को उर्वर बनाने के लिए जैव खाद मिल जाती है। यानी उतेरा से इंसानों के लिए अनाज, मवेशियों के लिए फसलों के ठंडल, भूसा और चारा, मिट्टी के लिए जैव खाद और फसलों के लिए जैविक कीटनाशक प्राप्त होते हैं।

इस पद्धति में कई फसलें एक साथ बोने से पोषक तत्वों का चक्र बराबर बना रहता है। अनाज के साथ फलियों वाली फसलें बोने से नाइट्रोजन आधारित बाहरी निवेशों की जरूरत कम पड़ती है। द्विदलीय फसलों की यही विशेषता है।

उतेरा पद्धति के बारे में किसानों की सोच यह है कि अगर एक फसल मार खा जाती है तो उसकी पूर्ति दूसरी फसल से हो जाती है। जबकि नकदी फसल में कीट या रोग लगने से या प्राकृतिक आपदा आने से पूरी फसल नष्ट हो जाती है जिससे किसानों को नुकसान होता है। मिश्रित और मिलवां फसलें एक जांचा परखा तरीका है। इसमें फसलें एक दूसरे को फायदा पहुंचाती हैं। यह उतेरा खेती, बिना सिंचाई वाले इलाकों में प्रचलन में थी। अब भी कुछ जगह होती है। उतेरा को सतगजरा भी कहते हैं। सतगजरा की तरह नवदान्या, उत्तराखंड की बारहनाजा जैसी कई पद्धतियां देश भर में प्रचलित हैं। हालांकि इनमें कई कारणों से कमी आ रही है।

इसी प्रकार, कुछ साल पहले हर घर में बाड़ी होती है जिसमें उतेरा की ही तरह मिलवां फसलें हुआ करती थीं। बाड़ी में घरों के पीछे कई तरह की हरी सब्जियां और मौसमी फल और मोटे अनाज लगाए जाते थे। जैसे भटा, टमाटर, हरी मिर्च, अदरक, भिंडी, सेमी (बल्लर), मक्का, ज्वार आदि होते थे। मुनगा, नींबू, बेर, अमरूद आदि बच्चों के पोषण के स्रोत होते थे। इसमें न अलग से पानी देने की जरूरत थी और न ही खाद। जो पानी रोजाना इस्तेमाल होता था उससे ही बाड़ी की सब्जियों की सिंचाई हो जाती थी। लेकिन इन सबमें कई कारणों से कमी आ रही है।

सब्जी बाड़ी की परंपरा छत्तीसगढ़ में अब भी देखने को मिलती है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में कार्यरत जन स्वास्थ्य सहयोग नामक संस्था ने बच्चों की फुलवारी ( एक तरह का झूलाघर) में सब्जी बाड़ी लगाने को प्रोत्साहित किया है, जिससे बच्चों की ताजी खिचड़ी व भोजन में हरी ताजी सब्जियां शामिल होती हैं। इसी प्रकार, आजकल देश के कई हिस्सों में आंगनबाड़ियां व स्कूलों में सब्जियां उगाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है, जो सराहनीय पहल है। इससे बच्चों में पेड़-पौधों की जानकारी, जैव विविधता और पर्यावरण से जुड़ाव बनेगा। भोजन में विविधता भी होगी।

कुल मिलाकर, विविधता की खेती हर दृष्टि से उपयोगी है। यह परंपरागत खेती खाद्य सुरक्षा, मिट्टी-पानी के संरक्षण, पशुपालन में मददगार, जैवविविधता व पर्यावरण का संरक्षण सभी दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। जलवायु बदलाव के दौर में यह और भी उपयोगी है, अगर एक फसल कमजोर होती है, तो दूसरी से मदद मिल जाती है। प्रकृति में सहअस्तित्व का भी यह बहुत ही अच्छा तरीका माना जा सकता है। लेकिन क्या हम इस दिशा में आगे बढ़ेंगे?


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