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एआई समिट नयी चुनौतियां

सोमवार 16 फरवरी से नयी दिल्ली में भारत एआई इम्पैक्ट समिट 2026 की शुरुआत हुई, जो 20 फरवरी तक चलेगी।

एआई समिट नयी चुनौतियां
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सोमवार 16 फरवरी से नयी दिल्ली में भारत एआई इम्पैक्ट समिट 2026 की शुरुआत हुई, जो 20 फरवरी तक चलेगी। एआई पर यह दुनिया का अब तक का सबसे बड़ा कार्यक्रम है, जिसमें कम से कम 20 देशों के राष्ट्रप्रमुख, 50 से ज्यादा मंत्री और 40 से ज्यादा बड़े सीईओ हिस्सा लेने आ रहे हैं। गूगल के सुंदर पिचाई, ओपन एआई के सैम ऑल्टमैन, एंथ्रोपिक के डेरियो अमोडी, माइक्रोसॉफ्ट के ब्रैड स्मिथ, एडोब के शांतनु नारायण जैसे तकनीकी क्षेत्र के दिग्गजों के अलावा फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और ब्राजील के राष्ट्रपति लुला दा सिल्वा भी इसमें शामिल हो रहे हैं।

इन तमाम बड़ी हस्तियों की एक साथ एक बैनर के नीचे उपस्थिति यह बता रही है कि दुनिया ने एक बड़े बदलाव की तरफ कदम बढ़ा लिया है, जो ऊपरी तौर पर केवल तकनीकी से जुड़ा नजर आता है, लेकिन असल में इसका असर जिंदगी के हर हिस्से पर पड़ना शुरु हो चुका है। एआई यानी आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस या कृत्रिम बुद्धिमत्ता अब हर क्षेत्र में दिखाई देने लगी है। विज्ञान, शिक्षा, चिकित्सा, कृषि, व्यापार हर जगह अब एआई का सहयोग लिया जा रहा है। दशकों तक भू राजनैतिक आकलन बंद दरवाजों के पीछे विदेशी राजनयिकों और जांच एजेंसियों के भरोसे होता रहा, क्योंकि सरकारी दस्तावेज और अंदरूनी खबरों तक इन्हीं की पहुंच होती थी। थिंक टैंक्स, रिस्क एनालिस्ट्स (जोखिम विश्लेषकों) या मीडिया के आकलन सब राजनयिकों और जांच एजेंसियों के सूत्रों पर निर्भर होते थे। लेकिन अब एआई ने यह परिदृश्य भी बदल दिया है। अब एआई की मदद से विभिन्न देशों में लिए जा रहे फैसलों, सेटेलाइट छवियों, आयात-निर्यात, पूंजी का प्रवाह, मीडिया में चलाई जा रही खबरों सब पर निगाह रखने के साथ तुरंत ही उसका विश्लेषण भी किया जा रहा है। नतीजा ये है कि एक देश के हालात का असर दूसरे देश पर पड़ने में पहले जितना वक्त लगता था, अब वो कुछ पलों में सिमट चुका है।

ऐसे महत्वपूर्ण समय परिदृश्य में भारत में इस एआई समिट के होने के खास मायने हैं, क्योंकि दुनिया इसे ग्लोबल साउथ की बढ़ती ताकत के नजरिए से देख रही है। औपनिवेशिक दासता से मुक्त देश तीसरी दुनिया कहलाते रहे हैं, अब एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका के ऐसे तमाम देश ग्लोबल साउथ का हिस्सा कहलाते हैं। ग्लोबल साउथ एक भौगोलिक शब्द न होकर भू-राजनीतिक और आर्थिक धारणा है। एआई समिट का भारत में होना तीसरी दुनिया के उन तमाम देशों के लिए भी महत्वपूर्ण हो गया है, जिनके डेटा तक वैश्विक शक्तियों की पहुंच है। इन देशों के राजनैतिक, आर्थिक फैसलों पर वैश्विक शक्तियां इसी डेटा की मदद से प्रभाव डालती हैं। और इसमें एआई की मदद ली जाती है।

