पत्रकारिता के लिए नया सबक
दिल्ली, मुंबई, पटना, प्रयागराज, पुणे तमाम शहरों से बेहद सुंदर तस्वीरें सामने आईं, जिन्होंने साबित किया कि देश में लोकतंत्र अभी मरा नहीं है।

पिछले सवा महीनों से नयी पीढ़ी के जोश से गुलजार जंतर-मंतर अब शांत है। लेकिन पेपर लीक के खिलाफ जिस आंदोलन की शुरुआत हुई, उससे अब देश की सियासत से लेकर समाज तक बड़ी हलचल खड़ी हो चुकी है। दिल्ली, मुंबई, पटना, प्रयागराज, पुणे तमाम शहरों से बेहद सुंदर तस्वीरें सामने आईं, जिन्होंने साबित किया कि देश में लोकतंत्र अभी मरा नहीं है। लोकतंत्र की जो नयी धड़कनें आंदोलन में सुनाई दीं, उन से अब सत्ता और सत्तापोषित मीडिया दोनों के लिए चेतावनी है कि वे संभल जाएं और ईमानदारी से अपनी जिम्मेदारी निभाएं।
दो दिन फ्रेंड्स कहकर इंस्टाग्राम पर संदेश देने वाले प्रधानमंत्री ने जब रविवार देर रात तक कोई संदेश नहीं दिया, तो समझ आ गया कि वे पूरे खोखलेपन के साथ नयी पीढ़ी को संबोधित कर रहे थे। प्रधानमंत्री मोदी जब इंटरनेट, मेट्रो सेवाएं, स्विगी-जोमैटो, ओला-उबर-रैपिडो सब कुछ बंद करने के बाद भी आंदोलन में शामिल होने के लिए लोगों को जंतर-मंतर तक पहुंचने से नहीं रोक सके। जब धर्म, जाति, भाषा, लिंग सारे भेदभावों को हवा में उड़ाकर दिन-रात लोग एकजुटता के साथ सरकार के विरोध में डटे रहे। जब लाठी चार्ज, बैरिकेडिंग, पानी की बौछार, विश्वविद्यालयों के आंदोलन में शामिल न होने के फरमान, झूठे मुकदमों, पासपोर्ट रद्द करने की धमकी जैसे दमनकारी उपाय भी लोगों की हिम्मत को नहीं तोड़ पाए, तो मोदी को लगा कि इस नयी पीढ़ी से इसी की शैली में संवाद किया जाए, तो ये लोग समझ जाएंगे। मगर यहां भी मोदी को डबल झटका लगा। नयी पीढ़ी ने उनकी फ्रेंड रिक्वेस्ट को पूरी तरह हवा में उड़ा दिया। ऊपर से उनके कैमरा एंगल को लेकर सोशल मीडिया पर खूब फजीहत भी हुई। इसलिए मोदी शायद तीसरे दिन फ्रेंड्स बोलने से और कोई संदेश देने से बचे। हालांकि धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा लेकर उन्होंने जंतर-मंतर से आंदोलन तो खत्म करवा दिया है, बस इसी से उन्हें थोड़ी राहत मिल सकती है। लेकिन इसके बावजूद अब मोदी चैन से बैठ पाएंगे, इसकी गारंटी नहीं है। पिछले बारह सालों की उनकी राजनीतिक चतुराई और सत्ता पर बने रहने की कला को इस बार सबसे बड़ी चुनौती मिली है, वो भी सीधे नयी पीढ़ी की तरफ से। जो न गोदी मीडिया के एजेंडे पर कान धरती है, न सरकारी दबाव की उसे परवाह है।
दरअसल भाजपा के विभाजनकारी एजेंडे को मीडिया के बड़े हिस्से ने लगातार खाद-पानी दिया। इससे तथाकथित पत्रकारों की और उनके मालिकान की दुकानदारी खूब फली-फूली और सत्ता के जरिए लोकतंत्र और संविधान को कुचलने के काम में भाजपा को आसानी हुई। पिछले बारह सालों में अनगिनत बार इस बात पर चिंता जताई जाती रही कि जो खुद को मुख्यधारा का मीडिया कहता है, वहां मुख्य मुद्दे यानी जनता के हित से जुड़े मुद्दे बिल्कुल गायब हैं। बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य की बदहाली इन सब पर कोई चर्चा नहीं होती और हर बात में