महंगे जूतों में भी हवाई यात्रा मुश्किल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में 2017 में शिमला में क्षेत्रीय कनेक्टिविटी योजना उड़ान (उड़े देश का आम नागरिक) की शुरुआत की थी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में 2017 में शिमला में क्षेत्रीय कनेक्टिविटी योजना उड़ान (उड़े देश का आम नागरिक) की शुरुआत की थी। सरकार इस योजना के जरिए क्षेत्रीय संपर्क को बढ़ावा देना चाहती थी। इस योजना के तहत एक घंटे तक की उड़ान के लिए किराया 2500 रुपए से ज्यादा नहीं होगा, ऐसा बताया गया था। खुद प्रधानमंत्री मोदी ने उड़ान का ऐलान करते हुए कहा था कि उनका सपना है कि- 'हवाई चप्पल पहनने वाला भी हवाई जहाज में यात्रा कर सके'।
यह जुमला भी दो करोड़ रोजगार और हर खाते में 15 लाख जैसा हिट हो गया था। हालांकि अब दस साल पुरानी बात को याद करने का क्या फायदा। क्योंकि मोदी ने हवाई चप्पल वालों के लिए सपना ही तो देखा था, उसे पूरा करने की कई शर्त तो वैसे भी नहीं थी। हवाई चप्पल वाले कहते ही भारतीय समझ जाते हैं कि बात गरीबों की हो रही है। तो गरीबों के लिए मोदी ने जो सपना देखा था, वो कतई पूरा नहीं हो सका, बल्कि गरीब तो ट्रेनों में भी बड़ी मुश्किल से अब सफर कर पाते हैं, क्योंकि किराए बढ़ चुके हैं। दूसरी तरफ जिन लोगों के पैरों में महंगे जूते-चप्पल हैं, उनके लिए भी हवाई यात्रा करना इस समय नामुमकिन बना दिया गया है।
त्योहार के मौसम में एक तरफ ट्रेनों में आरक्षित सीट मिलना दूभर है, दूसरी तरफ घरेलू हवाई टिकटों की कीमत आसमान छू रही है। इसी तकलीफ को लेकर एक जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हुई। जिसमें हवाई किराये में 700 प्रतिशत तक की वृद्धि का आरोप लगाते हुए अदालत से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की गई थी। लेकिन सोमवार 2 नवंबर को याचिका का उल्लेख किए जाने पर जस्टिस विक्रमनाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस अपरेश कुमार सिंह की पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील से कहा, मत करिए हवाई यात्रा। चलिए आगे बढ़िए, अगला केस।
यह जवाब काफी सुना-सुना सा लगता है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी तो प्याज महंगी होने पर कहा था कि मैं प्याज नहीं खाती। संक्षेप में आम जनता के लिए संदेश यही है कि अगर आपको खाने-पीने की चीजें महंगी लग रही हैं, तो मत खाइए। सरकारी अस्पताल में सुविधा नहीं है तो निजी अस्पताल जाइए, वहां भी इलाज महंगा लगे तो बीमार बने रहिए। स्कूल महंगे लगें तो बच्चों को मत पढ़ाइए। टिकट महंगी है तो विमान से नहीं ट्रेन से जाइए, उसमें भी तकलीफ है तो जहां हैं, वहीं रहिए, भले त्योहार रहे या किसी गम अथवा खुशी में अपने परिवार के पास जाना हो, मन मारिए और सफर मत करिए। मतलब यही कि आपकी यात्रा, खान-पान, इलाज, शिक्षा, मनोरंजन, साफ हवा-पानी, अच्छी सड़क ये सब सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, आप सरकार की जिम्मेदारी नहीं हैं। अपना इंतजाम खुद करिए।
मोदी सरकार ने ऐसा लोकतंत्र बना दिया है जिसमें लोक और तंत्र दोनों दृश्य से गायब होते जा रहे हैं।
