ट्रंप पर अंकुश लगाना जरूरी
ईरान पर इजरायल और अमेरिका को युद्ध छेड़े 31 दिन पूरे हो चुके हैं और इस एक महीने में ईरान समेत पूरी दुनिया को बड़ी तबाही की राह पर धकेला जा चुका है

ईरान पर इजरायल और अमेरिका को युद्ध छेड़े 31 दिन पूरे हो चुके हैं और इस एक महीने में ईरान समेत पूरी दुनिया को बड़ी तबाही की राह पर धकेला जा चुका है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हिरोशिमा और नागासाकी में परमाणु बम से अकल्पनीय त्रासदी कायम करने वाले अमेरिका ने परमाणु हथियार रोकने के नाम पर ही जंग का यह खेल शुरु किया, लेकिन अब उनकी असली नीयत सामने आ गई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि वह 'ईरान का तेल अपने कब्ज़े में लेना' चाहते हैं और खर्ग द्वीप पर भी नियंत्रण कर सकते हैं। गौरतलब है कि खर्ग द्वीप ईरान की तेल निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, यहां से 90 प्रतिशत तक तेल निर्यात होता है। और इस द्वीप पर कब्जा करने के लिए हजारों सैनिकों को जमीन पर उतारने की तैयारी अमेरिका ने की है, यह बात वॉशिंगटन पोस्ट में छपी एक खबर से जाहिर हुई है। हालांकि ट्रंप अब खुलकर अपनी कपटी नीयत का इजहार भी कर रहे हैं।
ट्रंप ने फ़ाइनेंशियल टाइम्स से साफ कहा है कि वे ईरान के तेल पर कब्जा करना चाहते हैं, इसके बाद कोई संदेह बाकी नहीं रह जाता कि परमाणु हथियार केवल एक बहाना थे। मगर सवाल वही है कि कब तक विश्व ट्रंप या अमेरिका के छलावे भरे दावों पर यकीन करेगा। अंग्रेजी भाषा के वर्चस्व और हॉलीवुड में बनी फिल्मों के जरिए पूरी दुनिया में एक भ्रम अमेरिका ने खड़ा किया है कि वह लोकतंत्र और विश्व शांति का सबसे बड़ा रक्षक है, जबकि रूस, क्यूबा, चीन जैसे साम्यवादी देश या ईरान, अफगानिस्तान जैसे देश दुनिया के लिए बड़ा खतरा है। अमेरिका के रचे इस दृश्यम का ऐसा असर हुआ है कि दुनिया उसकी परोसे नैरेटिव को ही सच मानती है, और भूल जाती है कि हर तस्वीर का दूसरा पहलू भी होता है। अब ट्रंप ने जो 15 सूत्रीय प्रस्ताव युद्धविराम के लिए दिए थे, उसे ही देख लें-
1. ईरान को अपना परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह से बंद करना होगा
2. यूरेनियम संवर्धन पूरी तरह से रोकना होगा
3. अमेरिका को इसकी बेरोकटोक जांच की अनुमति देनी होगी
4. बैलिस्टिक मिसाइल विकास रोकना होगा
5. सैन्य क्षमताओं को कम करना होगा
6. फिलिस्तीन और लेबनान में समूहों को समर्थन देना बंद करना होगा
7. विदेशों में अपना प्रभाव समाप्त करना होगा
8. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का नियंत्रण छोड़ना होगा
9. जहाजरानी मार्गों (शिपिंग रूट्स) पर नियंत्रण छोड़ना होगा
10. खाड़ी में अमेरिकी सहयोगियों पर हमले बंद करने होंगे
11. क्षेत्र में युद्ध को कम करना होगा
12. अमेरिका के नेतृत्व वाली वार्ताओं को स्वीकार करना होगा
13. दीर्घकालिक निगरानी और अनुपालन की शर्तों को स्वीकार करना होगा
14. हथियारों के हस्तांतरण को सीमित करना होगा
15. भविष्य में अपना व्यवहार बदलना होगा
ये शर्तें बता रही हैं कि अमेरिका ईरान को अपनी शर्तों पर चलाना चाहता है, वेनेजुएला में पहले ही उसने राष्ट्रपति का अपहरण किया और अब वह क्यूबा में ऐसा ही करने की धमकी दे रहा है। इसके बाद अगली बारी किस देश की होगी, कहा नहीं जा सकता।
अमेरिका की दूसरे देशों में हस्तक्षेप की नीति तो शुरु से रही है, लेकिन ट्रंप इसे पूरी निर्लज्जता से जाहिर भी कर रहे हैं। रविवार को एयर फ़ोर्स वन पर ट्रंप ने पत्रकारों से कहा कि 'ईमानदारी से कहूं, तो मेरी पसंदीदा चीज़ है ईरान का तेल लेना। लेकिन अमेरिका में कुछ लोग कहते हैं कि आप ऐसा क्यों कर रहे हैं। वे लोग बेवकूफ़ हैं।' वहीं ट्रंप ने यह भी कहा कि 'अगर आप देखें, तो वहां पहले ही शासन परिवर्तन हो चुका है। पहला शासन पूरी तरह ख़त्म हो गया, नष्ट हो गया, वे सभी मारे जा चुके हैं। दूसरा शासन भी लगभग ख़त्म हो चुका है और अब तीसरे शासन में हम ऐसे लोगों से बात कर रहे हैं, जिनसे पहले कभी किसी ने बात नहीं की। यह बिल्कुल अलग समूह है, इसलिए मैं इसे शासन परिवर्तन मानता हूं। ट्रंप ने कहा, 'जो शासन बहुत ख़राब था, बहुत बुरा था, दूसरा जिसे नियुक्त किया गया था, वे सभी अब ख़त्म हो चुके हैं, मारे जा चुके हैं। केवल एक व्यक्ति बचा है, जिसमें शायद थोड़ी जान बाक़ी है।' ट्रंप ने आगे कहा, 'ईरान के साथ कुछ कहा नहीं जा सकता, क्योंकि हम उनसे बातचीत करते हैं और फिर हमें उन्हें बम से उड़ाना पड़ता है।'
हैरानी की बात है कि किस तरह किसी देश की निजता और संप्रभुता का न केवल मखौल ट्रंप उड़ा रहे हैं, बल्कि शीर्ष नेताओं की हत्या जैसे अंतरराष्ट्रीय अपराध को जायज भी ठहरा रहे हैं। अगर कोई देश इसी तरह की बात अमेरिका के लिए करे तो क्या उसे बर्दाश्त किया जाएगा, शायद नहीं। अंतरराष्ट्रीय बिरादरी पहले ही व्हाइट हाउस पर हमले या अमेरिकी राष्ट्रपति समेत शीर्ष नेताओं की हत्या के विचार को आतंकवाद करार देते हुए उस देश या व्यक्ति पर आपराधिक मुकदमा चलाने की बात करने लगेगी। तो फिर ट्रंप के ऐसे बयानों पर व्यापक विरोध क्यों नहीं हो रहा, यह विचारणीय है। इस समय स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज जैसे नेताओं की सख्त जरूरत है, जो न केवल ईरान पर हमले को खुलकर गलत बता रहे हैं, बल्कि अमेरिका का साथ देने से साफ इंकार भी कर चुके हैं।
ईरान के शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम को बहाना बनाकर उसके प्राकृतिक संसाधन पर कब्जे का बेशर्म इजहार ट्रंप ने किया है, तो फिर प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न भारत जैसे बाकी देशों को भी सावधान हो जाना चाहिए।


