लोककल्याणकारी दायित्व से पीछे हटती सरकार
एसआईआर के तहत मतदाता सूची से काटे गए लाखों नामों के बाद एक गंभीर आशंका बार-बार उठी कि क्या इन लोगों को नागरिक कहलाने का भी हक नहीं रहेगा।

एसआईआर के तहत मतदाता सूची से काटे गए लाखों नामों के बाद एक गंभीर आशंका बार-बार उठी कि क्या इन लोगों को नागरिक कहलाने का भी हक नहीं रहेगा। अब बिहार और बंगाल की भाजपा सरकारों ने इन आशंकाओं को सही साबित कर दिया है। बंगाल और बिहार की सरकारों ने कहा है कि जिनके नाम एसआईआर में कट चुके हैं, वे अपने राज्यों में सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं उठा पाएंगे। ज्ञात हो कि पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार ने सोमवार को अपनी पहली कैबिनेट बैठक की, जिसमें उसने घोषणा की कि राज्य में पिछली सरकारों की सभी सामाजिक योजनाएं जारी रहेंगी, साथ ही टीएमसी के शासन में जिन केंद्रीय कार्यक्रमों को रोका गया था, वे अब उपलब्ध होंगे। हालांकि बैठक में तय हुआ कि न्यायाधिकरणों के समक्ष जिन मतदाताओं के मामले विचाराधीन हैं, उन्हें फैसला होने तक वही सुविधाएं मिलती रहेंगी।
बैठक के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने कहा, 'सरकार के सभी सामाजिक कार्यक्रम, चाहे वे 30 साल पहले शुरू हुए हों या 10 साल पहले, जारी रहेंगे। हालांकि, अब ये सभी योजनाएं पारदर्शी प्रक्रिया के माध्यम से संचालित होंगी। किसी भी मृत व्यक्ति, अवैध घुसपैठिए या गैर-भारतीय व्यक्ति को राज्य के नागरिकों के लिए निर्धारित लाभों का लाभ उठाने की अनुमति नहीं दी जाएगी।Ó
वहीं बिहार में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कहा कि 'जिन लोगों के नाम बिहार की मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं, वे राशन और अन्य कल्याणकारी योजनाओं सहित किसी भी सरकारी लाभ के हकदार नहीं होंगे।Ó इसके बाद कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने सोशल मीडिया के जरिए सवाल पूछा है कि एसआईआर के नतीजों के आधार पर बिहार और पश्चिम बंगाल सरकारों के अनुचित निर्णयों के बाद, निम्नलिखित प्रश्न उठता है:
क्या मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने का आधार नागरिकता है?
या
मतदाता सूची में नाम दर्ज कराना ही नागरिकता का आधार है?
सर्वोच्च न्यायालय को इस प्रश्न पर विचार करना चाहिए।
वैसे तो माननीय अदालत से उम्मीद है कि वह श्री चिदंबरम के उठाए सवालों पर तत्काल विचार करे। क्योंकि आजादी के बाद संविधान तैयार करने और वयस्क मताधिकार लागू करने के पीछे मंशा यही थी कि देश के हर नागरिक को उसका हक मिले। सरकार ने व्यवस्था की कि मतदाता सूची तैयार करने के लिए लोगों तक पहुंचा जाए, कोई भी व्यक्ति इस हक से वंचित न रहे। लेकिन एसआईआर के नाम पर बड़े पैमाने पर न केवल लोगों को मताधिकार से वंचित किया गया है, बल्कि अब सरकार की लाभकारी योजनाओं का हक भी उनसे छीना जा रहा है। जिस तरह के दस्तावेज मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए मांगे गए हैं, उन पर पहले ही सवाल उठ रहे थे कि गरीब लोग इन्हें कैसे जुटा पाएंगे, उनके पास ले देकर आधार या राशन कार्ड ही मिलता है। अब जो कुछ आम नागरिकों के पास था, वो भी उनसे छीना जा रहा है। इस तरह तो लोककल्याणकारी सरकार की अवधारणा ही बदल जाएगी।
