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पहलगाम का एक साल

जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में ठीक एक साल पहले आतंकवादियों ने अंधाधुंध गोलियां बरसा कर 26 लोगों की हत्या कर दी थी।

पहलगाम का एक साल
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जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में ठीक एक साल पहले आतंकवादियों ने अंधाधुंध गोलियां बरसा कर 26 लोगों की हत्या कर दी थी। 14 फरवरी 2019 के पुलवामा हमले के बाद यह एक और बड़ी आतंकी वारदात थी, जिसमें जांच एजेंसियों की नाकामी और सुरक्षा में बड़ी लापरवाही सामने आई थी। पुलवामा हमले में भी सरकार आज सात बाद भी इस सवाल का जवाब नहीं दे पाई है कि सैनिकों को वायुमार्ग की जगह सड़क मार्ग से क्यों भेजा गया।

बड़ी संख्या में विस्फोटक सामग्री लेकर एक कार किस तरह उस इलाके में पहुंच गई। जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील राज्य में इतना सारा विस्फोटक आ गया और जांच एजेंसियों को पता तक नहीं चला, इतनी बड़ी चूक कैसे हुई। बल्कि इन सवालों को उठाने वाले तत्कालीन राज्यपाल सत्यपाल मलिक के साथ मोदी सरकार का सलूक किस कदर निर्दयी रहा, यह भी देश ने देख लिया। ठीक ऐसे ही सवाल पहलगाम हमले के बाद भी उठे कि जिस बैसरन घाटी में बड़ी संख्या में पर्यटक मौजूद थे, वहां एक भी सुरक्षाकर्मी क्यों नहीं था।

बंदूकों के साथ चार-चार आतंकवादी पहुंचते हैं, गोलियां बरसाते हैं, इस बीच स्थानीय दुकानदारों और घोड़ेवालों की मदद से लोग जान बचाने की कोशिश करते हैं और फिर जाकर सुरक्षाकर्मी पहुंचते हैं, यह सब क्या लचर प्रशासन को नहीं दिखाता है। याद रहे कि 2016 की नोटबंदी के वक्त प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि इससे आतंकवाद की कमर टूटेगी, तो क्या टूटी कमर लेकर आतंकवाद ने दो-दो बार अपना घिनौना रूप नहीं दिखा दिया। 2019 में जम्मू-कश्मीर को दो हिस्सों में बांटकर और पूर्ण राज्य से केंद्रशासित प्रदेश बनाने के पीछे भी मोदी सरकार ने तर्क दिया था कि आतंकवाद पर लगाम लगेगी और राज्य के विकास में मदद होगी। लेकिन पहलगाम घटना के बाद लंबे वक्त तक पर्यटन उद्योग पूरी तरह ठप्प रहा, यह कड़वा सच सरकार अच्छे से जानती है और उस पर बात नहीं करती।

अलबत्ता पहलगाम हमले के फौरन बाद जाति और धर्म की राजनीति भाजपा ने शुरु कर दी। आतंकियों ने धर्म पूछकर मारा, जाति नहीं, इस किस्म के सोशल मीडिया पोस्ट हुए। जब विरोध हुआ तो इन्हें हटाया गया। फिर ऑपरेशन सिंदूर होने की जानकारी देश को मिली, इस पर सारे विपक्ष ने भी सरकार का साथ दिया कि सीमा पार से आतंकवाद फैलाने की कोशिश का सबक पाकिस्तान को सिखाना ही चाहिए। पूरी मुहिम का सिंदूर नाम रखने पर भी इसे अच्छी पहल बताया गया कि जिन महिलाओं का सुहाग उजड़ा, उन्हें भरोसा मिलेगा कि दुख में उन्हें अकेला नहीं छोड़ा गया।

