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परंपरागत अनाजों के साथ पशुपालन भी

छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है। धान ही यहां की प्रमुख फसल है, जो बारिश की फसल है।

परंपरागत अनाजों के साथ पशुपालन भी
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  • बाबा मायाराम

छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है। धान ही यहां की प्रमुख फसल है, जो बारिश की फसल है। लेकिन कम पानी में विविध पौष्टिक अनाज भी हो सकते हैं, यह जन स्वास्थ्य सहयोग के प्रयोग ने दिखाया है। जन स्वास्थ्य सहयोग की जैविक खेती का प्रयोग किसानों में आकर्षण का केन्द्र है। यहां किसान, सामाजिक कार्यकर्ता और ग्रामीण खेतों की फसलें देखने, देसी बीज लेने और कृषि विधियों की जानकारी लेने के लिए आते रहते हैं। कृषि प्रदर्शनी, अस्पताल के मुख्य द्वार पर प्राय: लगी रहती है, जहां बीज और उनकी जानकारी उपलब्ध होती है।

हाल ही में मेरा छत्तीसगढ़ के बिलासपुर के पास गनियारी में जाना हुआ। यहां एक जन स्वास्थ्य सहयोग का मशहूर अस्पताल है, जहां कम कीमत में अच्छा इलाज होता है। यहां की खास बात यह भी है कि बीमारी के इलाज के साथ उससे बचाव और रोकथाम पर भी ध्यान दिया जाता है। इसके लिए जैविक खेती, पशु स्वास्थ्य कार्यक्रम भी संचालित किए जा रहे हैं। मैं यहां कई सालों से आता जाता रहा हूं। अप्रैल के माह में भी जाना हुआ था। आज यहां कृषि कार्यक्रम पर बात करना चाहूंगा, जिससे हम सेहत व स्वास्थ्य का अच्छा ख्याल रख सकें।

जन स्वास्थ्य सहयोग (जेएसएस) स्वास्थ्य पर काम करने वाली गैर-सरकारी संस्था है, जो यहां वर्ष 1999 से कार्यरत है। स्वास्थ्य की मौजूदा हालत से चिंतित होकर दिल्ली के कुछ मेधावी डाक्टरों ने इसकी शुरूआत की थी। जन स्वास्थ्य सहयोग केन्द्र, बिलासपुर से 20 किलोमीटर दूर गनियारी में स्थित है। यहां अस्पताल होने के साथ कृषि कार्यक्रम भी संचालित होता है। बीमारी के इलाज के साथ उसके बचाव और रोकथाम पर जोर दिया जाता है।

बिलासपुर जिले का यह इलाका जंगल से लगा है। अन्य जातियों के अलावा गोंड और बैगा आदिवासी यहां के बाशिन्दे हैं। बैगाओं की पहचान उनकी बेंवर खेती (झूम खेती और अंग्रेजी में इसे शिफ्टिंग कल्टीवेशन कहते हैं) से होती है, जिसमें वे कई तरह के अनाज एक साथ बोते थे। इसमें अनाज के साथ दालें भी होती थीं। यह खेती संतुलित व पर्याप्त भोजन देने में सक्षम थी। जन स्वास्थ्य सहयोग के खेत के अनाज भी आदिवासियों के पौष्टिक अनाज ही हैं।

यहां संस्था के खेतों में अभी गर्मी में कुटकी और मड़िया की खेती हो रही है। इसकी लहलहाती फसल को देखकर किसी का भी दिल उछल सकता है। हालांकि इस बार पानी की कमी के कारण खेतों में काम करने वाले कार्यकर्ता थोड़े परेशान दिखे। लेकिन फिर भी उनका उत्साह कम नहीं हुआ है, लगातार खेती की देखभाल व परवरिश कर रहे हैं।

जन स्वास्थ्य सहयोग के डॉक्टर कृषि कार्यक्रम का विशेष महत्व बताते हैं। उनका कहना है कि एक व्यक्ति के स्वास्थ्य और विकास के लिए संतुलित भोजन बहुत जरूरी है। पोषण का संबंध खेती से है। इसलिए स्वास्थ्य की स्थिति सुधारने के लिए हम कृषि कार्यक्रम चला रहे हैं। इसके लिए समय-समय पर जेवनार मेला भी आयोजित करते हैं। जहां परंपरागत भोजन व उसे तैयार करने की पद्धति भी बताई जाती है। जेवनार मेला जनसाधारण में काफी लोकप्रिय हो रहा है।

इस कृषि कार्यक्रम के दो हिस्से हैं। एक तो जन स्वास्थ्य सहयोग की जमीन पर विविध देसी बीजों की फसलें उगाना, उनकी जानकारी एकत्र करना, उन्हें संरक्षित करना, देसी बीज और उनकी जानकारी किसानों तक पहुंचाना। और दूसरा, किसानों के साथ मिलकर उनको जैविक खेती से जोड़ना, खेती के वैकल्पिक प्रयोग करना, कार्यशालाओं, बैठकों और कृषि प्रदर्शनी के माध्यम से किसानों तक यह जानकारी पहुंचाना और उन्हें जैविक खेती के लिए प्रोत्साहित करना। खास बात यह है कि यहां जो भी फसलें उगाई जाती हैं, पूरी तरह बिना रासायनिक खाद के और जैविक तरीके से उगाई जाती हैं। मिट्टी-पानी के संरक्षण के साथ बोई जाती हैं।

