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अमर्त्य सेन को नोटिस, अब यही बचा था

पिछले साल अगस्त में नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) पर चिंता व्यक्त करते हुए चेतावनी दी थी कि यदि इस प्रक्रिया को संवेदनशीलता से नहीं संभाला गया तो बड़ी संख्या में गरीब और हाशिए पर रहने वाले लोग मताधिकार से वंचित हो सकते हैं

अमर्त्य सेन को नोटिस, अब यही बचा था
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पिछले साल अगस्त में नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) पर चिंता व्यक्त करते हुए चेतावनी दी थी कि यदि इस प्रक्रिया को संवेदनशीलता से नहीं संभाला गया तो बड़ी संख्या में गरीब और हाशिए पर रहने वाले लोग मताधिकार से वंचित हो सकते हैं। श्री सेन ने उस नौकरशाही प्रक्रिया की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाया था जो नागरिकों से सख्त दस्तावेजी साक्ष्य मांगती है, जबकि शायद उनके पास वे दस्तावेज उपलब्ध न हों। उन्होंने कहा था कि 'प्रशासनिक प्रक्रियाएं और समय-समय पर संशोधन आवश्यक हैं, लेकिन ये मौलिक अधिकारों की कीमत पर नहीं होने चाहिए। अमर्त्य सेन ने कहा था कि कई लोगों के पास दस्तावेज नहीं हैं। कई लोग वोट नहीं दे सकते... अगर हालात को थोड़ा सुधारने के नाम पर कई लोगों को नुकसान पहुंचाया जाता है, तो यह एक गंभीर गलती बन जाती है, सिर्फ एक गलती को सुधारने के लिए सात नयी गलतियां करना जायज नहीं ठहराया जा सकता।'

एसआईआर पर ऐसी नकारात्मक टिप्पणी पहली बार नहीं हुई थी, देश का विपक्ष लगातार इन्हीं सवालों को उठाते आया है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने तो बाकायदा वोटर अधिकार यात्रा ही इस मुद्दे पर निकाल दी और साथ ही चुनाव आयोग के सामने वोट चोरी के सबूत भी पेश किए। जिस पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने राहुल गांधी को हलफनामा दाखिल करने कहा। अमर्त्य सेन से ऐसी कोई मांग नहीं की गई, लेकिन उन्हें प.बंगाल की एसआईआर प्रक्रिया के दौरान नोटिस भेजकर आयोग के सामने पेश होने कहा गया।

जी हां, नरेन्द्र मोदी के राज में अब ये भी मुमकिन है कि नोबेल पुरस्कार से सम्मानित व्यक्ति को नाम की वर्तनी गलत होने के नाम पर चुनाव आयोग नोटिस भेज सकता है। जब एक नोबेल विजेता और विश्व विख्यात नागरिक के साथ भारत सरकार का सलूक ऐसा है, तो फिर आम आदमी के लिए वह कितनी हेय दृष्टि रहती है, इसका अंदाज लगाया जा सकता है। प.बंगाल में एसआईआर को लेकर कई किस्म के विवाद सामने आ रहे हैं। सत्तारुढ़ टीएमसी ने दावा किया है कि बूढ़े और बीमार लोगों तक को चुनाव आयोग नोटिस भेजकर परेशान कर रहा है। आरोप है कि कम से कम 70 लोगों की मौत इस प्रक्रिया की वजह से हो चुकी है। ये बेहद गंभीर बात है और सुप्रीम कोर्ट इन मौतों पर स्वत: संज्ञान लेकर नए सिरे से चुनाव आयोग से पूछताछ करेगा ऐसी उम्मीद है। बहरहाल, आम लोगों को परेशान करने और अकाल मौतों के आरोपों के बीच एक नया विवाद अमर्त्य सेन को नोटिस जारी करने पर खड़ा हो गया। टीएमसी महासचिव अभिषेक बनर्जी ने इस पर सवाल उठाए तो चुनाव आयोग ने इसे टाइपो की गलती बताया और नोटिस जारी करने वाले बीएलओ को सस्पेंड कर दिया। हालांकि कायदे से इसमें ज्ञानेश कुमार को दो पंक्ति का ही सही लेकिन खेद प्रकट करना चाहिए था।

तृणमूल कांग्रेस ने सही कहा कि अमर्त्य सेन को नोटिस जारी करना बंगाल और भारत को वैश्विक पहचान दिलाने वाले एक महान व्यक्तित्व का अपमान है। अभिषेक बनर्जी ने कहा कि अमर्त्य सेन को दिया गया नोटिस दर्शाता है कि कैसे बंगाल में प्रभावशाली आवाजों को व्यवस्थित रूप से निशाना बनाया जा रहा है। इससे पहले अभिनेता देव और क्रिकेटर मोहम्मद शमी को भी नोटिस भेजे गए थे। मानो उपलब्धि, ईमानदारी और गरिमा का अब कोई महत्व ही नहीं रह गया हो। नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने भारत की बौद्धिक संपदा और मूल्यों को विश्व मंच पर पहुंचाया। आज, उनके कद का एक सार्वजनिक व्यक्ति भी भाजपा नियंत्रित चुनाव आयोग के हाथों अपमानित हो रहा है।

