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अमेरिका की निगाह ईरान पर

ईरान में दिसंबर 2025 के आखिरी दिनों में आर्थिक संकट से भड़का आंदोलन अब सत्ता के खिलाफ खुले विद्रोह में बदल चुका है

अमेरिका की निगाह ईरान पर
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ईरान में दिसंबर 2025 के आखिरी दिनों में आर्थिक संकट से भड़का आंदोलन अब सत्ता के खिलाफ खुले विद्रोह में बदल चुका है। ईरान की सड़कों पर इस समय भयावह मं•ार है। एक तरफ सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के ख़िलाफ़ सड़कों पर उबाल जारी है, तो वहीं प्रदर्शनकारियों को आतंकवादी करार देते हुए उन्हें कुचला जा रहा है। लेकिन यह केवल आंतरिक हिंसा नहीं है, बाहर से अमेरिका इस आग में घी डालने का काम लगातार कर रहा है। डोनाल्ड ट्रंप भले खुद को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए सबसे योग्य मानें, असल में वे युद्ध अपराधों और मासूमों की जान लेने के दोषी ठहराए जाने चाहिए। वेनेजुएला पर तो ट्रंप अपना दावा ठोंक ही चुके हैं, अभी उन्होंने एक तस्वीर भी जारी की है, जिसमें वो खुद को वेनेजुएला का कार्यवाहक राष्ट्रपति दिखा रहे हैं। किसी देश की संप्रभुता और सम्मान के साथ ऐसा मजाक आधुनिक सभ्यता में नहीं किया जा सकता। लेकिन ट्रंप सभ्यता, कूटनीति और नैतिकता के तकाजों को मानते ही नहीं हैं। उन्हें केवल मुनाफे की परिभाषा समझ आती है। ट्रंप ने वेनेजुएला के बाद ग्रीनलैंड हड़पने की चेतावनी दी है। उत्तर अमेरिका और आर्कटिक के बीच बसा ग्रीनलैंड ट्रंप को अपने लिए सामरिक महत्व का लगता है, लेकिन केवल इस वजह से उस पर कब्जे की इजा•ात नहीं दी जा सकती। ग्रीनलैंड डेनमार्क का अर्द्धस्वायत्त वाला देश है, यहां के लोग खुद अपना शासन चलाते हैं लेकिन विदेश नीति और सेना डेनमार्क के पास है। डेनमार्क ने साफ चेतावनी दी है कि अगर ट्रंप ने ग्रीनलैंड पर सैन्य कार्रवाई की, तो नाटो खत्म हो जाएगा। फ्रांस, इटली, जर्मनी जैसे बाकी देश भी अब ट्रंप से सावधान हो चुके हैं। जब अमेरिका की पूंजीवादी विस्तारवादी नीति एशिया या अफ्रीका के देशों को अपनी चपेट में लेती रही, तो ये यूरोपीय देश लोकतंत्र और उदारवाद के नाम पर अमेरिका का साथ देते आए। मगर अब खुद उन पर आंच आनी शुरु हुई तो उन्हें समझ आ रहा है कि-

लगेगी आग तो आएंगे घर कई जद में,

यहां पे सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है।।

-राहत इंदौरी।

बहरहाल, यूरोपीय देशों को जो खतरा अब दिख रहा है, ईरान से उसे पहले ही भांप लिया था। हालांकि इसमें ईरानी शासन की अपनी खामियां भी हैं, लेकिन उसे अपने स्तर पर सुधरने का मौका दिया जाना चाहिए, न कि इसमें बाहरी ताकतों का दखल होना चाहिए। इस समय ईरान में आर्थिक संकट से खड़े हुए आंदोलन के बाद तख्तापलट का खतरा बढ़ गया है। पिछले साल 28 दिसंबर को शुरू हुए जनआंदोलन में अब तक 5 सौ से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं और 10 ह•ाार से ज्यादा लोग बंदी बनाए गए हैं। 1979 में हुई इस्लामिक क्रांति के बाद 47 साल में ऐसा आंदोलन कभी नहीं देखा गया। हालांकि इस बीच महसा अमीनी की मौत के बाद महिला अधिकारों को लेकर 2022 में आंदोलन हुआ था, लेकिन उसकी प्रकृति अलग थी।