जन स्वास्थ्य सहयोग का समृद्ध देसी बीज बैंक है। उसमें धान के गेहूं, मड़िया ( रागी) और सेमी की किस्में हैं। इसके अलावा, बैंगन, भिंडी, दलहन, तिलहन, अलसी, तिली, सेमी की देसी किस्में हैं। विविध धान किस्मों में महीन, सुगंधित, भूरी, हरी, काली और लाल चावल शामिल हैं। इनमें जल्दी पकने वाली और देर से पकने वाली किस्में शामिल हैं।

कृषि कार्यक्रम के कार्यकर्ता होमप्रकाश साहू कहते हैं कि खेतों में श्री पद्धति से बुआई की जाती है। इसमें बीज की मात्रा कम लगती है और खेत में पानी भरकर भी नहीं रखा जाता, जिससे पौधे को अच्छी हवा, प्रकाश और भरपूर ऊर्जा मिलती है और पैदावार अच्छी होती है। इस पद्धति को मेडागास्कर पद्धति के नाम से भी जाना जाता है। यह प्रयोग गर्मी में इसलिए किया गया क्योंकि बारिश में ज्यादा पानी में ये फसलें सड़ जाती हैं, इन्हें कम पानी की जरूरत है।

उन्होंने बताया था कि मड़िया को पकने में 120-125 दिन लग जाते हैं। यह इसलिए भी उपयोगी है क्योंकि छत्तीसगढ़ में अब गर्मी में धान की फसल लेने का प्रचलन शुरू हुआ है,जो ज्यादा पानी मांगती है। यह फसलें कम पानी वाली हैं और गर्मी के धान का अच्छा विकल्प है।

होमप्रकाश साहू आगे कहते हैं कि हमारे ये पौष्टिक अनाज लोगों को पोषणयुक्त भोजन देंगे, जो गर्मी में कम पानी में पक जाते हैं। इनमें सब्जी की तरह ही पानी चाहिए। धान की तरह खेतों में पानी भरकर रखने की जरूरत नहीं हैं। जंगल और ग्रामीण इलाकों में पोषण की बहुत कमी है। यह बहुत ही पौष्टिक फसलें हैं, इनमें लौह तत्व, कैल्शियम,रेशे सभी पोषक तत्व होते हैं। कई बीमारियों से बचाव करते हैं।

इसी प्रकार, पशु स्वास्थ्य कार्यक्रम से जुड़े महेश शर्मा बताते हैं कि यह कार्यक्रम करीब 50 गांवों में चल रहा है। इस कार्यक्रम के लिए 7 पशु स्वास्थ्य कार्यकर्ता हैं, जिनका चयन गांव के समुदायों द्वारा किया गया है। कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण दिया गया है। शुरूआत में पशु स्वास्थ्य के प्रशिक्षण में पुणे की अंतरा संस्था और इसी नाम की एक अन्य हैदराबाद की संस्था ने सहयोग दिया था। संस्था के प्रशिक्षणकर्ता एक साल तक जन स्वास्थ्य सहयोग में आए और स्थानीय कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित किया था।

वे आगे बताते हैं कि पूर्व में हमने स्थानीय जड़ी-बूटियों की परंपरागत चिकित्सा पद्धति से मवेशियों का इलाज किया। उस समय महिला पशु स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद में इस कार्यक्रम से युवाओं को प्रशिक्षण दिया गया, जो वर्तमान में कार्यरत हैं।

पशुओं का महत्व पोषण, आजीविका की दृष्टि से है, साथ ही जन स्वास्थ्य सहयोग ने लघु गोबर गैस प्लांट को भी प्रोत्साहित किया है। आज रसोई गैस के संकट के चलते इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। शुरूआत में संस्था के कार्यकर्ता होमप्रकाश साहू और बम्हनी के ग्रामीण ने इस प्लांट को लगाया है। यह दोनों प्लांट बहुत अच्छे से संचालित हैं। इस प्लांट में मवेशियों के गोबर के उपयोग से रसोई गैस चलती है। इससे जो जैव खाद बनती है, उसे वे किचिन गार्डन व खेतों में उर्वरा शक्ति बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करते हैं। इस प्लांट की लागत भी 7-8 हजार रूपए हैं। और इसे सरलता से बनाया जा सकता है।

छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है। धान ही यहां की प्रमुख फसल है, जो बारिश की फसल है। लेकिन कम पानी में विविध पौष्टिक अनाज भी हो सकते हैं, यह जन स्वास्थ्य सहयोग के प्रयोग ने दिखाया है। जन स्वास्थ्य सहयोग की जैविक खेती का प्रयोग किसानों में आकर्षण का केन्द्र है। यहां किसान, सामाजिक कार्यकर्ता और ग्रामीण खेतों की फसलें देखने, देसी बीज लेने और कृषि विधियों की जानकारी लेने के लिए आते रहते हैं। कृषि प्रदर्शनी, अस्पताल के मुख्य द्वार पर प्राय: लगी रहती है, जहां बीज और उनकी जानकारी उपलब्ध होती है। पशुपालन भी खेती का ही हिस्सा है, जिसकी छत्तीसगढ़ में अच्छी समृद्ध परंपरा रही है।

कुल मिलाकर, यह कहा जा सकता है कि ऐसे ही प्रयोगों से मिट्टी पानी के संरक्षण वाली देसी खेती बचेगी, लुप्त हो रहे देसी बीज बचेंगे, छत्तीसगढ़ की कृषि संस्कृति बचेगी, खाद्य सुरक्षा होगी, जैव विविधता भी बचेगी और लोगों को भी पोषणयुक्त भोजन मिलेगा।


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