ऐसे में इस समिट के दौरान कुछ बड़े सवाल सामने आ रहे हैं, जैसे क्या भारत बड़ी वैश्विक शक्तियों के सामने अपने डेटा को सुरक्षित रखने के लिए आवाज़ उठा सकेगा, क्योंकि राहुल गांधी ने संसद में और बाद में भी एआई के खतरों और संभावनाओं दोनों को खुल कर सरकार के सामने रखा है। राहुल ने कहा, एआई क्रांति आ गई है, जो खतरे और मौके दोनों लेकर आ रही है। आईटी और सर्विसेज सेक्टर, हमारी अर्थव्यवस्था का चमकता सितारा है वो खतरे में है। अगर हम आने वाले तूफान के लिए तैयार नहीं हुए तो हजारों सॉफ्टवेयर इंजीनियर और प्रोफेशनल अपनी रोजी-रोटी खो देंगे लेकिन हमारे पास मौके भी हैं। राहुल गांधी ने कहा, डेटा वो पेट्रोल है जो एआई इंजन को चलाता है। जैसा कि मैंने संसद में कहा था कि भारत की सबसे बड़ी संपत्ति हमारे शानदार लोग हैं और वह बहुत सारा डेटा जो हम बनाते हैं। राहुल ने एआई समिट की मेजबानी पर कहा कि यह भारत के लिए नेतृत्व दिखाने का एक मौका होना चाहिए था, यह दिखाने का कि 1.4 बिलियन लोगों का देश अपने डेटा का इस्तेमाल करके ग्लोबल एआई फ्यूचर को अपनी शर्तों पर कैसे बना सकता है। लेकिन बेबस प्रधानमंत्री मोदी ने ट्रेड डील में अमेरिका के 'चोकहोल्डÓ के आगे समर्पण कर दिया है। राहुल ने देश को सावधान करते हुए कहा कि 'भारत में 1.5 बिलियन भारतीयों का डेटा सुरक्षित रूप से स्टोर करना', 'अपने सोर्स कोड और एल्गोरिदम में पारदर्शिता लाना', 'हमारे डेटा का इस्तेमाल करके होने वाले मुनाफे पर टैक्स लगाना मुश्किल होगी।'

राजनैतिक पूर्वाग्रह से ऊपर उठकर राहुल गांधी की इस बात पर ध्यान देने की जरूरत है। क्योंकि अभी भारत को यह देखना है कि हमारा आईटी सेक्टर एआई के इस दौर के लिए कब पूरी तरह तैयार होगा। चैट जीपीटी जैसे बड़े लार्ज लैंग्वेज मॉडल भारत को खुद बनाने चाहिए, या छोटे-छोटे सेक्टर जैसे कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा के लिए खास एआई टूल पर फोकस करना चाहिएÓ एआई को चलाने के लिए बहुत सारे डेटा सेंटर चाहिए, जो बिजली और पानी बहुत इस्तेमाल करते हैं। क्या इससे पर्यावरण को नुकसान होगा?

ऐसे कई सवालों पर इस समिट में चर्चा हो, तभी इसकी सार्थकता है। वैसे भारत सरकार ने इरादा जताया है कि एआई सिर्फ बड़े देशों का खेल न रहे, बल्कि सभी देशों के लिए फायदेमंद हो।

इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी सेक्रेटरी एस कृष्णन ने कहा है कि हमारा ध्यान 'पीपल, प्लैनेट और प्रोग्रेस' पर है। यानी एआई ऐसे बने जो आम लोगों की समस्याएं हल करे, पर्यावरण को नुकसान न पहुंचाए और प्रगति करे। वहीं इंडिया एआई मिशन के सीईओ अभिषेक सिंह ने कहा, 'अभी एआई कुछ ही देशों में बनता है और बाकी दुनिया सिर्फ इस्तेमाल करती है। अगर डेटा सबको शामिल न करे तो एआई में पक्षपात झलकने लगता है। इसलिए समिट में एआई को लोकतांत्रिक बनाने पर जोर है।

बता दें कि इससे पहले 2023 में ब्रिटेन के ब्लेटचली पार्क में एआई सेफ्टी समिट हुआ, जहां 28 देशों ने एआई के खतरों पर ब्लेटचली घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए थे। 2024 में सियोल में समिट हुआ, जिसमें नवाचार और सबको शामिल करने पर बात हुई। 2025 में पेरिस के एआई एक्शन समिट में आर्थिक फायदों पर जोर दिया गया था, लेकिन अब उसे लोकतांत्रिक बनाने की बात कही जा रही है। देखना होगा कि भारत इस मुहिम में कामयाब होता है या नहीं। क्योंकि देश में तकनीकी को लेकर जिस व्यापक पैमाने पर जागरुकता आनी चाहिए, उसका पूरी तरह अभाव है। कॉलेजों में भजन क्लबिंग के आयोजन हो रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी भी एआई की गंभीरता को दरकिनार कर हमारे यहां बच्चा सबसे पहले आई बोलता है, जैसे बेतुके बयान दे चुके हैं। ऐसे में इतने बड़े आयोजन से सरकार क्या केवल अपना प्रचार देश-दुनिया में करवाना चाहेगी, या तकनीकी की संभावनाओं और वास्तविक खतरों को समझ कर देश हित में फैसले लेगी, ये देखना होगा।


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