हिंदू-मुसलमान एंगल खड़ा कर दिया जाता है। खुद विपक्षी दल सरेआम कई पत्रकारों को कह चुके कि आप मोदी के मित्र उद्योगपतियों और भाजपा के लिए काम करते हैं। निष्पक्ष खबरें नहीं दिखाते और हमारी खबरों को गायब करते हैं। राहुल गांधी, अखिलेश यादव जैसे नेताओं के तो कई बयान सोशल मीडिया पर हैं, जिनमें वे मीडिया पर तंज कसते हैं। लेकिन इसके बावजूद विपक्षी दलों ने ऐसे मीडिया का पूरी तरह से बहिष्कार नहीं किया, जिसने पेशेवर बेईमानी की। बल्कि विपक्षी नेताओं के घरों और दफ्तरों में ऐसे लोगों का खूब सत्कार हुआ, जिन्होंने झूठ और चापलूसी को पत्रकारिता का नाम दिया। नयी पीढ़ी यानी जेन ज़ी यहां भी समझदारी दिखा गई।
जंतर-मंतर पर बाकायदा एक दीवार पर कुछ ऐसे पत्रकारों की तस्वीरें लगा कर उन पर क्रॉस बना दिया, जिन्होंने मोदी सरकार की चाटुकारिता में कोई कमी नहीं छोड़ी और देश में नफरत फैलाने में अपना भरपूर सहयोग किया। खुद को सेलिब्रिटी मानने वाले इन पत्रकारों को यह सब देखकर शर्म आई या नहीं, कहा नहीं जा सकता। क्योंकि जब आंदोलनकारियों को पीटा जा रहा था, जब निर्दोषों का दमन हो रहा था, तब भी ये लोग किसी भी तरह सरकार का बचाव करने में लगे थे। किसी ने नैरेटिव चलाया कि आंदोलन की विदेशी फंडिंग हो रही है, किसी ने साबित करने की कोशिश की कि आंदोलनकारियों ने ही पुलिस को पीटा, वो असामाजिक तत्व हैं। यही सब किसान आंदोलन और शाहीन बाग आंदोलन में भी हुआ था। उन्हें खालिस्तानी, पाकिस्तान और चीन से प्रायोजित, सोरोस का एजेंडा न जाने क्या कुछ कहा गया। नयी पीढ़ी यह सब देख रही थी, इसलिए जब उस पर ऐसे ही आरोप लगे तो उसने अपने तरीके से जवाब दिया। दिल्ली से लेकर देश के बाकी हिस्सों तक आंदोलन की खबरों को लेकर यू ट्यूब और अन्य सोशल मीडिया मंचों से होने वाली स्वतंत्र पत्रकारिता पर ही भरोसा किया गया। गोदी मीडिया का तो अघोषित प्रवेश निषेध ही कर दिया गया। कई अमीर चैनलों के रईस पत्रकारों ने बिना माइक आईडी के खबरों को कवर किया, क्योंकि उन्हें अपने बेइज्जती का डर था। हालांकि इन्हीं अमीर चैनलों के मध्यमवर्गीय रिपोर्टरों को काफी कष्ट झेलना पड़ा।
महाराष्ट्र में ही ज़ी न्यूज के कपिल राउत नाम के रिपोर्टर का एक वीडियो खूब वायरल हुआ। जिसमें आंदोलनकारी उन्हें लूज़र-लूज़र कहकर चिढ़ाने लगे और वे चुपचाप यह ज़िल्लत सहते रहे। उनकी बेटी ने यह देखा और उसे स्वाभाविक तौर पर बुरा भी लगा। हालांकि बाद में इन्हीं कपिल राउत को बहुत से लोगों ने सॉरी कहा, उनके सामने अपने गलत व्यवहार की माफी मांगी। कपिल राउत भी समझते ही होंगे कि यह गुस्सा उनके लिए बल्कि उनके संपादकों और मालिकान के लिए था।
पत्रकारिता के पाठ्यक्रम में पेपर लीक विरोधी आंदोलन में मीडिया की भूमिका, गोदी मीडिया पत्रकारों से हुआ सलूक, सोशल मीडिया की ताकत ऐसे तमाम बिंदुओं पर अब विस्तार से चर्चा होनी चाहिए, ताकि भावी पत्रकारों को सही सबक और सीख मिले। पुराने कई पत्रकार तो मठाधीश की तरह व्यवहार करने लगे हैं, जो अपने दंभ में न कुछ नया सीखना चाहते हैं, न अपना परिष्कार करना चाहते हैं।