ध्यान रहे कि नोबेल पुरस्कार विजेता की दिवंगत माता अमिता सेन, 2002 में बंगाल में हुए एसआईआर (जनगणना) के दौरान मतदाता सूची में थीं। अमर्त्य सेन ने 2014 में बंगाल में मतदाता के रूप में पंजीकरण कराया था और उसी वर्ष लोकसभा चुनाव में मतदान किया था। जब राज्य में एसआईआर प्रक्रिया 4 नवंबर को शुरू हुई, तो सेन के नाम से एक एसआईआर जनगणना प्रपत्र जारी किया गया। उनके चचेरे भाई संताभानु सेन ने भरा हुआ प्रपत्र बीएलओ (राज्य परिवहन अधिकारी) को जमा कर दिया। एसआईआर में अमर्त्य सेन के नाम की वर्तनी में अंतर पाया गया था। इसी पर नोटिस भेजा गया। हालांकि अब चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि सेन को गलती सुधारने के लिए बीरभूम जिले के बोलपुर स्थित निर्धारित कार्यालय में उपस्थित होने की आवश्यकता नहीं है। आयोग ने कहा कि एक बीएलओ (चुनाव अधिकारी) हार्वर्ड के अर्थशास्त्री सेन के पैतृक निवास शांति निकेतन स्थित प्रतीची जाकर आवश्यक कार्रवाई करेगा। चुनाव आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि बूथ लेवल ऑफिसर को मतदाता सूची में नाम की वर्तनी जैसी छोटी गलतियों को सुधारने का अधिकार है। इसलिए अमर्त्य सेन के मामले में भी सुधार प्रशासनिक स्तर पर ही किया जाएगा।

बता दें कि आयोग ने निर्देश दिए हैं कि मतदाता सूची में किसी भी तरह की विसंगति से जुड़े नोटिस तुरंत डाउनलोड कर चार से पांच दिनों के भीतर संबंधित मतदाताओं तक पहुंचाए जाएं। इस काम में किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। इस निर्देश के हिसाब से तो बीएलओ ने सही कार्रवाई की, लेकिन उसे सस्पेंड किया गया, जबकि यहां असल जिम्मेदारी ज्ञानेश कुमार की है। और केवल बंगाल ही नहीं, इससे पहले बिहार में जो विसंगतियां पाई गईं, और अब उत्तरप्रदेश की मसौदा सूची में जो गड़बड़ी सामने आ रही है, सब पर ज्ञानेश कुमार को जवाब देना चाहिए।

उप्र में छह जनवरी को जो वोटर लिस्ट सत्यापन की सूची आई है, उसमें 2.89 करोड़ (18 प्रतिशत) नाम कट गए हैं। ड्राफ्ट लिस्ट में 46.23 लाख मृत, 2.17 करोड़ लोग स्थानांतरित और 25.47 लाख डुप्लीकेट वोटर शामिल हैं। पहले प्रदेश में 15.44 करोड़ वोटर थे, अब 12.55 करोड़ मतदाता बचे हैं। इस सूची पर विपक्ष फिर सवाल उठा रहा है कि आखिर पौने तीन करोड़ मतदाता अगर योग्य थे ही नहीं तो अब तक चुनाव आयोग को इसका पता क्यों नहीं चला। आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने गहरी आपत्ति जताते हुए कहा है कि 18 प्रतिशत नाम कटने का मतलब है कि प्रदेश में हर पांचवां वोटर लिस्ट से बाहर हो गया है। वहीं उन्होंने एक चौंकाने वाला तथ्य सामने रखा है कि राज्य निर्वाचन आयोग यानी जो ग्रामीण क्षेत्रों में चुनाव कराता है बीडीसी के जिला पंचायत सदस्य के और ग्राम प्रधानों के चुनाव जो कराता है उसने बीते महीने दिसंबर में ही एक सूची तैयार की जिसके मुताबिक उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में 12 करोड़ 70 लाख वोट है। लेकिन जनवरी की एसआईआर लिस्ट बताती है कि कुल 12 करोड़ 55 लाख मतदाता हैं। तो सवाल ये है कि करीब-करीब 4 करोड़ शहरी मतदाता कहां चले गए? कैसे उनके नाम जोड़े जाएंगे? यह वाकई गंभीर सवाल है, जिस पर चुनाव आयोग को सफाई देनी चाहिए।

कांग्रेस नेता गुरदीप सप्पल और उनके पूरे परिवार का नाम भी एसआईआर में बाहर हो गया, क्योंकि उन्होंने अपना घर बदला था। क्या घर बदलना और घुसपैठिया होना एक ही है, जिस वजह से मतदान के अधिकार से वंचित किया जा रहा है।

एसआईआर की गड़बड़ियां चुनाव आयोग में चल रही गड़बड़ियों को ही उजागर कर रही है। क्या ज्ञानेश कुमार इस पर जवाब देंगे।


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