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मोदी सरकार की विदेश नीति की बड़ी नाकामी

7 और 8 अप्रैल की आधी रात को जब भारत के लोग सो रहे थे, उस समय वैश्विक व्यवस्था में बदलाव की एक बड़ी करवट ली जा चुकी थी

मोदी सरकार की विदेश नीति की बड़ी नाकामी
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7 और 8 अप्रैल की आधी रात को जब भारत के लोग सो रहे थे, उस समय वैश्विक व्यवस्था में बदलाव की एक बड़ी करवट ली जा चुकी थी। 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिका और इजरायल के छेड़े गए युद्ध को अब अगले दो सप्ताह तक रोकने के लिए ईरान और अमेरिका के बीच सहमति बन गई है। खास बात यह है कि युद्धविराम का यह ऐलान उस समय हुआ जब ट्रंप की तरफ से दी गई समयबद्ध चेतावनी की सीमा खत्म होने में दो घंटे ही बचे थे। ईरान के समयानुसार बुधवार सुबह तीन बजे तक का वक्तडोनाल्ड ट्रंप ने दिया था कि ईरान उनकी बात मान ले, वर्ना वे ईरान के बिजलीघरों, पुलों और सड़कों पर भारी बमबारी करवाएंगे। ट्रंप ने सीधे-सीधे ईरान को तबाह करने की चेतावनी दी थी। ईरान के लोगों ने भी हिम्मत दिखाते हुए बिजलीघरों और पुलों के सामने मानवश्रृंखला बना ली थी कि वे ऐसे किसी भी बड़े हमले में कुर्बानी के लिए तैयार हैं, लेकिन समझौता करने के लिए नहीं। लेकिन 1 बजे के करीब युद्धविराम का ऐलान हो गया।

इस बड़ी घटना को कालानुक्रम में देखिए- 7 और 8 अप्रैल की रात 12:46 बजे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ट्रंप और ईरान से 2 हफ्ते के लिए युद्धविराम अनुरोध एक पोस्ट पर किया।

बुधवार सुबह 4:02 बजे ट्रंप ने पोस्ट किया कि - 'पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और फील्ड मार्शल असीम मुनीर के साथ बातचीत के बाद मैं आज रात ईरान पर हमला रोक रहा हूं। ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग को खोलने को तैयार हो गया है।

4:41 को ईरान के विदेश मंत्री ने पोस्ट किया कि- इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान की ओर से, मैं क्षेत्र में युद्ध को समाप्त करने के अथक प्रयासों के लिए अपने प्रिय भाइयों महामहिम पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शरीफ और महामहिम फील्ड मार्शल मुनीर के प्रति आभार और सराहना व्यक्त करता हूं। मैं ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की ओर से घोषणा करता हूं: यदि ईरान के खिलाफ हमले रोक दिए जाते हैं, तो हमारी शक्तिशाली सशस्त्र सेनाएं अपने रक्षात्मक अभियान बंद कर देंगी।

5:20 बजे शाहबाज शरीफ ने पोस्ट में लिखा अत्यंत विनम्रता के साथ, मुझे यह घोषणा करते हुए खुशी हो रही है कि ईरान और अमेरिका तत्काल प्रभाव से युद्धविराम पर सहमत हो गए हैं। मैं इस बुद्धिमान पहल का हार्दिक स्वागत करता हूं और दोनों देशों के नेतृत्व के प्रति गहरी कृतज्ञता व्यक्त करता हूं। अब बातचीत के आधार पर एक निर्णायक समझौते के लिए शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026 को दोनों देश के प्रतिनिधिमंडलों को इस्लामाबाद में आमंत्रित करता हूं।

अब शुक्रवार को यह दो हफ्तों का युद्धविराम स्थायी युद्धविराम में बदलेगा या फिर नए सिरे से हमलों की शुरुआत होगी, फिलहाल कहा नहीं जा सकता। लेकिन अभी जो 15 दिनों की शांति की बात हुई है, उसमें भी दुनिया ने राहत की सांस ली है, क्योंकि इस जंग की तपिश में पूरी दुनिया झुलस रही थी। ईरान की तरफ से दिए गए 10 बिंदुओं के प्रस्ताव पर ही ट्रंप चर्चा के लिए तैयार हो गए हैं, यह भी ईरान के लिए बड़ी जीत के संकेत हैं। क्योंकि उसने अपने बड़े नेताओं को खोने के बावजूद आखिरी तक हथियार डालने से मना कर दिया। इस युद्धविराम प्रक्रिया में पाकिस्तान के साथ सऊदी अरब, तुर्किए और मिस्र भी लगे थे, लेकिन ईरान इन पर भरोसा नहीं कर पा रहा था। जिसके बाद चीन का आश्वासन आया और ईरान ने सहमति जताई। खुद ट्रंप ने कहा है कि चीन ने ईरान को बातचीत की मेज पर लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो सकती है।

