अगले चुनाव की तैयारी में जुटी कांग्रेस
कर्नाटक की कांग्रेस सरकार में नए सिरे से जिम्मेदारियां तय की जा रही हैं। 2023 में बड़ी जीत के बाद दूसरी बार मुख्यमंत्री बने सिद्धारमैया ने गुरुवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।

कर्नाटक की कांग्रेस सरकार में नए सिरे से जिम्मेदारियां तय की जा रही हैं। 2023 में बड़ी जीत के बाद दूसरी बार मुख्यमंत्री बने सिद्धारमैया ने गुरुवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। इससे पहले 2013 से 2018 तक सिद्धारमैया कांग्रेस सरकार में पूरे पांच साल के लिए मुख्यमंत्री थे। बताया जा रहा है कि 2023 में कांग्रेस ने यह तय कर लिया था कि राजस्थान या मध्यप्रदेश जैसी उलझन से बचने के लिए बारी-बारी से दो मुख्यमंत्री बनाए जाएंगे। सिद्धारमैया के बाद डी के शिवकुमार की सबसे सशक्त उम्मीदवार थे, लिहाजा अब यह कमोबेश तय है कि अब तक उपमुख्यमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष दोनों की जिम्मेदारी संभालने वाले डीके शिवकुमार ही नए मुख्यमंत्री होंगे।
गुरुवार सुबह जब अपने कैबिनेट सहयोगियों के साथ सिद्धारमैया ने नाश्ते पर बैठक की और उसमें डीके शिवकुमार सिद्धारमैया को गले लगाते और उनके पैर छूते हुए भावुक हो गए, तभी यह तय हो गया कि कर्नाटक की कांग्रेस सरकार में बड़े सहज तरीके और सद्भावनापूर्ण माहौल में मुख्यमंत्री का चेहरा बदला जा रहा है। दरअसल मंगलवार को दोनों नेताओं ने दिल्ली में राहुल गांधी के साथ बैठक की थी, तभी से सुगबुगाहट थी कि कर्नाटक में कांग्रेस कोई बड़ा बदलाव करने जा रही है। कांग्रेस विरोधी मीडिया की बांछें इस पर खिली हुई थीं, क्योंकि उन्हें किसी न किसी तरह कांग्रेस के खिलाफ कोई विवाद तलाशना होता है। उनकी दुकानदारी कांग्रेस को मुश्किल में दिखाने से ही चलती है। इसलिए 2023 से ही डी के शिवकुमार और सिद्धारमैया के बीच दुश्मनी दिखाने वाली कई बेबुनियाद खबरें चलाई जाती रहीं। यह सच है कि कुर्सी के कारण राजनैतिक दलों में बड़े नेताओं के बीच खींचतान चलती है, इस प्रवृत्ति की शिकार अकेली कांग्रेस नहीं है। लेकिन कांग्रेस इस प्रवृत्ति के कारण मुश्किल में इसलिए पड़ जाती है, क्योंकि यहां आंतरिक लोकतंत्र है, नाराज नेताओं को बयान देने की छूट है और पार्टी आलाकमान के खिलाफ बोलकर भी बड़े पदों पर उन्हें बिठाया जाता रहा है, भले फिर पार्टी को इससे नुकसान हो। दूसरी तरफ भाजपा में नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की मर्जी के खिलाफ एक पत्ता भी नहीं हिलता है। उनकी मर्जी हुई तो एक नहीं दो-दो बार गुजरात में मुख्यमंत्री और केबिनेट को बदल दिया। महाराष्ट्र में देवेन्द्र फड़नवीस को पहले मुख्यमंत्री बनाया फिर उपमुख्यमंत्री और अब फिर से मुख्यमंत्री बना दिया। असम, मणिपुर, त्रिपुरा, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, दिल्ली, उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा ऐसे तमाम राज्यों में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर मोदी-शाह की पसंद ही चली और राष्ट्रीय अध्यक्ष से लेकर राज्यों के अध्यक्ष बनाने में भी उन्हीं दोनों की मर्जी चलती है। इसलिए जब तक बन पड़ा जे पी नड्डा का अध्यक्षीय कार्यकाल बढ़ाया गया, फिर बिहार की सत्ता पर पकड़ बनानी थी, तो उन्हें हटाकर नितिन नबीन को अध्यक्ष बनाया गया। अभी गुरुवार को ही पंजाब, दिल्ली, हरियाणा और त्रिपुरा की भाजपा इकाइयों के अध्यक्ष बदले गए हैं।
कोई पार्टी किस नेता को क्या जिम्मेदारी सौंपती है, यह उसका आंतरिक मामला होता है। लेकिन भाजपा के प्रभाव में आकर अब मीडिया ने ऐसा नैरेटिव सेट कर दिया है, जिसमें मोदी-शाह पार्टी में कोई भी फेरबदल करें तो वह मास्टर स्ट्रोक हो जाता है और कांग्रेस कोई फेरबदल करे तो उसे पार्टी के अंदरूनी झगड़े का असर बताया जाता है। कर्नाटक में भी यही कहानी चलाने की कोशिश की गई, लेकिन अच्छी बात है कि सिद्धारमैया और डी के शिवकुमार ने इस कहानी पर पहले ही पूर्णविराम लगा दिया।