मध्यमवर्ग या उच्च तबके की बेशक अपनी परेशानियां हैं, लेकिन कम से कम दो वक्त की रोटी, कुछ दिनों का रोजगार, सरकारी अस्पतालों में सस्ता इलाज, मुफ्त शिक्षा जैसी मदद की जरूरत उन्हें नहीं है। मगर पिछले छह सालों से जिन लोगों का गुजारा सरकार के दिए पांच किलो राशन से हो रहा हो या मनरेगा के तहत जिन्हें कुछ सौ रूपयों की कमाई होती है वे लोग अब कहां जाएंगे। चुनावों में महिलाओं, बेरोजगारों, किसानों, मजदूरों के लिए जिन योजनाओं का वादा किया जाता है, उनसे भी अब ऐसे लोगों को वंचित रखा जाएगा जिनका नाम मतदाता सूची में नहीं है।
जैसे बिहार के खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री अशोक चौधरी ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि 'राज्य में एसआईआर लागू होने के बाद राशन कार्ड धारकों की सूची से लगभग पांच लाख लोगों के नाम हटा दिए गए हैं।Ó वहीं बंगाल के खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री अशोक कीर्तनिया ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि नागरिकता संशोधन अधिनियम के तहत नागरिकता के लिए आवेदन करने वाले भी सभी सरकारी योजनाओं का लाभ उठा सकते हैं, लेकिन जिनके नाम एसआईआर के माध्यम से हटा दिए गए हैं, वे सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं उठा सकते।Ó
इसी तरह बंगाल की शहरी विकास और नगर पालिका मामलों की मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने कहा: 'हम विश्लेषण करेंगे, जिनके नाम सूची से हटा दिए गए हैं, वे या तो देश के नागरिक नहीं हैं या मर चुके हैं, उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल सकता।Ó
गौरतलब है कि नागरिकता से संबंधित मामले, जिनमें नागरिकता छीनना भी शामिल है, नागरिकता अधिनियम, 1955 द्वारा शासित होते हैं, और किसी व्यक्ति को विदेशी घोषित करने या नागरिकता रद्द करने का अधिकार केंद्रीय गृह मंत्रालय के पास है। एसआईआर पर सर्वोच्च न्यायालय की सुनवाई के दौरान, यह प्रश्न उठाया गया था कि क्या यह नागरिकता की कसौटी है। तब निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट किया था कि यद्यपि उसके पास नागरिकता निर्धारित करने का अधिकार नहीं है, फिर भी संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत नागरिकता की स्थिति को 'सत्यापितÓ करने का उसका अधिकार निहित है, जिसमें कहा गया है कि 18 वर्ष से अधिक आयु के भारतीय नागरिक मतदाता के रूप में पंजीकृत हो सकते हैं। पिछले साल जुलाई में अदालत में दायर अपने जवाबी हलफनामे में, चुनाव आयोग ने इस बात पर जोर देते हुए कहा था: 'एसआईआर प्रक्रिया के तहत, किसी व्यक्ति की नागरिकता इस आधार पर समाप्त नहीं होगी कि उसे मतदाता सूची में पंजीकरण के लिए अयोग्य माना जाता है।Ó
लेकिन अब सारी प्रक्रिया उसी दिशा में बढ़ती हुई नजर आ रही है, जहां लाखों लोग भारत के नागरिक कहलाने से ही वंचित हो जाएंगे। बता दें कि एसआईआर प्रक्रिया शुरू होने से पहले बंगाल में 7.66 करोड़ मतदाता थे। एसआईआर के बाद, शुरुआत में 58.20 लाख मतदाता हटाए गए, जो 'तार्किक विसंगति मामलोंÓ (यह प्रक्रिया केवल बंगाल के लिए की गई) के निपटारे के बाद बढ़कर लगभग 91 लाख हो गए। वहीं बिहार में लगभग 68 लाख मतदाता हटाए गए हैं।
बंगाल में माकपा के राज्य सचिव मोहम्मद सलीम ने कहा कि एसआईआर के बाद उन्हें इसी बात का डर था। 'सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि वोटर कार्ड नागरिकता का प्रमाण नहीं है। चुनाव आयोग ने हमें आश्वासन दिया था कि मतदाता सूची में नाम होना नागरिकता का प्रमाण नहीं है। अब सच्चाई सामने आ गई है। नाम हटाए जाने का मतलब यह कैसे हो सकता है कि लोग नागरिक नहीं हैं? जबकि टीएमसी के लोकसभा सांसद सौगता रॉय ने कहा, 'लाभों से इस तरह वंचित करना, गैर-नागरिक करार दिया जाना, अन्यायपूर्ण और अनुचित है।Ó