बेशक महंगी विमान यात्रा पर दायर मूल जनहित याचिका पर 16 नवंबर की तारीख सुनवाई के लिए तय है, जो सामाजिक कार्यकर्ता एस. लक्ष्मीनारायण की तरफ से दायर की गई है। लेकिन तब तक दिवाली, भाई दूज और छठ पूजा के दौरान होने वाली अधिकांश त्योहार यात्राएं पूरी हो चुकी होंगी। इसलिए उसी लंबित जनहित याचिका के हिस्से के रूप में इस आवेदन को अदालत में लगाया गया। मूल याचिका में विमानन क्षेत्र में पारदर्शिता, यात्रियों के हितों की सुरक्षा और हवाई किराये में अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए नियामक व्यवस्था बनाने की मांग की गई है। लेकिन अभी अदालत से मांग की गई थी कि मामले को तत्काल सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाए और मौजूदा त्योहारों के मौसम में हवाई किराये पर अस्थायी सीमा निर्धारित की जाए। याचिकाकर्ता के वकील अदालत में कहा कि हवाई यात्रा एक आवश्यक सेवा है और किराये में इतनी भारी बढ़ोतरी संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और कानून के समान संरक्षण की गारंटी देता है। आवेदन में 29 अक्टूबर की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया है कि दिल्ली से कोलकाता का टिकट, जिसकी सामान्य कीमत लगभग 10,000 से 11,000 रुपये होती है, 6 नवंबर की यात्रा के लिए 78,694 रुपये तक पहुंच गया। वहीं बेंगलुरु-दिल्ली का किराया जो रुपए 15,901 होता था वो दोपहर में रुपए 40,506 जा पहुंचा। मुंबई-दिल्ली का किराया रुपए 11,531 से सीधे 60,577 जा पहुंचा है, जबकि दिल्ली-मुंबई का किराया रुपए 5,223 से सीधे 26,793 जा पहुंचा है।
विमानन कंपनियां हवाई किराये में बढ़ोतरी के लिए एविएशन टर्बाइन फ्यूल यानी विमान ईंधन की बढ़ती कीमतों को जिम्मेदार बताती रही हैं। महंगे ईंधन के कारण कुछ बढ़ोतरी तो उचित हो सकती है, लेकिन इससे सामान्य किराये के मुकाबले सात गुना तक कीमत बढ़ाना गलत है।
आवेदन में रेलवे, आवश्यक दवाओं और बिजली की कीमतों का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि इन क्षेत्रों में कीमतों पर नियामक नियंत्रण मौजूद है। लेकिन हवाई यात्रा के मामले में त्योहारों के दौरान किराये में कई गुना वृद्धि पर प्रभावी नियंत्रण नहीं है। याचिकाकर्ता ने कहा कि हवाई परिवहन को आवश्यक सेवा के रूप में देखा जाता है। ऐसे में सरकार इस सेवा की कीमतों को पूरी तरह अनियंत्रित नहीं छोड़ सकती।
लेकिन अब जबकि इस मामले में दो टूक जवाब अदालत की तरफ से आ गया तो सरकार भी अब बेफिक्री से यात्रियों की परेशानी को अनदेखा करती रहेगी। हालांकि केंद्र सरकार ने 1 नवंबर को भारतीय वायुयान नियम, 2026 अधिसूचित किए हैं। जो 1 जनवरी 2027 से प्रभावी होंगे। नए नियमों में सरकार को असाधारण परिस्थितियों में जनहित को ध्यान में रखते हुए विमानन कंपनियों के किराये के संबंध में निर्देश जारी करने का अधिकार दिया गया है। नियम 192 के तहत निर्धारित विमानन सेवाएं संचालित करने वाली कंपनियों को परिचालन लागत सहित विभिन्न कारकों के आधार पर किराया निर्धारित करना होगा और किराये से संबंधित जानकारी डीजीसीए को देनी होगी। लेकिन 2027 तक तो विमानन कंपनियां मनमाना किराया वसूलती ही रहेंगी, ऐसे आसार है।
पिछले साल की शुरुआत में प्रयागराज कुंभ के वक्त भी ऐसी ही महंगी टिकटें हुई थीं तो कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी ने राज्यसभा में इस पर सवाल उठाते हुए बताया था कि लंदन की टिकट 24,000 रुपये में मिल जाती है, लेकिन चेन्नई से प्रयागराज के लिए टिकट 53000 रुपये से अधिक और बेंगलुरु से 51,000 रुपये है। तब तत्कालीन सभापति जगदीप धनखड़ ने कहा था सनातन के लिए पाचनशक्ति थोड़ी बढ़ाइए।
तो बस वैसा ही हाल अब तक चल रहा है। सब कुछ जनता को ही करना है, सरकार तो केवल भाषण देने के लिए है।


