यूपीआई पर शुल्क, नोटबंदी के बाद फिर एक धोखा
मोदी सरकार ने घोषणा की है कि यूपीआई से एक बार में 2000 रुपये से ज़्यादा की खरीदारी की तो 0.4 प्रतिशत शुल्क लगेगा।

दस साल पहले 2016 में नरेन्द्र मोदी ने नोटबंदी का जो फैसला लिया था, वो आम जनता के साथ कितना बड़ा धोखा था, यह अब और खुलकर नजर आ रहा है। नोटबंदी के फैसले के पीछे आतंकवाद की कमर तोड़ने और काला धन वापस लाने के जो दावे किए गए थे, वो तो पूरी तरह फेल हो ही गए, कैशलेस यानी नकदी रहित अर्थव्यवस्था भी ढकोसला ही साबित हुई, क्योंकि जानकारों का मानना है कि इस समय बाजार में नकदी प्रवाह पहले से ढाई गुना ज्यादा है। यानी लोग यूपीआई से ज्यादा नकदी लेन-देन पर ही भरोसा कर रहे हैं। और जो लोग यूपीआई को सुविधाजनक मानते हुए इसका अधिक इस्तेमाल करने लगे हैं, अब उनके भी बुरे दिन आ चुके हैं।
मोदी सरकार ने घोषणा की है कि यूपीआई से एक बार में 2000 रुपये से ज़्यादा की खरीदारी की तो 0.4 प्रतिशत शुल्क लगेगा। यानी यदि आपने किसी व्यापारी को 5000 रुपये का यूपीआई भुगतान किया तो उस पर 40 रुपये का शुल्क लगेगा। बेशक अभी यह शुल्क ग्राहक को नहीं देना पड़ेगा और सरकार यही तर्क अपने फैसले के बचाव में दे रही है। लेकिन साधारण समझ की बात है कि इस शुल्क को व्यापारी किसी न किसी तरह से ग्राहकों से ही वसूलेंगे, चाहे कीमतों में वृद्धि करके या किसी और सेवा के नाम पर। इसलिए मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर के रूप में लगाए जाने वाले इस शुल्क की घोषणा को कांग्रेस ने 'द ग्रेट यूपीआई लूट' क़रार दिया है, जो गलत नहीं है।
कांग्रेस ने सवाल उठाया है कि नोटबंदी के समय सरकार ने डिजिटल भुगतान और कैशलेस अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने की जो बात कही थी तो अब उसी डिजिटल भुगतान व्यवस्था पर शुल्क क्यों लगाया जा रहा है। यह तो कैशलेस अर्थव्यवस्था को निरुत्साह करने का कदम है। सवाल यह भी है कि यह फैसला बजट सत्र में क्यों नहीं लाया गया, जब वित्त मंत्री ने संसद में बजट पेश किया था, तब भी इस संबंध में चर्चा हो सकती थी। मुमकिन है विपक्ष इस बारे में कोई बेहतर सलाह या सुझाव मोदी सरकार को देता। लेकिन हमेशा की तरह बिना किसी चर्चा या विमर्श के अब यूपीआई पर टैक्स लगाया जा रहा है।
पाठक जानते हैं कि यूपीआई भारतीय संस्थानों और बैंकों द्वारा ऑनलाइन लेन-देन के लिए बनाई गई भुगतान व्यवस्था है। वहीं 'मर्चेंट डिस्काउंट रेट' यानी एमडीआर वह शुल्क है, जो व्यापारी डिजिटल भुगतान व्यवस्था पूरी करने के लिए बैंकों और पेमेंट प्रोवाइडर्स को देता है। अब तक इस एमडीआर पर कोई शुल्क नहीं लगता था। लेकिन नए यूपीआई नियम के बाद व्यक्ति-से-व्यापारी (पर्सन टू मर्चेंट) यूपीआई लेन-देन पर 2,000 रुपए से ऊपर 0.4 प्रतिशत एमडीआर लगेगा।
गौर करने वाली बात यह है कि यूपीआई जिन कंपनियों के जरिए होता रहा है, उसमें अमेरिकी कंपनियां लंबे समय से भारत की शुल्क रहित एमडीआर नीति का विरोध करती रही हैं। फोन पे, गूगल पे जैसी कंपनियां चाहती रही हैं कि एमडीआर पर शुल्क लगे। जानकारी के लिए बता दें कि भारत में पेमेंट ऐप्स में फोन पे की बाजार में हिस्सेदारी 48.9 प्रतिशत है, गूगल पे की 37.7, पेटीएम की 8.3 और बाकी 3.6 प्रतिशत हिस्सेदारी रखते हैं। फोन पे में 72 प्रतिशत हिस्सेदारी अमेरिकी कंपनी वॉलमार्ट की है, वहीं गूगल पे तो पूरी तरह अमेरिका का ही है। अब भारत में इन कंपनियों को एमडीआर में शुल्क लगने से फायदा होगा, उनकी कमाई तो बढ़ेगी ही, उनके शेयरों की कीमतों में भी उछाल आ सकता है।
कांग्रेस का कहना है कि भारत में जो लोग पहले से ही महंगाई और बेरोज़गारी से जूझ रहे हैं, उन्हें अब अमेरिकी कंपनियों के फायदे के लिए और आर्थिक चोट पहुंचाई जा रही है। बता दें कि नोटबंदी के फौरन बाद पेटीएम के लेन-देन में एकदम से 435 प्रतिशत का उछाल देखा गया था, आठ नवंबर को नोटबंदी हुई थी और 10 नवंबर को पेटीएम ने नरेन्द्र मोदी की तस्वीर के साथ उन्हें साहसिक फैसले की बधाई देते हुए अखबारों में पूरे पन्ने का विज्ञापन दिया था। तब अरविंद केजरीवाल ने इसकी आलोचना करते हुए लिखा था कि सर्वथा शर्मनाक बताते हुए सवाल किया था कि क्या जनता अपने प्रधानमंत्री को इस तरह निजी कंपनियों के लिए मॉडल के तौर पर देखना चाहती है। वहीं राहुल गांधी ने तो पेटीएम को पेमेंट टू मोदी ही कहा था, तब उनके बयान की काफी आलोचना हुई थी। मीडिया ने इसे राहुल गांधी की नासमझी करार दिया था। उस समय नए नोटों में चिप छिपी है, ऐसी जानकारी देने वाले पत्रकार अब यूपीआई पर लगे शुल्क को लेकर क्या कहेंगे, कैसे अमेरिका के आगे झुकने वाले फैसले को सही करार देंगे, यह देखना होगा।