अपने इस्तीफे के बाद सिद्धारमैया ने कहा कि उनके आलाकमान ने जो कहा उन्होंने वो किया। इसके साथ ही उन्होंने कहा, 'हाई कमान ने मुझसे राज्यसभा में जाने के लिए कहा। लेकिन, मैंने विनम्रतापूर्वक इस प्रस्ताव को यह कहते हुए ठुकरा दिया कि मेरी राष्ट्रीय राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं है। सिद्धारमैया ने यह भी कहा कि, 'मुझे दो बार मुख्यमंत्री के तौर पर और दो बार विपक्ष के नेता के तौर पर सात करोड़ कन्नड़भाषियों की सेवा करने का अवसर मिला। मैं सोनिया गांधी, राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का आभार व्यक्त करता हूं।'
सिद्धारमैया के इस बयान से जाहिर है कि वे दिल्ली नहीं आने वाले हैं और राज्य में ही कांग्रेस को मजबूत करने का काम करेंगे। ध्यान रहे कि कांग्रेस में यह फेरबदल ऐसे वक्त हुआ है, जब वह दक्षिण भारत में सबसे मजबूत स्थिति में है। केरल में उसने बड़ी जीत हासिल की है और तमिलनाडु में छह दशक बाद सत्ता में शामिल हुई है। जब केरल में भी मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा में कांग्रेस ने वक्त लिया तब भी कई पत्रकार अंदरूनी झगड़े की चटखारेदार खबरें परोसने में लगे थे, लेकिन ऐसी खबरों का जायका ज्यादा देर टिक नहीं पाया। जो परिपक्वता वहां के सी वेणुगोपाल या रमेश चेन्निथल्ला जैसे नेताओं ने दिखाई, वहीं यहां सिद्धारमैया ने दिखाई है।
रहा सवाल डी के शिवकुमार का, तो उनके पास संगठन को आगे बढ़ाने का अच्छा खासा अनुभव है। आठ बार विधायक रह चुके डीके शिवकुमार ने सबसे पहले साल 1989 में मैसुरू जिले की सथानूर विधानसभा सीट से जीत हासिल की। इसके बाद उन्होंने 1994, 1999 और 2004 में लगातार चुनाव लड़ा और जीते। वहीं कनकपुरा सीट से डी के शिवकुमार ने 2008, 2013, 2018 और 2023 में उन्होंने जीत हासिल की। उनके मजबूत जनाधार को देखते हुए उन्हें कनकपुरा की चट्टान भी कहा जाता है। डी के शिवकुमार कांग्रेस हाईकमान के भरोसमंद हैं और कर्नाटक के अलावा कई राज्यों में पार्टी की तरफ से दी गई जिम्मेदारी को वे निभाते रहे हैं। उम्र का गणित भी डी के शिवकुमार के पक्ष में जाता है, वे अभी 64 बरस के हैं, वहीं सिद्धारमैया 78 के हो चुके हैं। इन दोनों के भरोसे कांग्रेस कर्नाटक के जातीय समीकरण को भी अच्छे से साध सकती है।
सिद्धारमैया अहिंदा यानी ओबीसी, दलित और अल्पसंख्यकों के सामाजिक गठजोड़ के नेता के तौर पर स्थापित हैं और कुरुबा यानी चरवाहा समुदाय से आते हैं, वहीं डीके शिवकुमार वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं, जो कर्नाटक की जनसंख्या का लगभग 12 से 15प्रतिशत है। यह समुदाय पुराने मैसूर क्षेत्र (मांड्या, हासन, मैसूर, रामनगर, तुमकुर आदि) की लगभग 50 से 100 विधानसभा सीटों पर सीधा प्रभाव रखता है। डी के शिवकुमार के कारण कांग्रेस को इन सीटों पर बढ़त मिलेगी। वहीं अब उनकी जगह सतीश जरकीहोली को कर्नाटक कांग्रेस का नया प्रदेश अध्यक्ष बनाने की चर्चा है, जो अनुसूचित जाति से आती हैं। जातीय समीकरण साधने के लिए कांग्रेस दो से तीन उपमुख्यमंत्री बना सकती है, जिसमें एक लिंगायत समुदाय और एक दलित समुदाय से हो सकता है। बता दें कि लिंगायत समुदाय के वोट भी अक्सर चुनाव में निर्णायक होते हैं। कांग्रेस के प्रमुख लिंगायत चेहरों में शामिल और मध्यम और बड़े पैमाने के उद्योग मंत्री एम.बी. पाटिल को उपमुख्यमंत्री पद का मजबूत दावेदार माना जा रहा है। इसके अलावा सिद्धारमैया के बेटे यतींद्र को भी उपमुख्यमंत्री के तौर पर रखा जा सकता है।
कुल मिलाकर कांग्रेस 2028 को ध्यान में रखकर काफी सावधानी से अपने पत्ते रख रही है। इसी राजनीति के साथ ही उसे बढ़ना होगा, तभी भाजपा को रोकने में वह कामयाब होगी।