पाकिस्तान के साथ व्यापारिक रिश्ते रोकने, सिंधु जल समझौता निलंबित करने जैसे कदम भी उठाए गए। लेकिन फिर यकायक ऑपरेशन सिंदूर रोका गया और देश को इसकी जानकारी डोनाल्ड ट्रंप ने पहले दी, बाद में प्रधानमंत्री ने दी। ट्रंप आज भी दावा करते हैं कि युद्धविराम उन्होंने करवाया और नरेन्द्र मोदी उनका नाम लेकर खंडन भी नहीं करते। ऑपरेशन सिंदूर पर दुनिया में अपना पक्ष मजबूत करने के लिए सर्वदलीय प्रतिनिधि मंडल सरकार ने भेजा, उसमें भी विपक्ष ने उनका साथ दिया। लेकिन यह भी जनता के पैसे पर सैर-सपाटे से ज्यादा कुछ नहीं निकला। देश ने देखा कि कैसे दूतावास में बैठकर प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों ने शानदार रात्रिभोज और उसमें गाना-बजाना किया। यही सब करना था, तो देश में कर लेते। विदेशों में तो वैसे भी भारतीय दूतावास बने हुए हैं, जिनका काम देश का पक्ष मजबूत करना ही है। बहरहाल, पहलगाम पीड़ितों के जख्मों पर इतना नमक छिड़कना काफी नहीं था कि इसके बाद पाकिस्तान के साथ कई बार क्रिकेट मैच भी खेला गया। दिखावे के लिए यह देश के बाहर हुआ और पाक टीम से हाथ न मिलाने की नाटक-नौटंकी भी हुई, उन्हें चिढ़ाने के लिए बयान दिए गए। लेकिन आखिर में तो सबको पता था कि क्रिकेट से मिलने वाले मुनाफे में सबका हिस्सा बना हुआ है। बीसीसीआई हो या आईसीसी सब जगह मोदी सरकार, भाजपा के लोग शामिल हैं।

पाकिस्तान को अलग-थलग करेंगे सरकार के इस दावे की हकीकत ये है कि आज पाकिस्तान की मध्यस्थता में ईरान और अमेरिका के बीच शांति वार्ता करवाने से लेकर युद्धविराम का ऐलान तक सब किया गया है। प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ और उनके सेनाध्यक्ष जनरल आसिम मुनीर पिछले एक साल में कई बार डोनाल्ड ट्रंप से मिले भी हैं और फोन पर बात भी की है। बल्कि इन दोनों को ट्रंप ने बाकायदा व्हाइट हाउस में लंच भी करवाया है। अभी 21 तारीख को ही आसिम मुनीर ने फिर ट्रंप से बात की और उसके बाद शाहबाज शरीफ ने बताया कि ईरान के साथ युद्धविराम बढ़ा दिया गया है। पाकिस्तान की इस कोशिश की चर्चा पूरी दुनिया में है और यूरोपीय यूनियन या खाड़ी देशों समेत तमाम देशों के प्रमुखों ने शाहबाज शरीफ से बात की है।

कड़वा सच यही है कि जिस पाकिस्तान को बरसों बरस पूर्व प्रधानमंत्रियों ने वैश्विक स्तर पर सवालों के घेरे में रखा, आज उसकी पूछ-परख की जा रही है और हम अपने जख्मों को अब तक सहला रहे हैं। लेकिन इसमें भी नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी की सोच में फर्क दिख रहा है। श्री मोदी ने अपनी श्रद्धांजलि में लिखा कि 'पिछले साल इसी दिन पहलगाम में हुए भयावह आतंकी हमले में जान गंवाने वाले निर्दोष लोगों को याद करता हूं। उन्हें कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। मेरी संवेदनाएं शोक संतप्त परिवारों के साथ हैं, जो इस दुख से उबरने की कोशिश कर रहे हैं। एक राष्ट्र के रूप में, हम शोक और दृढ़ संकल्प में एकजुट हैं। भारत आतंकवाद के किसी भी रूप के आगे कभी नहीं झुकेगा। आतंकवादियों के घिनौने मंसूबे कभी सफल नहीं होंगे।'

वहीं राहुल गांधी ने लिखा 'पहलगाम में पिछले वर्ष हुए कायरतापूर्ण आतंकी हमले में शहीद हुए सभी वीरों को मैं भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं।

भारत उनका बलिदान और उनके परिवारों की पीड़ा को न कभी भूलेगा, और न ही इस कायराना कृत्य के दोषियों को कभी माफ करेगा।

बेरहमी से छीने गए मासूम जिंदगियों की याद आज भी हमारे दिलों को झकझोरती है। शहीदों के परिवारों का दु:ख हम सब का दु:ख है। देश के उन बेटों की शहादत भारत की आत्मा में सदा अमिट रहेगी।

आतंकवाद और हिंसा के खिलाफ पूरा देश एकजुट था, है और हमेशा रहेगा।

नफरत और डर फैलाने वाली ताकतों के सामने भारत कभी नहीं झुकेगा - हम और अधिक मजबूती, एकता और संकल्प के साथ इसके विरुद्ध खड़े रहेंगे।

जय हिंद।

नरेन्द्र मोदी की पोस्ट में एक सतहीपन और औपचारिकता दिखी, जबकि राहुल गांधी ने समूचे देश की तरफ से शहीदों के परिजनों के दुख को साझा किया है। जख्म इसी तरह भरते हैं।


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