इस पूरे घटनाक्रम को देखें तो समझ आता है कि जब दुनिया नयी व्यवस्था की तरफ बढ़ रही थी, भारत हिंदू-मुस्लिम के नशे में धुत्त था। ईरान पाकिस्तान को शुक्रिया कह रहा है, अमेरिका कह रहा है कि पाकिस्तान से चर्चा के बाद युद्ध रोका और पाकिस्तान ईरान और अमेरिका को धन्यवाद दे रहा है, इसमें कहीं भी भारत का नामोनिशान नहीं है, क्योंकि हमारी सरकार की प्राथमिकताएं बदल गई हैं। नरेन्द्र मोदी को बिना कुछ किए विश्वगुरु बनने का शौक है। उन्हें और उनके सलाहकारों को लगता है कि नेहरू-इंदिरा को कोसेंगे तो मोदी का कद ऊंचा हो जाएगा। वैश्विक नेताओं से जबरन गले मिलेंगे, फिजूल हँसी-ठट्टा करेंगे तो दुनिया में रुतबा बढ़ेगा। लेकिन कोरी लफ्फाज़ी और काम करने में क्या अंतर है, अब नजर आ रहा है। इस युद्धविराम से अमेरिका के अकेले महाशक्ति होने के दावे को बड़ा झटका लगा है, और इससे पहले युद्ध के दौरान जिस तरह यूरोप के कई देशों ने अमेरिका की हरकतों पर सवाल उठाए, उससे भी जाहिर हुआ कि अब अमेरिका की हर बात में हां में हां मिलाने के दिन चले गए हैं। दुनिया के कई देश अब अमेरिका के पिछलग्गू होने की जगह उसे साझीदार की तरह देख रहे हैं। अब पाकिस्तान भी कह सकता है कि अमेरिका ने उसकी बात सुनी। लेकिन भारत में मोदी सरकार ऐसा नहीं कह पाएगी। क्योंकि मोदी अब भी ट्रंप और नेतन्याहू के सामने दबे दिख रहे हैं।

जिस पाकिस्तान को मनमोहन सिंह सरकार ने आतंकवादी देश के तौर पर स्थापित कर दिया था वह मोदी सरकार की अक्षम विदेश नीति के कारण अंतरराष्ट्रीय महत्व हासिल कर रहा है और यहां मोदी समर्थक यही बता रहे हैं कि इस युद्ध से हमारा लेना-देना ही नहीं था तो हम बीच में क्यों पड़ें। हालांकि इस युद्ध के कारण ही देश में ऊर्जा संकट आया, महंगाई बढ़ी तो इससे कैसे हमारा लेना-देना नहीं था। इससे पहले भी जब पाकिस्तान की मध्यस्थता की बात आई थी तो एस जयशंकर ने इसे दलाली जैसा निकृष्ट काम बताया था, लगे हाथ विदेश मंत्री यह भी बता दें कि जब ट्रंप ने ऑपरेशन सिंदूर रुकवाने का दावा किया था, तो क्या ट्रंप ने तब दलाली की थी?

बहरहाल, अब अंतरराष्ट्रीय नक्शे में पाकिस्तान ने भारत से थोड़ी बढ़त बढ़ा ली है, ये हमारे लिए चिंता की बात होनी चाहिए और उसके साथ चीन का नाम भी युद्धविराम में आ रहा है, यह भी विचारणीय है। याद कीजिए कि राहुल गांधी ने पहले ही चेतावनी दी थी कि मोदी सरकार की विफल नीति के कारण पाकिस्तान और चीन एक साथ आएंगे और यह भारत के लिए बड़ा खतरा बन जाएंगे। अब राहुल की बात फिर सही साबित हो रही है। एक बड़ा डर भारत के सामने खड़ा हो गया है कि पाकिस्तान कश्मीर मुद्दे को अब अंतरराष्ट्रीय पटल पर ले जाने की पुरजोर कोशिश करेगा। जबकि अब तक हमारी मजबूत नीति के कारण उसे इसमें सफलता नहीं मिली थी। लेकिन मोदी शायद इसे भी मुमकिन कर दिखाएं। उनके समर्थक अब गंभीरता से विचार करें कि क्या ऐसे ही दिनों के लिए इन्हें सत्ता सौंपी थी?


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