आदिवासी छात्रों के हित में सही फैसला
एक झारखंड से और दूसरा महाराष्ट्र से। संयोग से दोनों जगह राहुल गांधी ही सरकारों के बरक्स जनता के साथ खड़े दिखे।

जनप्रतिनिधि जब जनता के हितों को प्राथमिकता देते हुए उनके हक की आवाज़ उठाएं, जब सशक्त विपक्ष अपनी जिम्मेदारी निभाए और इंसाफ की लड़ाई में जनता के साथ खड़ा रहे तो हालात किस तरह बदलने शुरु होते हैं, इसके दो उदाहरण हाल ही में सामने आए हैं। एक झारखंड से और दूसरा महाराष्ट्र से। संयोग से दोनों जगह राहुल गांधी ही सरकारों के बरक्स जनता के साथ खड़े दिखे। झारखंड में कांग्रेस सत्ता में झारखंड मुक्ति मोर्चा के साथ है, बावजूद इसके जब वहां पेपर लीक और भर्ती में गड़बड़ियों के खिलाफ 24 दिनों लंबा छात्र आंदोलन चला तो राहुल गांधी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को चिट्ठी लिखकर आंदोलनकारियों की मांगों पर ध्यान देने कहा, जिसके बाद आंदोलन खत्म हुआ। अब ऐसी ही एक चिट्ठी राहुल गांधी ने महाराष्ट्र में भाजपानीत सरकार के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस को लिखी। जिसमें आदिवासी छात्रावासों के लिए बने नियमों पर छात्रों की आपत्ति पर राहुल गांधी ने ध्यान दिलाया। इस का नतीजा भी सकारात्मक ही रहा। देवेन्द्र फड़नवीस की सरकार ने छात्रावासों के लिए बनाए संशोधित नियमों को वापस ले लिया है।
दरअसल महाराष्ट्र सरकार ने 5 अगस्त को आदिवासी छात्रावासों के लिए नए नियम लागू किए थे। इसमें छात्रावास में रहने के लिए अधिकतम उम्र 26 साल तय की गई। बाद में 14 अगस्त को सरकार ने नियम बदलकर उम्र सीमा 26 से बढ़ाकर 30 साल कर दी थी। इसके बाद छात्रों का विरोध शुरू हुआ।
पुणे के मांजरी स्थित आदिवासी छात्रावास में आदिवासी छात्रों का आंदोलन 13 अगस्त से शुरू हुआ था। इस आंदोलन में बड़ी संख्या में छात्र शामिल हुए। पहले छात्रों ने धरना शुरू किया और बाद में कुछ छात्र अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठ गए। जिसमें कुछ छात्रों की तबीयत बिगड़ने की भी जानकारी सामने आई थी। छात्रों की मुख्य मांगों में 30 साल की उम्र सीमा खत्म करना, छात्रावास की सुविधाओं में सुधार और आदिवासी छात्रों से जुड़े पुराने मुद्दों का समाधान शामिल था।
छात्रों का कहना था कि 30 साल की सीमा उन आदिवासी छात्रों को छात्रावास से बाहर कर देगी, जो देर से पढ़ाई शुरू करते हैं या 30 साल के बाद उच्च शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। एक बड़ा सवाल आदिवासी बहुल इलाके गढ़चिरौली के आदिवासी छात्रावास से सामने आया, जहां की छात्राओं ने आरोप लगाया था कि लंबी छुट्टी से लौटने पर उन्हें गर्भवती होने की जांच कराने के लिए मजबूर किया जाता था। पुणे में 22 अगस्त को राहुल गांधी के छात्रों की गूंज कार्यक्रम में भी एक छात्रा ने ऐसे सवालों को उठाया था। छात्रा के मुताबिक, जब उन्होंने प्रशासन से इसकी वजह पूछी तो जवाब दिया गया कि इतने दिन बाहर रहने के दौरान कहीं उन्हें कोई जानलेवा बीमारी तो नहीं हो गई। 'छात्रों की गूंज' के दौरान छात्राओं ने बताया कि छात्रावासों में 30 वर्ष की अनावश्यक उम्र सीमा, अपमानजनक नियम, असुरक्षित सुविधाएं और महिलाओं के लिए गर्भावस्था जांच जैसे अमानवीय प्रावधान लागू हैं।