इन विरोध प्रदर्शनों पर ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा है कि आतंकवादियों ने न केवल नागरिकों बल्कि सुरक्षा बलों को भी निशाना बनाया है, जिनका उद्देश्य देश को अस्थिर करना है। उनका यह भी कहना है कि सुरक्षाबलों ने जरूरत पड़ने लायक ही कार्रवाई की है। वहीं डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी कि अगर प्रदर्शनकारियों को मारा जाता है, तो वह '•ाोरदार हमला करेंगे'। ट्रंप ने कहा कि वह 'वहीं चोट देंगे, जहां सबसे ज़्यादा दर्द होगा'।' यह सड़कछाप भाषा ईरान का तेल हथियाने और उसके परमाणु कार्यक्रम बंद कराने के लिए है। पिछले साल इजरायल के जरिए एक बार यह कोशिश अमेरिका कर चुका है। इस बार ईरान के लोगों का ही इस्तेमाल किया जा रहा है। ट्रंप ने साफ कहा है कि अमेरिका ईरानी शासन का विरोध करने वालों की मदद के लिए तैयार है। हालांकि ईरान ने इसके जवाब में कहा है कि अगर ऐसा होगा, तो वो क्षेत्र में अमेरिकी सहयोगियों और उसके हितों पर हमला करेगा।

इस बीच, ईरान के निर्वासित क्राउन प्रिंस रजा पहलवी ने प्रदर्शनकारियों से सड़कों पर डटे रहने की अपील की है। 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद रेजा पहलवी के पिता ट्ठू शाह पहलवी को सत्ता से हटा दिया गया था। अब ट्ठू पहलवी निर्वासन में रहकर आंदोलन को नेतृत्व करने की कोशिश कर रहे हैं। इस बार पहलवी परिवार की वापसी की मांग वाले नारे भी सुने जा रहे हैं, इससे संकेत मिल रहे हैं कि कहीं ईरान में अपनी पिट्ठू सरकार बनाने की तैयारी तो अमेरिका की नहीं है।

इधर ईरान में प्रदर्शन रोकने के लिए सरकार ने इंटरनेट ब्लैकआउट का सहारा लिया है, लेकिन यह कितना कारगर होगा, कहा नहीं जा सकता। अयातुल्लाह खामेनेई को सबसे पहले आर्थिक संकट दूर करने के उपाय तलाशने होंगे। ईरान की कमाई का सबसे बड़ा जरिया कच्चा तेल है। लेकिन अमेरिका और पश्चिमी देशों ने पहले से ही ईरान पर कई तरह के प्रतिबंध लगा रखे हैं। इससे ईरानी मुद्रा रियाल काफी गिरकर एक डॉलर के मुकाबले 14 लाख रियाल तक पहुंच चुकी है। प्रतिबंधों के कारण ईरान अन्य जरियों से अपना तेल सस्ते में बेचने पर मजबूर है। खरीदारों को आकर्षित करने के लिए अक्सर कार्गो पर छूट दी जाती है, फिर तेल को बिचौलियों और गुमनाम फर्मों के माध्यम से ले जाया जाता है। इन्हें अनाधिकृत टैंकरों में भरकर समुद्र के बीच में जहाज-से-जहाज ट्रांसफर जैसी जुगाड़ वाली तरकीबों से बेचा जाता है, इस वजह से काफी सस्ते में सौदा करना पड़ता है।

ईरान ओपन डेटा के मुताबिक मार्च 2025 तक एक साल के दौरान ईरान ने तेल निर्यात से लगभग 23.2 बिलियन डॉलर कमाए। यही तेल अगर वैध तरीकों से बिकता तो 28 बिलियन डॉलर से अधिक की आय ईरान को हो सकती थी। अमेरिकी और पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के कारण ईरान की जीडीपी में हर साल 0.6. प्रतिशत की गिरावट आई है। वहीं करीब 1 करोड़ ईरानी गरीबी का शिकार हैं। ये सारे आंकड़े 2020 तक के हैं, इसके बाद छह सालों में हालात और बिगड़ चुके हैं। आर्थिक संकट बर्दाश्त से बाहर हुआ तो लोग सड़कों पर उतर आए और अब अमेरिका को दखल का मौका मिल रहा है। उसे रोकने के लिए ईरान सरकार जल्द से जल्द आर्थिक सुधार लागू करे और साथ ही धार्मिक कट्टरता कम करके उदार और प्रगतिशील साथियों की मदद ले, उसी से पूंजीवादी गिद्धों को दूर रखा जा सकेगा।


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