इसके बाद ही राहुल गांधी ने देवेन्द्र फड़नवीस को पत्र लिखा था। जिसमें उन्होंने आदिवासी छात्रों के छात्रावासों और आश्रम शालाओं की बदहाली पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि छात्र कई दिनों से भूख हड़ताल पर हैं, छात्रावास में खाने की गुणवत्ता खराब है और सफाई व सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं हैं।
राहुल गांधी ने गढ़चिरौली की एक आश्रमशाला का भी जिक्र किया, जहां कुछ दिन पहले सांप के काटने से तीन बच्चियों की मौत हुई थी। राहुल ने दावा किया कि राज्य में 28 आदिवासी छात्र सांप के काटने की घटनाओं में जान गंवा चुके हैं। उन्होंने सरकार से सवाल किया कि क्या आदिवासी छात्रों को हॉस्टल और आश्रम शालाओं में सांप-बिच्छुओं से भी सुरक्षा नहीं दी जा सकती। राहुल गांधी ने अपनी चिट्ठी में यह भी आरोप लगाया कि 30 साल से कम उम्र के आदिवासी छात्रों को छात्रावासों में प्रवेश नहीं दिया जा रहा है। इसके अलावा उन्होंने दावा किया कि लंबी छुट्टी के बाद लौटने वाली छात्राओं का प्रेग्नेंसी टेस्ट कराया जाता है। राहुल ने इसे आदिवासी छात्राओं के साथ अन्याय बताते हुए सरकार से कार्रवाई की मांग की। राहुल गांधी ने लिखा था कि सुदूर गांवों-कस्बों से आने वाले ये छात्र कोई दान नहीं, अपना अधिकार मांग रहे हैं। अपेक्षा है कि आप उनसे व्यक्तिगत रूप से मिलकर उनकी समस्याओं का तत्काल समाधान करेंगे।
हालांकि इस चिट्ठी पर राहुल गांधी के आरोपों पर महाराष्ट्र सरकार में आदिवासी विकास मंत्री अशोक उइके ने पलटवार करते हुए राहुल गांधी पर बिना पूरी जानकारी के मुद्दा उठाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी पहले होमवर्क नहीं करते और बाद में झूठ का मंच सजाते हैं। श्री उइके ने कहा कि पुणे में राहुल गांधी का कार्यक्रम होने से पहले ही आदिवासी छात्रों का आंदोलन खत्म हो चुका था और सरकार उनकी समस्याओं का समाधान कर चुकी थी। वहीं प्रेग्नेंसी टेस्ट के आरोप को भी मंत्री ने पूरी तरह गलत बताया। उन्होंने कहा कि लंबे समय तक छुट्टी पर रहने वाली छात्राओं का मेडिकल परीक्षण किया जाता है, लेकिन इसमें प्रेग्नेंसी टेस्ट नहीं किया जाता।
लेकिन मंत्री महोदय के तमाम दावे के बाद अब महाराष्ट्र सरकार ने आदिवासी छात्रावास में रहने के लिए 30 साल की उम्र सीमा खत्म कर दी है। अशोक उईके ने बताया कि देवेंद्र फडणवीस की मंजूरी के बाद 14 अगस्त का सरकारी प्रस्ताव और उससे जुड़े संशोधित नियम वापस ले लिए गए हैं। सरकार ने अपने ही बनाए नियमों को अगर जनहित देखते हुए वापस लिया है, तो इसमें कोई बुराई नहीं है, बल्कि यह अच्छी बात है कि समय रहते आदिवासी छात्रों की पीड़ा को सुना और समझा गया। हालांकि मूल सवाल अब भी बना हुआ है कि देश में शिक्षा व्यवस्था कब दुरुस्त होगी। सरकार आदिवासियों को मुख्यधारा का हिस्सा बनाने और उनके विकास के लिए दावे तो ढेर सारे करती है, लेकिन अगर नयी पीढ़ी के आदिवासी शिक्षा के लिए अब भी संघर्ष करेंगे तो किस तरह देश का सर्वांगीण विकास होगा।


